अस्तित्व पूरी तरह से
कारणहीन और अकारण है।
कारण और प्रभाव की अवधारणा अस्तित्व पर लागू नहीं होती।
मुख्य शिक्षाएं
- अस्तित्व अकारण और स्वयंभू है; उसका कोई कारण नहीं हो सकता क्योंकि कारण-प्रभाव का पूरा खेल अस्तित्व के भीतर ही घटित होता है।
- यदि अस्तित्व का कोई बाह्य कारण मान लिया जाए, तो वह कारण भी अस्तित्व की परिभाषा के अनुसार अस्तित्व का ही भाग होगा, जिससे वह पृथक नहीं हो सकता।
- कारण-प्रभाव की अवधारणा केवल आंशिक घटनाओं, परिवर्तनों और सीमित वस्तुओं पर लागू होती है, संपूर्णता पर नहीं।
- अस्तित्व का कोई कारण न होने से इसका कोई बाह्य उद्देश्य या लक्ष्य भी नहीं है; यह स्वयंभू रूप से होना मात्र है।
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