ग्रहणमुद्रा
शिष्य की वह मानसिक स्थिति है जिसमें वह
ज्ञान ग्रहण करने के लिए तैयार है।
उसमें
साधक के गुण ,
गुरु के प्रति
श्रद्धा और
ज्ञान के लिए
जिज्ञासा और प्रेम प्रकट होने की अवस्था ।
मुख्य शिक्षाएं
- इस मुद्रा में शिष्य गुरु के सामने ज्ञान प्राप्त करने के लिए तत्पर रहता है।
- बिना ग्रहणमुद्रा के ज्ञान शिष्य तक नहीं पहुंचता - ग्रहण की क्षमता आवश्यक है।
देखें