पूर्णता


परिभाषा

  • जो जैसा है, वैसी ही संपूर्ण, अपरिवर्तनीय और सुंदर स्थिति को पूर्णता कहते हैं।

मुख्य शिक्षाएं

  • अज्ञान के कारण ही जीव स्वयं को अपूर्ण समझ बैठता है और संसारी इच्छाओं व भोगों के पीछे भागकर पूर्णता प्राप्त करने का निरर्थक प्रयास करता है।
  • वास्तविक पूर्णता किसी बाहरी वस्तु, क्रिया या सांसारिक उपलब्धि से प्राप्त नहीं होती, बल्कि यह सत्य जानकर स्वतः प्रकट होती है कि 'मैं पहले से ही पूर्ण स्वरूप अनुभवकर्ता हूँ'।
  • अद्वैत के धरातल पर, यह संपूर्ण ब्रह्मांड और वर्तमान क्षण अपने आप में पूरी तरह से पूर्ण है; इसमें किसी भी तरह के सुधार, फेर-बदल या आकांक्षा की कोई आवश्यकता नहीं है।
  • पूर्णता की साक्षात अनुभूति होने पर साधक के मन से सभी प्रकार के अभाव, इच्छाएं और दुःख सदा के लिए शांत हो जाते हैं।

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