ज्ञानमार्ग के आधारभूत सिद्धांत शृखला १३, ब्रम्हज्ञान के विषय पर आधारित सत्संग का लिखत प्रारुप
तरुण प्रधान
यहाँ पर हम ब्रम्हज्ञान के विषय में चर्चा करेंगे। यदि आत्मज्ञान नहीं हुआ है तो ब्रम्हज्ञान जरा कठिन हो जाएगा; इसलिए मेरा सुझाव है कि आत्मज्ञान का वीडियो को फिर से देंखें। अनुभव की विस्तार में हमने चर्चा की थी और उससे भी पहले मैंने आपको कहा था कि केवल एक तरह का अनुभव होता है; हमें तीन या चार तरीक़े के अनुभव के रूप में दिखाई देता है। पहला जगत का अनुभव है, दूसरा शरीर का है, तीसरा मन का है। इसके साथ ही हमें अनुभवकर्ता का भी ज्ञान होता है जो अनुभव कर रहा है, लेकिन उसका अनुभव नहीं होता। वह वह है जो अनुभव करता है। उसका हमें प्रत्यक्ष ज्ञान होता है। अनुभवक्रिया, अनुभवकर्ता और अनुभव के बारे में जो चर्चा की थी उसमें मैंने कहा था कि सारे अनुभव एक ही है; तो आज उसी को दोहरा देतें हैं कि ऐसे कैसे संभव है कि सारे अनुभव एक ही है? तो ब्रह्मज्ञान के लिए पहला चरण यह जानना है कि सारे अनुभव एक ही तरह के अनुभव है। यह आप अच्छे से जानते हैं कि अनुभवकर्ता एक ही है; उसके कई प्रकार नहीं होते हैं। पिछली बार आत्मज्ञान की चर्चा में आपने जान लिया कि मैं या अहम का कोई अस्तित्व नहीं है; तो दो ही बातें बचती है- एक है अनुभव दूसरा है अनुभवकर्ता। अनुभवकर्ता के बारे में किसी को शंका नहीं होनी चाहिए कि वह बहुत से है; क्योंकि एक ही अनुभवकर्ता है-यह मेरा प्रत्यक्ष ज्ञान है और वह मैं नहीं, वह अहम नहीं है। अहम भी एक तरह के अनुभव है, मानसिक क्रिया है, जो कल्पना मात्र है, यह आत्मज्ञान है।
जगत के अनुभव कई तरह के अनुभव होते हैं, लेकिन जो इंद्रियों के मध्यम से आता है हम उसको एक भाग में डाल सकते हैं। कई तरह के इंद्रियाँ है। उनके मध्यम से कई तरह के अनुभव आते हैं और उनसे वस्तुओं की अनुभूति होती है। वस्तुओं की अनुभूति कहाँ होती है? यदि आप यह प्रश्न करें तो आपको उत्तर मिलेगा कि मन में होती है। वस्तु के अनुभव बाहर कहीं नहीं हो सकती; जहाँ मैं हूँ वहीं होनी चाहिए। कोई भी वस्तु हो किसी भी इंद्रियों के मध्यम से आ रही हो उसकी अनुभूति एक ही जगह होती है। हमें वस्तुओं का ज्ञान नहीं होता। हमें वस्तुओं का जो ज्ञान है वह इंद्रियों द्वारा जनित अनुभूति के रूप में होता है। इंद्रियाँ जो हमें दिखा रही है वह जगत में नहीं मिलता। यदि हम जगत का वैज्ञानिक अध्ययन करें तो रंग जगत में नहीं मिलता, रूप नहीं मिलता, आवाज़ नहीं मिलता, स्वाद भी नहीं मिलता जगत में; तो जगत का अनुभव इंद्रियों द्वारा रचित्त अनुभव है जो मन में कहीं होता है। शरीर का अनुभव ऐसा ही है, लेकिन शरीर का अनुभव थोड़ा विशेष है; क्योंकि आंतरिक अनुभव भी है। आंतरिक इंद्रियों द्वारा शरीर के आंतरिक स्थिति का अनुभव मिलता है। मन का अनुभव मानसिक इंद्रियों द्वारा मिलता है जो किसी भी वस्तु से संबंधित नहीं है। तीन/चार तरह के अनुभव है। यदि आप शरीर को दो तरह से मान लें तो चारों एक ही हैं।
कैसे देखेंगे यह चारों अनुभव एक ही हैं? तो यदि आप प्रश्न करें कि जगत का अनुभव कहाँ हो रहा है? तो सामान्य व्यक्ति का यह उत्तर रहेगा कि जगत का अनुभव बाहर हो रहा है, शरीर का अनुभव यहाँ हो रहा है, मानसिक या शारीरिक स्थितियों के अनुभव, अंदरूनी स्थितियों का अनुभव मेरे अंदर हो रहा है। हमने देखा कि मैं जो है वह कल्पना है, मेरा कोई अंदर नहीं होता, बाहर नहीं होता; क्योंकि मैं नहीं है। यदि प्रश्न करें कि बाहर का अर्थ क्या है और अंदर का अर्थ क्या है? तो आम व्यक्ति का यह उत्तर रहेगा कि जो शरीर के बाहर है वह बाहर है जो अनुभव शरीर के अंदर है वह अंदर है। आप यहाँ पर तुरंत देख सकते हैं कि अंदर और बाहर की सीमा रेखा जो है शरीर पर खींच दी गई है। यदि आप कहें कि आपके वस्तु कौनसी है और दूसरों की वस्तु कौनसी है? आपके संबंधी कौनसे है? दूसरे लोग कौनसे है? तो वहाँ पर भी एक रेखा होती है- यह मेरा घर है, यह मेरी वस्तु है, यह मेरे संबंधी है। वहाँ पर मेरी चीजों की सीमा रेखा जो है वह वस्तुओं में कहीं जगत के अंदर कहीं होती है। जो मेरे जीवन के लिए उपयोगी है वह सारा मेरा है तो वहाँ पर सीमा रेखा होती है। वस्तुओं से शुरू होता है अनुभव और पहली सीमा रेखा वहीं मिलेगी जहाँ पर मैं, मेरा शब्द आता है।
दूसरी सीमा रेखा शरीर पर मिलेगी; क्योंकि जो भी जगत है वह शरीर के बाहर है। यदि आप प्रश्न करें कि शरीर कहाँ है तो आम व्यक्ति का फिर से उत्तर रहेगा कि जो मन नहीं है वह शरीर है; इसलिए मन के बाहर जो है वह शरीर है। जो हाथ, पैर और चेहरा दिखाई देता है वह मन के बाहर है। इंद्रियों की सीमा के बाहर है तो वहाँ पर रेखा खींचीं जाती है। ऐसे ही प्रश्न करें कि शारीरिक अनुभूति जो है वह कहाँ है तो वहाँ पर भी एक रेखा मिलेगी; क्योंकि जो मानसिक अनुभूति और शारीरिक अनुभूति है उनके बीच में एक काल्पनिक रेखा खींचीं जाएगी। यदि आप फिर से प्रश्न करें कि यह मानसिक अनुभव कहाँ हो रहे हैं तो बहुत से लोग बता नहीं पाएंगे कहाँ हो रहे हैं। वे बोलेगें यहाँ हो रहा है, या फिर कहेगें मेरे सिर के अंदर हो रहा है क्योंकि; सारी इंद्रियाँ सिर में होती हैं तो ऐसा भ्रम होता है कि वहाँ पर अनुभव हो रहे हैं। कुछ समझदार लोग और अध्यात्मिक लोग कहेंगे कि जो चेतना के बाहर है, जो अनुभवकर्ता के बाहर है वह मन है; क्योंकि अनुभव है इसलिए मेरी थोड़ी सी दूरी है उससे तो चेतना के बाहर रख दिया जाता है; वहाँ सीमा रेखा होती है।
यदि आप प्रश्न करें कि चेतना कहाँ है तो उसका कोई उत्तर नहीं आएगा। वहाँ पर कोई सीमा रेखा नहीं। लोग कहेंगे कि वह तो मैं हूँ, मेरा न अंदर है न बाहर है; वहाँ पर समाप्त होता है। ध्यान देंने लायक बात यह है कि सीमा रेखा आप कहीं भी खींच सकते हैं। अंदर बाहर जो है मनगढंत है; यानी कि जब भी हमें आवश्यकता होती है वहाँ एक रेखा बनाई जाती है। यदि हमें खाना चाहिए, या संबंधियों से संबंध रखने है, या फिर जो प्रिय वस्तु है; तो सीमा रेखा जगत में कहीं होती है। कुछ लोगों की बहुत लंबी चौड़ी रेखा होती है। वह सारे देश को, सारे पृथ्वी को अपना बनाना चाहते हैं। कहीं भी खींच सकते हैं आप सीमा रेखा का क्या है; मनगढंत है। वैसे ही यदि आपको जगत और स्वयं में भेद करना हो तो शरीर पर अधिकतर लोग खींच देंगे सीमा रेखा; वह जगत है और यह मैं हूँ, जगत मेरे बाहर है। यदि आपको मन में और शरीर में भेद करना हो तो मन पर सीमा रेखा खींच देंगें। मनगढ़ंत है, काल्पनिक रेखा है; इसका यथार्थ नहीं है। क्या अंदर है क्या बाहर है यह बदलता रहता है; यह अवधारणा मात्र है। अंत में हर वस्तु बाहर है; क्योंकि अनुभूति यहाँ पर हो रही है। मेरी चेतना यहाँ पर है तो हर अनुभव अंदर है तो यह कहना अर्थहीन हो जाता है। व्यक्ति पर निर्भर है उसको कहा रखना चाहे। यथार्थ में उसका कोई यथार्थ सत्य नहीं अंदर और बाहर का। इस तरह से आप देखेंगे कि सारे अनुभव एक ही तरह के हैं। यदि पंच इंद्रियों के मध्यम से आते हैं तो हम उसे कह देतें हैं कि वह जगत के अनुभव है; ठोस दिखाई देता है, लेकिन अनुभूति मात्र है। यदि वह शरीर के अंदर की शारीरिक इंद्रियों के मध्यम से आते हैं तो हम उसको शरीर का अंदरूनी अनुभव कह देतें हैं। यदि वह मानसिक इंद्रियों से आ रहे हैं; यानी कि सीधा जिसका अनुभव हो रहा है उसको हम मानसिक अनुभव कह देतें हैं। यह विभाजन केवल सहायता करता है हमें जानने के लिए कि कौन वस्तु क्या है। यह विभाजन जो है चित्तवृत्ति है।
अनुभवों में जो भिन्न वस्तुएँ होती है उनका स्थान होता है; यानी कि जगत में वस्तुओं का स्थान होता है; जो सापेक्षित होता है। एक वस्तु के आधार पर आप कह सकते हैं कि दुसरी वस्तु स्थित है। जो शारीरिक अंदरूनी अनुभूतिओं में थोड़ा सा विलीन होने लगता है; यानी कि हाथ में दर्द है तो थोड़ा बहुत आपको ज्ञान होगा, लेकिन शरीर में यदि थकावट है तो आपको कहीं उसका स्थान नहीं मिलेगा। इसी तरह से मानसिक अनुभवों का शुद्ध रूप में देखा जाए तो कोई स्थान नहीं मिलेगा कहाँ हो रहे हैं। मनगढंत स्थान बना सकते हैं उसका, लेकिन आप उस स्थान पर जा नहीं पाएंगे, बता नहीं पाएंगे कि क्या स्थान है। तो स्थान जो है इंद्रियों का भ्रम है और अनुभव जो है उसका कोई स्थान नहीं होता; क्योंकि वह यहाँ है। या फिर आप कह सकते हैं कि सारे अनुभव अलौकिक है, उनका कोई स्थान नहीं है, कोई लोक नहीं है। इस तरह से हम अनुभवों का एकीकरण कर सकते हैं। चेतना के पटल पर सारे अनुभव हैं; यही आपका प्रत्यक्ष अनुभव है, यही आपके सामने प्रत्यक्ष प्रमाण है।
अब आप अनुभवकर्ता पर एक दृष्टि डालिए और यही प्रश्न पूछें कि अनुभवकर्ता कहाँ है? तो बहुत आसान है बताना कि अनुभवकर्ता भी यहाँ है। उसका भी कोई स्थान नहीं है। जो हमने अनुभवकर्ता की विशेष गुण पर विस्तार में चर्चा की थी तो देखा था कि अनुभवकर्ता का कोई स्थान नहीं हो सकता; तो वह भी यहाँ है; दोनों अनुभव और अनुभवकर्ता यहाँ है। अब प्रश्न कर सकते हैं कि अनुभव और अनुभवकर्ता के बीच दूरी कितनी है? क्या भिन्नता है? या अंतराल कितना है? अनुभव के कितने समय के बाद उसका अनुभव होता है? कोई घटना होने की कितनी समय के बाद उसका अनुभव होता है? अनुभवकर्ता कितनी दूर है? वह अनुभव की कितनी मीटर दूर है? कितना सेकंड बाद अनुभव होता है? इस तरह से पूछते जाएँगे तो आपको पता चलता है कि अनुभवकर्ता और अनुभव का एक ही स्थान है। यहाँ और इसी वक्त अनुभव भी है, अनुभवकर्ता भी है। दोनों में कोई दूरी नहीं है; दोनों में कोई भिन्नता नहीं है; अनुभव अनुभव की चेतना है। अनुभव और अनुभव की चेतना में कोई फर्क नहीं है। जब मैं कहता हूँ कि मुझे अनुभव हो रहा है- इसका अर्थ यही है कि उस अनुभव की चेतना है। चेतना का दूसरा अर्थ अनुभवकर्ता भी है; यानी जो अनुभव कर रहा है वही अनुभव है; क्योंकि अनुभव की चेतना ही अनुभव है, अनुभवकर्ता ही अनुभव है। यदि आप पुछेगें कि अनुभव और अनुभव की चेतना में कितनी दूरी है? अनुभव और अनुभव का ज्ञान कितना भिन्न है? तो आपको उत्तर मिलेगा कि दोनों एक ही है। अनुभव का होना अनुभव का ज्ञान होना एक ही है, अनुभव का होना और अनुभव की चेतना होना एक ही है। अनुभव का होना अनुभवकर्ता का होना एक ही है। अनुभव करना और अनुभवकर्ता का होना एक ही तरह की घटना है जिसको हम अनुभवक्रिया भी कहते हैं। केवल अनुभवक्रिया मात्र है, जो यहाँ पर इसी समय हो रही है।
अनुभवकर्ता और अनुभव जो है हमेशा एक साथ पाए जाते हैं। आपको कभी नहीं मिलेगा कि अनुभवकर्ता है और अनुभव नहीं है। इसी तरह अनुभव है अनुभवकर्ता ग़ायब है ऐसा भी आपको कभी नहीं मिलेगा। वह अनुभव नहीं हो सकता जिसका अनुभवकर्ता नहीं है; दोनों एक साथ पाए जाते हैं। तो आपको शंका हो गई होगी कि ऐसा क्यों है? ऐसा इसलिए है; क्योंकि दोनों एक ही है। जैसे कि एक सिक्के के दो चेहरे होते हैं वैसे है। दृष्टिकोण मात्र है; एक के दो दृष्टिकोण है। यदि आपका ध्यान अनुभव पर है तो अनुभवकर्ता विलीन हो जाता है अनुभव में; उसके होने के ज्ञान नहीं होता। यदि आपका ध्यान अनुभवकर्ता पर है तो अनुभव विलीन हो जाता है। आँख बंद करके आप देख सकते हैं यदि आपको प्रयोग करना है तो; क्योंकि यह ध्यान पर निर्भर है कि आपका ध्यान किधर है। आप यह अनुमान लगा सकते हैं कि एक तरह की चित्तवृत्ति है, एक तरह की मानसिक प्रक्रिया है एक को दो में बाटने की। एक को अनुभवकर्ता और अनुभव में बाटने की; यानी कि जो अनुभवक्रिया है उसको चित्तवृत्ति दो में बांट देती है। एकता का दो में विभाजन एक तरह की चित्तवृत्ति है। आप अभी इसी समय प्रयोग करके देख सकते हैं कि जब ध्यान अनुभव का हो तो आपको आपने होने का ध्यान नहीं होता। यदि आपका ध्यान अनुभवकर्ता की ओर चला जाए जिसको हम मैं भी कह देतें हैं कभी कभी- मैं अनुभव नहीं हूँ यह ज्ञान होता है। अनुभवकर्ता का ज्ञान और कुछ नहीं है, उसका अनुभव नहीं किया जा सकता। अनुभवकर्ता का ज्ञान केवल इतना मात्र है कि वह अनुभव नहीं है। हमने आत्मज्ञान के सत्संग में देखा यदि किसी भी घटना का अनुभव हो रहा है तो वह अनुभवकर्ता नहीं है। आप देख सकते हैं यदि सिक्के का पहला चेहरा मैं देख रहा हूँ तो दूसरा नहीं दिखेगा; दूसरा देख रहा हूँ तो पहला नहीं दिखेगा।
इसी तरह की कुछ चित्तवृत्तियाँ है और यह भी एक तरह की माया है, एक तरह का आभाष है, ऐसी प्रतीति है एकता में दो का विभाजन करने की। चित्त यहाँ पर रुकता नहीं है; क्योंकि अनुभवकर्ता में कोई विभाजन नहीं कर सकता तो अनुभव में विभाजन करता है। आपने देखा कि यदि अनुभवकर्ता मैं हूँ तो मैं दो नहीं हो सकता। चेतना के दो भाग नहीं हो सकता, हमेशा एक ही होगा; तो वह अनुभव के भाग करता है। पहला भाग यही होता है कि बहार अनुभव अंदर अनुभवकर्ता; यह पहला विभाजन चित्त करता है। दूसरा अनुभव के तीन या चार विभाजन करता है जो हम आमतौर से लेते हैं-जगत का अनुभव, शरीर का अनुभव और मन का अनुभव- ऐसे विभाजन करता है। जगत में कई वस्तुएँ हैं। एक वस्तु को दूसरों से भिन्नता देखता है और उसका जो पृष्ठभूमि है उसे अलग करता है वस्तु को, उसके अनुभूति को। इसी तरह से ज्ञान होता है वस्तुएँ भिन्न होने का। जीवित रहने के यह विभाजन करना बहुत आवश्यक है कि कौनसी वस्तु क्या है। ऐसे ही तरह-तरह के वस्तुओं का विभाजन करता है चित्त। उनको नाम देता है, उनको रूप देता है, उनको रंग देता है और नामरूप का जगत निर्मित करता है। इसी तरह से शरीर को भी विभाजित करता है- यह हाथ है, यह पैर है, यह चेहरा है, बाल है; ऐसा विभिन्न रचना को विभाजित करता है। इसी तरह से मानसिक क्रिया को भी विभाजन विभाजन करता है- कि यह भावना है, यह स्मृति है, यह बुद्धि है। हमने चित्त की परतों में देखा निष्क्रिय पदार्थ से लेकर चेतना तक विभिन्न परते हैं चित्त की। नाद रचना पर आधारित है, चित्त भिन्नता देखता है। विभाजन करना चित्त की वृत्ति है; क्योंकि सारे अनुभव एक ही तरह के अनुभव है। उनको कई तरह के अनुभव के रूप में चित्त दिखाता है। अनुभवकर्ता का कोई विभाजन नहीं कर सकता। यदि पहले चरण में सारे अनुभव का एकीकरण कर दें तो आपको एक ही तरह का अनुभव दिखाई देंगे वह सारे के सारे मानसिक तरह के अनुभव है, चित्त के अनुभव है, चित्त की परतों के अनुभव है, यहाँ और इसी समय है। अनुभवकर्ता और अनुभव में कोई दूरी नहीं है, कोई अन्तराल नहीं है, कोई अन्तर नहीं है, यह भी एक तरह का विभाजन है; क्योंकि दोनों हर समय हर वक्त हमेशा एक साथ ही पाए जाते हैं। आप अनुमान लगा सकते हैं कि वह एक ही होंगे।
जब आपका ध्यान अनुभव पर होता है या अनुभवकर्ता पर होता है तो आपको दो दिखाई देंगे। यदि आपका ध्यान बीच में रखें; यानी कि अनुभवक्रिया पर आपका ध्यान ले जाएँ और ध्यान से देंखें कि केवल अनुभवक्रिया मात्र है। विभाजित ना करें दृश्य और दृष्टा का; केवल दृष्टि पर अपना ध्यान रखें तो आपको एकता का अनुभव होगा जो अनुभव नहीं है, लेकिन एकता का ज्ञान होगा। इसी को समाधि का ज्ञान कहते हैं। चाहे तो आप अभी भी करके देख सकते हैं- अनुभवक्रिया पर अपना ध्यान ले जाएँ, ना अनुभव पर ध्यान दें, ना अनुभवकर्ता पर ध्यान दें, अनुभवक्रिया पर स्थिर रहें कि यहाँ कुछ है जिसका अनुभव चल रहा है, कुछ है जिसका अनुभव हो रहा है तो आप अनुभवक्रिया पर स्थिर रहेगें। यदि आप विभाजन न करें, यदि आप गिनें नहीं वस्तुओं को कि यह वस्तु यह है, वह वस्तु वह है, यह शरीर है, यह मन है और मानसिक प्रक्रिया पर भी थोड़ा सा नियंत्रण कर लें कि न बहुत ज़्यादा भावना हो, न बुद्धि ज़्यादा चल रही हो, न बहुत सारे विचार हो। यदि आप थोड़ा सा रोक ले आपके मन को, थोड़ी देंर के लिए और आँखें बंद कर लें या फिर उस पर ध्यान न दें जो आपका चित्त कहता है तो आप अनुभवक्रिया पर स्थित हो जाएँगे। आप पाएंगे जो चेतना है अनुभव की उसको रोकना संभव नहीं है यही समाधि है और इसी को तथाता भी कहते हैं। यह एक होने का ज्ञान है, एकता होने ज्ञान है। यदि आप इस स्थिति में काफ़ी समय तक रह पाएंगे तो इसी को तुर्या भी कहेंगे; जब मन या चित्त समाधि में है। समाधि अर्थ यही है सम बुद्धि सम यानी बराबर यानी बीच में। ना उधर जा रहा है न इधर आ रहे बीच में हैं। यदि आप यह स्थिति रख पाएँ कुछ देर तक भी तो आपको एकता का ज्ञान होगा। चित्त का विभाजन या चित्तवृत्ति पर यदि आपका नियंत्रण रहता है तो योग होगा। इस विभाजन का अंत ही योग है। यह आपके सामने अभी इसी समय है। कहीं जाने की आवश्यकता नहीं है।
पहला चरण यह है कि सारे अनुभव को एकीकरण करना और दूसरा चरण यह है कि अनुभव और अनुभवकर्ता में दूरी देखना, प्रश्न चिह्न लगाना उस पर कितना दूर है, यह जानना कि चित्त विभाजन कर रहा है तो आपको ज्ञान होगा कि यह विभाजन चित्त के द्वारा हो रहा है और उस पल आपको समाधि का ज्ञान होगा। आप समाधि में आ जाएँगे जो चित्त है वह समाधि में आता है, बाक़ी जो है अनुभवकर्ता हमेशा समाधि में ही रहता है; वह कहीं नहीं जाता। हमें सारा ज्ञान चित्त के मध्यम से होता है, सारे अनुभव चित्त के माध्यम से होते हैं; इसलिए चित्त स्थिर करना आवश्यक है। कहाँ स्थिर करना है? अनुभव और अनुभवकर्ता के बीच में स्थिर करना है। जब आप वहाँ पर हैं तो अनुभवक्रिया का ज्ञान होगा। यही अनुभवक्रिया तथाता है, यही अनुभवक्रिया तूर्या है, यही समाधि है। चित्त की बदलती स्थितियों के बीच में रहना समाधि है, यही ब्रह्मज्ञान है। यहाँ पर कोई विभाजन नहीं है, आपको प्रत्यक्ष ज्ञान होगा कि मैं यदि उसको विभाजित न करूँ तो एकता ही बचती है। फिर भी आपको प्रयोग करना है, यह आत्मविचार करना है। तो यह प्रक्रिया है, दो या तीन चरणों में होता है; इस तरह से आपको ब्रह्मज्ञान होगा। पहला चरण सारे अनुभवों का एकीकरण करना, दूसरा चरण अनुभवकर्ता और अनुभव का एकीकरण करना, उसके बीच में अंतराल ढूँढना और तीसरे चरण में समाधि; यानी कि सारे अनुभव और अनुभवकर्ता के बीच में चित्त को स्थिर करना। कहीं यहाँ नहीं जाना वहाँ नहीं जाना। जो दौड़ता रहता है चित्त उसको बीच में केंद्रित करना, तो आपको तथाता का अनुभव होगा। यह इतना सरल है कि काफ़ी लोगों को भ्रम हो जाता है कि ब्रम्हज्ञान थोड़ा सा बड़ा होना चाहिए, ब्रम्हज्ञान काफ़ी बड़ा ज्ञान है तो मुझे कोई बड़ा अनुभव होना चाहिए। जैसे कि हमने देखा जिस तरह से आत्मज्ञान आप अनुभव में नहीं ढूँढ सकते उसी तरह से ब्रम्हज्ञान अनुभव नहीं होगा। अनुभव और अनुभवकर्ता का मिलाप ब्रह्मज्ञान है, एकता का ज्ञान है, योग है; बहुत सरल है। यहाँ है, इसी समय है, अनुभव में ढूँढना संभव नहीं है उसको।
जब अनुभव विलीन हो जाता है अनुभवकर्ता में और अनुभवर्ता विलीन हो जाता है अनुभव में तो एकता का ज्ञान होता है। जब दृश्य चला जाता है और दृष्टा भी चला जाता है केवल दृष्टि रह जाती है तो ब्रम्हज्ञान होता है। जब साक्षी और साक्ष्य दोनों विलीन हो जाते हैं तब ब्रह्मज्ञान होता है। बहुत से लोग एक गलती करते हैं, यह भ्रांति है उनका कि कोई बड़ा अनुभव होगा मुझे एकता का एक दिन; मैं बहुत ध्यान कर लूँ, घंटों बैठा रहूँ, या कुंडलिनी जब सहस्रार में होगी तो मुझे ज्ञान हो जाएगा और वे प्रयास करते रहते हैं। कई लोग जो हैं वर्षों-वर्षों तक प्रयास करते हैं, जीवन भर प्रयास करते रहते हैं, लेकिन उनको कोई अनुभव नहीं होता एकता का। ऐसा इसलिए है; क्योंकि कि एकता का अनुभव कोई अनुभव नहीं है, ब्रम्हज्ञान कोई अनुभव नहीं है; जिस तरह से आत्मज्ञान कोई अनुभव नहीं है। बहुत से लोगों की भ्रांति होती है कि आत्मज्ञान में मुझे मेरा दर्शन होगा। मेरे नहीं होने ज्ञान आत्मज्ञान है तो कैसे दर्शन होगा? मेरे नहीं होने का दर्शन होता है, मैं या अहम माया होने के ज्ञान होता है तो आत्मज्ञान होता है। इसी तरह से ब्रम्हज्ञान जब अनुभव और अनुभवकर्ता में कोई भेद नहीं हो, कोई भेद नहीं दिखे, कोई विभाजन नहीं हो, जब समाधि की स्थिति हो चित्त की तो ब्रह्मज्ञान होता है। बहुत सरल है, इसे न आत्म में ढूँढने का प्रयास करें, न आत्म के बाहर किसी अनुभव में ढूँड़ने का प्रयास करें। आपको विफलता मिलेगी, जो बहुत लोग करते हैं और विफल हो जाते हैं। एकता क्या है उसकी भी भ्रांतियां बना लेते हैं, तरह-तरह की अवधारणा बना लेते हैं; क्योंकि बहुत बड़ी चीज़ होगी जो मुक्ति के बाद मिलेगी, जो मृत्यु के बाद मिलेगी, जो किसी लोक में मिलेगी, विष्णुलोक में, ब्रह्मलोक में, ऐसे लोक में, वैसे लोक में। जो बहुत बड़े ज्ञानीओं को ही मिलती है, मुझे बहुत बड़ा गुरु होना पड़ेगा, हज़ार साल तपस्या करना पड़ेगा तो ब्रह्मज्ञान होगा। इस तरह से तरह-तरह की मूर्खतापूर्ण भ्रांतियां व्यक्ति के मन में है; इसलिए उनको कभी होता नहीं है यह ज्ञान। बहुत सरल है, इसमें पाँच मिनट लगता है। यह प्रयोग करें और तब तक करते रहें जब तक आपके सारी शंकाओं का अंत न हो जाए; जब तक आपके सारे प्रश्न हाल न हो जाए।
बहुत से लोगों का पहला प्रश्न तो यही आएगा कि सारे अनुभव एक कैसे है? ध्यान से देंखें सारे अनुभव अनुभूतियाँ हैं, यहाँ हैं। कुछ लोगों का यह सोच रहेगा कि नहीं यह अनुभव तो मुझे बाहर दिखाई दे रहा है, अंदर दिखाई दे रहा है; तो प्रश्न चिह्न लगाएं आपके सारी अवधारणाओं पर, जो कल्पनाएँ कर रखी है सब पर प्रश्न करें कि क्या यह सही है जो मैं सोचता हूँ? इसी तरह से आत्मविचार आगे बढ़ता है और जब आपको पक्का ज्ञान हो जाए कि सारे अनुभव एक ही तरह के हैं; सारे अनुभव अनुभूति हैं, चित्त के अनुभव हैं, सारे अनुभव विभिन्न परतों के हैं। इसलिए हमने चित्त के परतों का पहले अध्ययन कर लिया ताकि आपको यह स्पष्ट हो जाए कि ऐसा अनुभव चित्त का है, वैसा अनुभव चित्त का नहीं है। यह सारी अवधारणा आपके नष्ट कर दी गईं जब मैंने परतों के बारे मैं आपको विस्तार से बताया। सारे अनुभव चित्त के अनुभव है; यानी कि तीन तरह के अनुभव हैं। इस वक्त इस समय अनुभवकर्ता को जो भी अनुभव हो रहा है वह चित्त का अनुभव है चित्त की परतों का अनुभव है। आपके बुद्धि उसको विभाजित कर देती है कि यह जगत है, यह शरीर है, यह विभिन्न तरह के अनुभव है। यदि आप वह विभाजन न करें तो आपको सारे अनुभव यहीं के यहीं मिलेंगे। कोई अंदर-बाहर नहीं मिलेगा। जब आपको यह पक्का हो जाए, जब आप को यह स्पष्ट ज्ञान हो जाए कि सारे अनुभव एक ही तरह के हैं तो आप अनुभवकर्ता और अनुभव के बीच में विभाजन तोड़ सकते हैं। हमने देखें वह भी एक तरह का विभाजन है, वह भी चित्त करता है। ध्यान यहाँ वहाँ जाता है तो आपको अद्वैत में द्वैत होने भ्रम होता है। यदि आपका ध्यान यहाँ वहाँ भटक रहा है अनुभव से अनुभवकर्ता की ओर अनुभवकर्ता से अनुभव की ओर बार-बार जा रहा है तो उसको बीच में लाएं, उसको बीच में केंद्रित करें, सम भाव समाधि में। बुद्धि को एक जगह पे केंद्रित करना; यानी कि बैलेंस करना एक जगह बराबर रखना- उसको ही मैं अनुभवक्रिया कहता हूँ। कुछ लोग उसको दृष्टि कह सकते हैं, कुछ लोग उसको तथाता कह सकते हैं जो कि बुद्ध के द्वारा बताए गया है। एक तरह का ध्यान की प्रक्रिया है, ध्यान का प्रयोग है। आपने देखा होगा यह जो ध्यानी या योगी हैं बैठे रहते हैं आँख बंद करके या आँख खोल के वह क्या कर रहे हैं? वह समाधि में जाने के प्रयास कर रहे हैं। चित्त को एक जगह सम करने के प्रयास कर रहे हैं, एक जगह बिठाने का प्रयास कर रहे हैं, केंद्रित करने का प्रयास कर रहे है। पतंजलि का ध्यान वही है जो तथाता है, पतंजलि का योग वही है। जो तूर्या है तंत्र विद्या की। यह सारे विभिन्न तरह के शब्द मात्र है, भाषा विभिन्न है, लेकिन चित्त के स्थिति को एक जगह पे केंद्रित करना, स्थिर करना, विभाजन न करना और यह अच्छे से देखना, पक्का ज्ञान होना बिना किसी संशय के, बिना किसी बाधा के, बिना किसी प्रश्न के; यह सारा चित्त निर्मित है। यह ज्ञानी का काम है, आपके सामने स्वयं उपस्थित होगा वह ज्ञान यदि आप प्रश्न करते जाएँ इसी तरह कि जैसे हमने अभी की है। यह आत्मविचार के प्रयोग है। जैसे कि हम आत्म पर सारे प्रश्न करते हुए ही पहुँचे थे कि क्या वस्तुएँ मैं हूँ? क्या शरीर मैं हूँ? इस तरह के हमने प्रश्न किए थे। आप देखेंगे आपके अवधारणाएँ नष्ट होते हैं प्रश्न से और ज्ञान सामने आता है। अज्ञान का पर्दा अज्ञान का मैल नष्ट होता है और ज्ञान स्पष्ट होता है। आपको कुछ नया अनुभव नहीं होगा आपको कुछ नया नहीं देखने को मिलेगा। जो आप का पुराना आपका जमा किया हुआ कचरा है, जो मैल है अज्ञान के जो पर्दे हैं वह नष्ट होते हैं, वह हटते हैं और आत्मज्ञान या फिर ब्रह्मज्ञान आपके सामने प्रत्यक्ष होता है। यह ज्ञानी के लिए बहुत आसान है। प्रश्न करते जाओ, अनुभव की ओर देखते जाओ, अनुभवकर्ता के ओर देखते जाओ। जब चित्त की ओर आप दृष्टि डालेंगे चित्त का उपयोग करके तो चित्त स्थिर हो जाएगा; तब एकता का ज्ञान होगा। ज़्यादा समय नहीं लगता। इस प्रक्रिया तक या इस आत्मविचार तक, समाधि तक पहुँचने के लिए समय लगता है; क्योंकि अज्ञान बहुत है। गुरु की आवश्यकता होती है, यह आप स्वयं नहीं कर सकते। आप सपने में भी नहीं सोच सकते कि ऐसा कुछ होगा; क्योंकि अज्ञान में जन्म होता है व्यक्ति का। जन्म का अर्थ है अज्ञान होना; नहीं तो जन्म क्यों होता? यह है आत्मविचार की प्रक्रिया इसको बार-बार करें जब तक कि यह पक्का न हो जाए।
यह है ब्रह्मज्ञान का प्रयोग, यह है एकता का ज्ञान, यह है सम्पूर्णता का ज्ञान, यह है अविभाजित अखंड चैतन्य अस्तित्व का ज्ञान। अस्तित्व आपको इसी रूप में दिखेगा; यदि किसी और रूप में दिख रहा है तो वह माया है। आप कह सकते हैं आम भाषा में कि जो दिख रहा है वही देख रहा है; जो दृश्य है वही द्रष्टा है। जो अनुभव है वही अनुभवकर्ता है, दोनों में भेद नहीं है, अविभाजित है अखंड है, निरंतर है, और अनंत है। चैतन्य भी है तो इसलिए उसको सच्चिदानंद का नाम दिया है, और कई नाम भी दिए गए है। ध्यान रखने की बात यह है कि जो दिख रहा है वही देख रहा है, जो देख रहा है वही दिख रहा है। इस पर आपको ध्यान करना है, इसी स्थिति को समाधि की स्थिति कहते हैं। आप यह भी कह सकते हैं कि मैं ही आत्मन हूँ; क्योंकि आत्मन ही ब्रह्मन है, दोनों में कोई भिन्नता नहीं है। आप यह कह सकते हैं कि मैं ही ब्रह्मन हूँ यह भी कहना ग़लत नहीं होगा, लेकिन अधिक सही यह होगा कहना कि ब्रह्मन है और मैं चित्तवृत्ति है अहम है; क्योंकि अहम जो है वह ब्रह्म पर स्थित है। चित्त अहम की स्थिति कहीं भी रख सकता है। जैस कि हमने पिछले बार देखा कि आत्मज्ञान की प्रयोग में, आत्मविचार में कि कभी अहम शरीर पर स्थित होता है, कभी वस्तुओं पर स्थित होता है, कभी मन पर स्थित होता है, मन के विभिन्न परतों पर स्थित होता है। यदि आत्मविचार करने जाएँ तो आत्म पर स्थिर हो सकता है और मैं आत्म हूँ यह कह सकता है। जब एकता का ज्ञान होता है जब ब्रह्मज्ञान होता है तो चित्त यह भी कह सकता है कि मैं ब्रह्म हूँ। इसमें ग़लत नहीं कहना; क्योंकि ब्रह्म यानी सबकुछ आ जाता है। उसके बाहर कुछ भी नहीं है तो आप कह सकते हैं कि मैं ब्रह्म हूँ या अहम ब्रह्मस्मी। यही वाक्य आपको वेदों में उपनिषदों में मिलेगा, लेकिन मेरे विचार से इतना कह देंना काफ़ी है ब्रह्म अस्ति; यानी कि ब्रह्म है और वह अखंड अविभाजित चैतन्य है, यह मेरे सामने प्रत्यक्ष है। अब उसमें आप अहम् को लाना चाहे तो ला सकते हैं; क्योंकि भाषा का प्रयोग करने के लिए आसान होता है। अहम ब्रम्हस्मि कहना उनके लिए अच्छा है जिनको ब्रह्मज्ञान हो गया है। यदि दो लोगों को ब्रह्मज्ञान हो गया है तो एक दूसरों को कह सकते हैं अहम ब्रम्हस्मि।जिसको नहीं हुआ ब्रह्मज्ञान यदि वह कहने लगे कि मैं ब्रह्म हूँ तो बड़ी समस्या हो जाएगी; क्योंकि ज्ञान नहीं है तो तरह-तरह की अवधारणाएँ और कल्पनाएँ बना लेगा वह व्यक्ति। जिस तरह से मेरा नहीं होना आत्मज्ञान है वैसे ही द्वैत का नहीं होना ब्रह्मज्ञान है; नया अनुभव नहीं होगा। यह बात को ध्यान में रखना है। आप कहने को कह सकते हैं कि मैं ही ब्रह्म हूँ, लेकिन इतना भर कह दें कि ब्रह्म है तो आपको ब्रह्मज्ञान हो गया। जैसे ही आप मैं ब्रह्म हूँ कहते हैं तो बहुत से लोगों को यह होता है कि ब्रह्म का अनुभव हो सकता है; क्योंकि मैं यहाँ हूँ ब्रह्म वहाँ है तो आप देख सकते हैं इसमें अज्ञान आ गया है। इसमें कल्पनाएँ, अवधारणाएँ और मान्यताएँ आ गई है; इसलिए यदि आपको ब्रम्हज्ञान नहीं हुआ एकता का दर्शन नहीं हुआ तो अब यह कहना ठीक नहीं होगा कि मैं ब्रह्म हूँ। जिस तरह से आपको आत्म परिचय नहीं हुआ तो यह कहना ठीक नहीं होता कि मैं आत्मा हूँ इसी तरह से ब्रम्हज्ञान का भी है।
आपको इस प्रश्न का उत्तर मिल सकता है कि एकता क्यों है? वह चैतन्य क्यों है? क्योंकि एक ही है और यदि वह एक ही है तो चैतन्य होगा, उसको स्वयं ज्ञान होगा। यदि वह दो होता तो आप कह सकते थे कि एक दूसरे का ज्ञान असंभव था। यदि दोनों के बीच में संपर्क नहीं हो तो वह ज्ञान असंभव होगा। आप कल्पना कर सकते हैं कि एक तरफ़ अनुभव है एक तरफ़ अनुभवकर्ता है और के दोनों बीच में संपर्क नहीं है ऐसी आप कल्पना कर सकते है थोड़ी देंर के लिए मान सकते हैं तो तर्क के प्रयोग से आप देखेंगे कि दोनों में संपर्क नहीं होता तो अनुभव का अनुभवकर्ता को ज्ञान नहीं होगा; यानी कि जब अनुभव नहीं है तो अनुभवकर्ता भी नहीं होगा जो हमारे प्रत्यक्ष प्रमाण के विपरीत है; क्योंकि हमें प्रत्यक्ष अनुभव क्या है? प्रत्यक्ष ज्ञान क्या है कि अनुभव भी है अनुभवकर्ता भी है। यह बड़ा ठोस स्पष्ट ज्ञान है। इसके बारे में शंका नहीं हो सकती। तो इसका अर्थ यह है कि अनुभव और अनुभवकर्ता संपर्क में है। अब आपको यह देखना है कि कितनी दूर है अनुभव अनुभवकर्ता के। यदि संपर्क में हैं तो दूर भी हो सकते हैं। फिर यह भी हो सकता है बीच में कुछ प्रक्रिया चल रही हो! तो आप देखेंगे दूरी भी नहीं है, अंतराल भी नहीं है, समय भी नहीं है बीच में; यही खोज हमने किए हैं। अभी यही प्रयोग किया और देखा कि दोनों में कोई दूरी नहीं है; क्योंकि दूरी होती तो हमें उसका भी किसी न किसी तरह अनुभव का होता, लेकिन हमारा प्रत्यक्ष प्रमाण उसका नहीं है। अनुभव और अनुभवकर्ता के बीच में दूरी नहीं मिलेगी। यदि सत्य एक है तो यही होना चाहिए; यदि दो सत्य होते तो दोनों के बीच में संपर्क नहीं होता और आपको कभी उसका ज्ञान नहीं हो सकता था; चेतना और अनुभव एक साथ नहीं मिलते थे कभी; तो क्योंकि ऐसा नहीं है। इस मार्ग से भी आ सकते हैं, एकता तक पहुँच सकते हैं। आप यह प्रयोग कर सकते हैं दोनों को विभाजित करने का और संपर्क काटने का। अनुभव और अनुभवकर्ता के बीच जो संपर्क है उसको काट दें, अब आप देखेंगे न अनुभव रहा, न अनुभवकर्ता रहा, न कोई ज्ञान रहा, न कोई चित्त की वृत्ति होगी; क्योंकि चित्तवृत्ति भी अनुभव है। यह असंभव है; इसलिए जो दूसरी संभावना है एक होने की वही बचती है। एकता है दो नहीं है, द्वैत नहीं है; क्योंकि हमारा सारा ज्ञान चित्त के मध्यम से आता है तो विभाजन तो होना ही है। चित्त है तो विभाजन तो होगा ही। हमें अद्वैत का दर्शन नहीं होता; इसलिए उसको एकता नहीं कहा जाता है, उसको अद्वैत कहा जाता है। इतना भर कह दिया जाता है कि दो नहीं है; यह मुझे स्पष्ट ज्ञान है, इसका मुझे प्रमाण मिला है, लेकिन उसको एकता कहना भी उचित्त नहीं है; क्योंकि एकता नहीं दिखेगी आपको। चित्त के मध्यम से तो द्वैत ही दिखेगा, दो ही दिखेंगे, अनुभव और अनुभवकर्ता ही दिखेंगे, लेकिन क्योंकि आपको उसमें दूरी भी नहीं दिखाई देती, कोई संबंध भी कोई प्रक्रिया भी नहीं दिखाई देती तो आप यही कह पाएंगे कि दो नहीं है; इसलिए अद्वैत यह कहना अधिक उचित्त होता है। जैसा कि हमने देखा अनुभवकर्ता का कोई पदार्थ नहीं है, उसका कोई धरातल नहीं है, उसका कोई आधार नहीं है। यदि मैं चित्त से पुछूँ कि अनुभवकर्ता किस पदार्थ से बना है? या क्या है जो अनुभवकर्ता के रूप में दिखाई देता है? यदि आप चित्त से पुछे आपने बुद्धि से पुछे तो आपको कोई उत्तर नहीं मिलेगा; क्योंकि अनुभवकर्ता का चेतना का कोई पदार्थ नहीं है, कोई धरातल नहीं है। उसका कोई तत्व या सत्व नहीं है। उसमें शून्य ही दिखाई देता है, उसके पिछे केवल चेतना मात्र ज्ञान होता है। चेतना है अनुभवकर्ता है; इसलिए मैं कहता हूँ कि मैं अनुभवकर्ता हूँ वह किस पदार्थ से बना है वह आपको कभी ज्ञान नहीं होगा शून्यता का। आपको ज्ञान होगा कि शून्यता अनुभव कर रही है।
इसी तरह से आप अनुभव पर भी दृष्टि डालें तो अनुभव के पिछे जो है अनुभूतियाँ है।अनुभूतियाँ इंद्रिय जनित है। इंद्रियों के सामने परिवर्तन है, परिवर्तन नादरचना है। नादरचनाओं का कभी अनुभव नहीं होगा या नादरचनाओं का कोई पदार्थ नहीं है। नाद कहाँ हो रहा है किस वस्तु में, किस पदार्थ में, किस धरातल पर नाद हो रहा है? उसका ज्ञान कभी नहीं होगा। तो जो नाद है वह भी शून्य है, शून्यता का नाद है; इसलिए अनुभव के पीछे भी शून्यता है; क्योंकि अनुभव और अनुभवकर्ता एक ही है। दोनों का जो धरातल है, दोनों का जो तत्व है वह शून्यता है। अनुभवकर्ता भी शून्य है, अनुभव भी शून्य है और दोनों एक ही है। अनुभवक्रिया मात्र है, वह भी शून्यता है। तो ब्रह्म का सार शून्यता है। ब्रह्म का जो धरातल है अस्तित्व का जो मूल है अस्तित्व का जो पदार्थ है वह शून्यता है। ऐसा कुछ नहीं है जो अनुभव और अनुभवकर्ता के रूप में प्रकट हो रहा हो ऐसा कुछ भी नहीं है। इसका कभी ज्ञान नहीं होगा। यह मैंने इसलिए कहा; क्योंकि बहुत लोगों की अवधारणा होती है कि कुछ बड़ी चीज़ होगी, बड़ा पदार्थ होगा, कोई बड़ा सत्य होगा जो ब्रह्म है। ऐसा नहीं है, ऐसा कुछ भी नहीं है, आपको कभी दिखाई नहीं देगा जो ब्रह्म है वह आपको नहीं दिखाई देगा। यदि आप देखने जाएँगे आप प्रश्न के ऊपर प्रश्न करेंगे तो आपको शून्यता मिलेगी; इसलिए जो परम सत्य है उसको शिव कहा गया है। शिव का अर्थ है शून्यता। शिव जो है शव से निकला है। शव यानी जो नहीं है वहाँ से शिव निकला है; इसलिए शिवोहम कहा गया है। मैं ही शिव हूँ या शिव मैं हूँ। जो भी है वह शिव है, अस्तित्व शिव है तो वही ज्ञान है, लेकिन दूसरे शब्द में अहम ब्रम्हस्मि या शिवोहम एक ही तरह की चित्त की स्थिति को दिखाता है। जहाँ से यह महावाक्य निकले हैं वह समाधि के स्थिति से निकले हैं, ब्रह्मज्ञान से ही निकले हैं; क्योंकि शून्य में कुछ नहीं होता। शून्य में कुछ घटित नहीं हो सकता, शून्य शून्य ही रहता है। शून्य से कुछ उपजता नहीं है; इसलिए ब्रह्म में कोई घटना नहीं होती। ब्रह्म में कोई अनुभव नहीं होता, ब्रह्म में कोई अनुभवकर्ता भी नहीं होता। ब्रह्म में न कभी कुछ हुआ है, न कभी होगा, न हो रहा है यह शून्यता का ज्ञान है। जरा कठिन है, लेकिन इस पर भी आत्मविचार कर सकते हैं कि द्वैत से अद्वैत में कैसे से जाएँ और अद्वैत से शून्यता तक कैसे आएँ। यह दो तीन चरण है जिसके बारे में आपको बैठकर अच्छे से चित्त शांत करके सभी समस्याओं को बाजु में करें। उस पर ध्यान न दें और तरह-तरह की जो भावनाएं अवधारणाएं आपके मन में हैं तरह-तरह के कल्पनाएँ आपने जो सोच रखा है सब को हटा दें अपनी मन से और शुद्ध अनुभव अपरोक्ष अनुभव पर ध्यान दें, आपको दिखेगा कि शून्यता है; जो एकता के रूप में मिलती है। अनुभव और अनुभवकर्ता की एकता जो है ब्रह्म के रूप में दिखाई देती है; क्योंकि चित्त है उसमें और उसका द्वैत के रूप में ही अनुभव होता है। दो के रूप में ही अनुभव होता है; एक के रूप में नहीं। अनुभव कई तरह के हैं। चित्त की परतों के अनुभव हैं तो हजारों तरह के अनुभव होंगे; क्योंकि अहम का अनुभव है और अहम जो है चित्तवृत्ति है अहंकार की क्रिया है; इसलिए अनुभवकर्ता अहम के पीछे छुप जाता है। आप ध्यान से देखेंगे तो अहम का कार्य है अनुभवकर्ता को छुपाना। यदि शरीर पर स्थित है अहम तो मन को छुपा देता है; सभी शारीरिक क्रिया को मैं कह देता है। यदि वह मन पर स्थित है तो मानसिक क्रिया को मैं कह देता है; अनुभवकर्ता मन के पिछे छुप जाता है। यदि मन के भी ऊपर बुद्धि के ऊपर है तो चेतना पर स्थित है और कहता है कि मैं अनुभवकर्ता हूँ, मैं चैतन्य हूँ। यदि वहाँ से भी उसको हटा दिया जाए तो कहता है कि मैं ब्रह्म हूँ।
यह जो अहम के क्रिया है; इसलिए यह माया को जन्म देती है कि मैं शरीर या यह प्राणी हूँ जो जगत का अनुभव कर रहा हूँ, यहीं जीना यहीं मरना है। यह जो अज्ञान है जीवन के लिए उपयोगी है; इसलिए पकड़ के हम बैठते हैं इसको। प्राणी जो है जीव जो है सारा जीवन इसी अज्ञान में ही विताता है। यदि आप प्रश्न चिह्न लगाएँगे यदि आत्मविचार करेंगे इस तरह से तो यह अज्ञान दूर होता है और मुक्ति होती है। मुक्ति का अर्थ अज्ञान से मुक्ति है। मुक्ति का अर्थ यह नहीं कि आप किसी अच्छी जगह पहुँच जाएँगे, कहीं स्वर्ग में यह मूर्खता है। मोक्ष शून्यता के दर्शन है। जब शून्य हो गया तो आपको किस चीज़ से मुक्ति मिलेगी? आप पूरी तरह से मुक्त है जो चाहे वह हो सकते हैं; क्योंकि शून्यता है वह कुछ भी हो सकती है। वह किसी भी रूप में दिखाई दें सकती है। यदि शून्य नहीं होती कुछ पदार्थ होता तो उतना ही होता, कभी बदलता नहीं। क्योंकि बदलाव है क्योंकि परिवर्तन है; क्योंकि माया है; क्योंकि कुछ भी अनुभव हो सकता है उसका कारण यह है; क्योंकि शून्यता है। यह आत्मविचार है, ब्रम्हज्ञान है, इसके ऊपर कुछ नहीं है। कोई आपको कहे कि मुझे इस से भी ऊपर बड़ा अनुभव हुआ है तो ऐसा कुछ नहीं है, इस भ्रांति में न रहे। शून्यता के ऊपर क्या होगा? और अधिक शून्य क्या होगा? कुछ बहुत से लोगों ने समझा, बहुत से लोगों ने शिक्षा देंने के प्रयास किया, बहुत से बड़े गुरुजन हुए है, बहुत से शिक्षक हुए है, आपको जो भी पसंद है, आपको जो भी इच्छा है आप उस मार्ग पर चल सकते हैं। कई मार्ग है, लेकिन शिखर एक ही है, शिखर ब्रह्म है, शिखर शून्य है।
एक प्रश्न है कि अगर अनुभव और अनुभवकर्ता एक ही है तो फिर तादात्म्य एवं साक्षीत्व को कैसे समझें ? तादात्म्य मतलब कि जब हम किसी एक अनुभव या वस्तु से जुड़ जाते हैं जैसे हम लोग जब चित्रपट में फ़िल्म देखते हैं और उस क्यरेक्टर के साथ जुड़ जाते हैं उसका कथा को अपना कथा समझ लेते हैं वह हँसता है तो हम हँसने लगते हैं रोता है तो रोने लगते हैं इस तरह से तादात्म्य स्थापित करना कह सकते हैं जो द्रष्टा है वही दृश्य है तो साक्षीत्व करने के लिए उससे अलग होना पड़ेगा तो यदि दोनों एक ही हैं तो तादात्म्य और साक्षीत्व को कैसे समझें?
यह दोनों चित्तवृत्ति है; क्योंकि ध्यान केंद्रित करना चित्त की क्रिया है। जब ध्यान अनुभव पर होगा तो मुझे अनुभवकर्ता विलीन होता हुआ दिखाई देगा, अनुभवकर्ता का ज्ञान नहीं होगा, ध्यान के बाहर होगा; इसलिए जो भी होगा वह अनुभव ही दिखाई देगा। यदि मेरा ध्यान शरीर पर जाता है तो मैं कहता हूँ कि मैं शरीर हूँ। तो इसका अर्थ यह है कि शरीर के साथ आसक्ति हो गई है शरीर के साथ तादात्म्य हो गया है। यह ध्यान की क्रिया है, ध्यान की वृत्ति है। यदि उसी समय कोई बताए कि नहीं देंखो यह तो शरीर है, तुम वह हो जो शरीर का अनुभव करता है; तो ध्यान जो है वह अनुभवकर्ता की ओर मुड़ जाएगा तो यह साक्षीत्व है। दोनों चित्तवृत्ति है तो दोनों में ब्रह्मज्ञान नहीं होगा। दोनों में एकता का ज्ञान नहीं होगा। या तो वह रहेगा जिससे आसक्ती है, या तो वह रहेगा जो देख रहा है। जो दिख रहा है और जो देख रहा है इन दोनों के बीच में ध्यान चलता रहेगा; इसलिए आपको ध्यान जो है बीच में केंद्रित करना है। अनुभवकर्ता और अनुभव दोनों के ऊपर आपको ध्यान देंना है जो आप अभी प्रयोग कर सकते हैं। इसके मैं अनुभवक्रिया कहता हूँ और इसी को लोग समाधि कहते हैं या तथाता कहते हैं या तूर्या भी कहते हैं। किसी भी तरह के अनुभव हो उस पर आप ध्यान न दें और वह जो अनुभव कर रहा है उसको भी ढूँढने का प्रयास न करें बीच में रहें, सम स्थिति में रहें, चित्त को बीच में रखें तो आपको एकता का दर्शन होगा।
प्रश्न: जैसे मुझे कानों के माध्यम से आवाज़ सुनाई दे रहा है तो मैं ध्यान बीच में रखना चाहूँ तो मुझे क्या करना होगा?
पहला तो यह देखना कि जो आवाज़ है वह कहीं बाहर नहीं है, केवल अनुभूति है और मानसिक अनुभूति है; इतना आप देख सकते हैं?
जी।
हाँ। आवाज़ का अनुभव कहाँ है? तो आप पाएंगे की यहाँ है। उसका कोई स्थान नहीं है। अब इतना होने के बाद अनुभवकर्ता पर दृष्टि डालेंगे, उस पर ध्यान डालेंगे तो अनुभवकर्ता कहाँ मिलेगा? आपको वह भी यहीं मिलेगा। अब आपको यह दोनों अवधारणाओं को भूलना है कि अनुभवकर्ता पिछे है और अनुभव आगे है। केवल अनुभवक्रिया है वह आवाज़ की; उतना ही देखना है और आपको यह पता चलेगा कि न अनुभवकर्ता है न अनुभव है, केवल एक अनुभवक्रिया मात्र है, दृष्टि मात्र है। यदि आप कहेंगे कि अनुभव है तो आपका ध्यान जो है आवाज़ की तरफ़ चला जाएगा; यानी कि आप अनुभवकर्ता को भूल गए हैं। यदि आप कहेंगे कि अनुभवकर्ता है तो आपका ध्यान अनुभव से हट गया है; अब वह जो देख रहा है उस तरफ़ ध्यान है। यह दोनों स्थितियों में नहीं रहना है; बीच में रहना है। केवल इतना सा ध्यान आपको देंना है कि अनुभवक्रिया मात्र है। उसका कोई क्रिया नहीं है, उसका कोई प्रक्रिया नहीं है कि जो आप करें मन के अंदर और बीच में आ जाएँ- ऐसा नहीं है। आपको दोनों छोड़ना पड़ता है; अनुभवकर्ता का ध्यान छोड़ना पड़ता है और अनुभव का भी ध्यान छोड़ना पड़ता है। बाद में क्या बचेगा? यह छोड़ने के बाद जो बचेगा वह अनुभवक्रिया बचेगी। इसको आप अभी करके देख सकते हैं। यदि आपका ध्यान पूरी तरह से अनुभव पर केंद्रित है तो आप द्वैत में है। यदि आपका ध्यान पूरी तरह से अनुभवकर्ता पर केंद्रित है; यानी ज्ञान है कि अनुभवकर्ता है- तो भी द्वैत में है। यदि आप दोनों को हटा देतें हैं तो एकता का ज्ञान होगा; अद्वैत का ज्ञान होगा। ऐसे ही प्रश्न कर सकते हैं कि जो आवाज़ है, जो आवाज़ का अनुभव है और जो अनुभव कर रहा है उस आवाज़ को, दोनों के बीच में दूरी कितनी है? यह आप प्रश्न कर सकते हैं और फिर से अनुभव में जाकर आप देखने का प्रयास करें कि दूरी कितनी है? तो चित्त जो है आपने आप समाधि पर आ जाता है, यह एक तरीक़ा है। या तो आप दोनों को भूलने का प्रयास करें कि अनुभव और अनुभवकर्ता दोनों पर ध्यान केंद्रित करें या दोनों पर से ध्यान हटा दें तो अनुभवक्रिया का ज्ञान होगा। यदि आप अनुभव और अनुभवकर्ता में अंतराल ढूँढने का प्रयास करें जो भी अनुभव है, आवाज़ है या कुछ भी है तो चित्त आपने आप समाधि में आ जाता है, आपने आप बीच में आ जाता है। उत्तर यही आएगा कि दोनों में कोई अंतराल नहीं है, कोई अन्तर नहीं है; दूरी नहीं है। यह प्रयोग आप कर सकते हैं।
यदि आपका चित्त इधर-उधर जा रहा है तो इसका अर्थ यह है कि चित्तवृत्ति के बाहर नहीं आया वह अभी। इसके लिए एक और सरल तरीक़ा है। आप आँखें बंद कर सकते हैं और जो सुनाई दें रहा है कानों से उसको एक तरह से भूल जाएँ कि जो भी आवाज़ आ रही है। शरीर कि जो अंदरूनी अनुभव है, जो अनुभूति है उसको भी भूल जाएँ थोड़ी देंर के लिए, मन में जो भी चल रहा है उसको भी थोड़ा सा बाजु में रख दें तो आपको एक ही अनुभव बचेगा वह है आँखों के सामने अंधेरे का अनुभव। एक ही अनुभव होगा कि अँधेरा है। अब इस अंधकार में और जो अंधकार का साक्षी है, उसमें दूरी ढूँढने का प्रयास करें। यह और आसान हो जाता है; यानी कि आपने इंद्रियाँ बंद कर दिए हैं अपनी, आपको इसके लिए साधना करनी पड़ेगी, इंद्रियों को भूलना एक तरह की साधना है। मन को थोड़ा सा नियंत्रण करना है। वह चलता रहता है, घोड़े की तरह दौड़ता रहता है। उसको एक जगह शांत कर देंना और उसके बाद जो चिदाकाश में यानी कि इस को चित्त का आकाश भी कहते है; जहाँ पर सारे अनुभव होते हैं। चिदाकाश में जो अंधकार है उसमें और अनुभवकर्ता में दूरी ढूँढने का प्रयत्न करें; क्योंकि अनुभवकर्ता भी चिदाकाश में ही होगा; तो इस अंधकार में चिदाकाश में आपको एकता का ज्ञान होगा। फिर एक के बाद एक आप अपनी इंद्रियाँ और मानसिक प्रक्रिया वापस ला सकते हैं और फिर से दोहरा सकते हैं यह प्रयोग। जैसे कि भावना चल रही है और जो भावना का साक्षी है उन दोनों के बीच में क्या अन्तर है? उन के बीच में कितनी दूरी है? तो दोनों का विलोप होगा। भावनाएँ भी नहीं रहेगी और जो भावनाओं साक्षी है वह भी नहीं रहेगा। एक अनुभवक्रिया रहेगी, समाधि रहेगी, तथाता रहेगा, तो यही ब्रम्हज्ञान है। इससे अधिक कुछ नहीं होगा, आपको और कोई अनुभव नहीं होगा; क्योंकि लोगों की अपेक्षा रहती है कि कोई बड़ा अनुभव मिलेगा मुझे ब्रह्मज्ञान के नाम पर; लेकिन ऐसा कुछ नहीं है, बहुत छोटा बहुत सरल अनुभव ही मिलेगा। यह प्रयोग कोई भी कर सकता है; बहुत आसान है। या तो आप चरणबद्ध तरीक़े से कर सकते हैं या तो सीधे कर सकते हैं। जैसे कि आपने जो प्रयोग किया शुरू में वह सीधे प्रयोग है। चरणों में भी जा सकते हैं। आँख बंद कर लें, अपनी संज्ञाओं को भूल जाएँ, आप अपनी सारी इंद्रियों को भूल जाएँ और बैठने की इतनी साधना कर लें कि बैठे होने का जो ज्ञान है, शरीर से जो अनुभूतियाँ आ रही है वह तक भूल जाएँ। थोड़ी देंर तक बैठे तो भूल जाते हैं कि कोई बैठा है; शरीर बैठा है। योगी यही कर रहा है। फिर उसके बाद तीसरा चरण है कि जो मानसिक प्रक्रिया चल रही है, मन को शुद्ध कर लें तो वह उसका जो दौड है वह बंद हो जाती है और चिद्दाकाश शुद्ध हो जाता है। वहाँ पर भी आप ढूँढने जाएँ कि अनुभवकर्ता कहाँ है? तो आपको अनुभवक्रिया के रूप में दिखाई देगा। यह चरणबद्ध तरीका है। आप सीधे जाना चाहे तो किसी भी अनुभव और अनुभवकर्ता में भेद ढूँढने के प्रयास करें। चाहे आपकी उससे आसक्ति हो गई हो या फिर अनासक्ति हो गई हो। या फिर आप कहें कि वह वस्तु मैं नहीं हूँ; मैं अनुभवकर्ता हूँ। या फिर आप कहें कि अनुभवकर्ता नहीं है, केवल वस्तु मात्र है। तो यह दोनों चरम सीमा हैं; उनके बीच में आपको रहना है। किसी प्रक्रिया से हो या सीधे हो दोनों तरीक़े से ब्रम्हज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। जैसे ही आपका चित्त कहने लगे कि नहीं यह इस तरह का अनुभव होना चाहिए; या फिर आपके स्मृति में जाने लगे चित्त कि कभी मुझे ऐसा अनुभव होता है कभी वैसा अनुभव होता है तो यह चित्तवृत्ति है; आपको वहाँ नहीं जाना है। पिछले जो भी अनुभव हुए है आप वह भूल जाएँ। अभी इस समय प्रकट क्या है आपका वह प्रत्यक्ष अनुभव है; उस पर ध्यान दें। पिछला क्या हुआ था, स्मृति में क्या था, इतना उपयोगी नहीं रहेगा। आत्मविचार यही है कि जो भी स्मृति में है उसको मिटाकर शुद्ध जो अपरोक्ष अनुभव है उस पर प्रश्न चिह्न लगाया जाए।
प्रश्न यह था कि अनुभव और अनुभवकर्ता में क्या भेद है? तो उसका उत्तर एक ही आएगा कि कोई भेद नहीं है। यदि आपको कोई भेद दिखाई देता है तो फिर से शुरू करें; क्योंकि चित्त ने भेद कर दिया है, चित्त समाधि में नहीं है; इसलिए वह आपको कोई न कोई भेद लाकर दिखाएगा। बुद्धि के द्वारा आप देख सकते हैं कि केवल कल्पना है, उसका कोई यथार्थ नहीं है। सीमा रेखा खींच देगा चित्त, लेकिन वह काल्पनिक होगी। यह जरा कठिन है। यदि आपको आत्मज्ञान हो गया है तो थोड़ा आसान हो जाता है और यदि आत्मज्ञान नहीं हुआ सीधे आप ब्रम्हज्ञान लेने का प्रयास करेंगे तो मैं और अनुभव के बीच में चित्त सीमा रेखा खिचेगा। मैं का विलोप होना मैं यानी कि अहम का नष्ट होना आवश्यक है ब्रम्हज्ञान होने से पहले। यदि आपका अहंकार शक्तिशाली है तो चित्त कि वृत्ति इतनी बड़ी होगी, बड़ी बाधा होगी कि वह आपको देखने नहीं देगा। हमेशा एक सीमा रेखा खिंचेगा यह तो मैं हूँ। पहले अहम को नष्ट करें। जब आपका अहम से पीछा छूटता है तो ब्रम्हज्ञान आसान होता है। जब मैं ही नहीं हूँगा तो आप कहाँ सीमा रेखा खिचेगें? जब अनुभवकर्ता भी यहीं है, अनुभव भी यहीं है तो दोनों एक सिक्के की तरह दो चेहरे है; क्योंकि दोनों हमेशा एक साथ ही होते हैं तो एक ही हो सकता है। यदि एक नहीं होता तो दोनों में संपर्क भी संभव नहीं था, द्वैत होता तो संपर्क भी नहीं होता दोनों में, फिर दोनों ही नहीं होते जो प्रत्यक्ष अनुभव नहीं है। सत्य की एक विशेषता है कि सत्य हमेशा आपके सामने होता है, बदलता नहीं है। ब्रह्मज्ञान आपको सत्य का ज्ञान कराता है। यह हमेशा आपके सामने था, आपका अज्ञान था कि दो है। ज्ञान क्या है? अद्वैत है। यदि सब कुछ शून्य है तो किसी भी अनुभव का अर्थ नहीं है, किसी भी अनुभवकर्ता का कोई अर्थ नहीं है तो इसका क्या लाभ है? इसका क्या उपयोग है? आप कहेगें बहुत अनुपयोगी तरह का ज्ञान हुआ। तो मेरा एक ही सुझाव है- इसमें फ़ायदा नुकसान ढूढ़ने का प्रयास न करें। यह पूरी तरह से अनुपयोगी है आपके जीवन के लिए, लेकिन इसका प्रभाव आपके जीवन पर पड़ेगा। यदि आपको ब्रम्हज्ञान हो गया है, आत्मज्ञान हो गया है तो प्रभाव आपके जीवन में दिखाई देंने लगेगा। पहला प्रभाव तो यह होगा कि अहम का नाश होगा, अहंकार की क्रिया क्षीण हो जाएगी; इतना शक्तिशाली नहीं रहेगा और उसका आपके व्यवहार पर प्रभाव दिखाई देगा। बहुत लोग आपको कहने लगेंगे अब यह वह नहीं रहा जो पहले था, बदल गया है; क्योंकि अहम वृत्ति कम हो गई है, अहंकार का नाश होने लगा है। यह जो अहंकार का वृत्तियाँ होती है काम, क्रोध, लोभ, मोह यह चली जाएँगीं। जो पशु वृत्ति है सब से पहले वह नष्ट होने लगेगी; क्योंकि समाधि में आप हमेशा रहने लगेगें। समाधि का प्रयोग एक बार आपने किया तो फिर आप उसको छोड़ नहीं सकते हैं; क्योंकि परम सुख है, आनंद है; इसलिए सच्चितानंद कहा है उस ब्रह्म को; क्योंकि वह सत्य भी है, चित्त भी है, आनंद भी है। आपको एक बार यदि चित्त को वहाँ रखने की आदत हो गई तो चित्त वहाँ से हटने को भी तयार नहीं होगा। वह इतना आनंददायी है न सुख है, न दुःख है, न किसी तरह के संघर्ष है, न किसी तरह के कोई झंझट है वहाँ पर; कुछ भी नहीं है, शून्यता है।
आप देखते हैं जो योगी हैं वह घंटों-घंटों वहाँ बैठे रहे हैं कहाँ है वे? क्या कर रहे हैं? क्या दिख रहा है उनको शून्य में? उनको तो उसमें ही रस लगता है, शून्य में ही आनंद है। जहाँ कुछ नहीं है वहाँ आनंद ही होगा। आपको दूसरा प्रभाव दिखेगा कि आपका सारा जीवन आनंद की पृष्ठभूमि में चलेगा। बाहर जो हो रहा है उसे प्रभावित नहीं होंगे, तो यह लाभ है या हानि है अब आप विचार करें। वह आपको चुनाव करना है, लेकिन आपका जीवन वैसा का वैसा ही चलेगा उसमें कुछ फर्क नहीं आएगा। तो इसका न कुछ लाभ है न कोई हानि है, लेकिन आपका अहम जो है मिट जाएगा और जो अहम की क्रियाएं है वह भी मिट जाएँगीं। अहंकार की सब से बड़ी क्रिया है जीवित रहना या शरीर में अनुभव करने की इच्छा। सारी इच्छा शरीर की इच्छा है। आपका कोई इच्छा है क्या? कोई नहीं है। आपके जो भी मानसिक छोटी मोटी इच्छा होती है वह इतनी नहीं होती। अधिकतर इच्छा शरीर की होती है, बलशाली इच्छा होती है। जब अहम ही नहीं रहेगा तो उसके इच्छा भी नहीं रहेगी और दोबारा से शरीर का अनुभव करने की इच्छा भी समाप्त हो जाती है। जन्म लेने की, शरीर के रूप में रहने की वृत्ति भी चित्त से चली जाती है। यह शरीर से मुक्ति है, यही जन्म मरण से मुक्ति है। आप कह सकते हैं यह बहुत से लोगों के लिए घाटे का सौदा है; क्योंकि न मैं रहूँगा, न शरीर रहेगा, न पुनर्जन्म रहेगा। यदि आपको लगता है कि घाटा है तो फिर ब्रम्हज्ञान की तरफ़ न जाएँ; आपको घटा हो सकता है। कुछ लोगों का ब्रह्मज्ञान ही जीवन का लक्ष्य होता है। ज्ञानमार्ग सीधा मार्ग है, आपको सीधे ब्रह्मज्ञान की और ले जाता है। उसके बाद जो भी परिवर्तन होते हैं चित्त में वह अपने आप होते हैं। चित्त अपने आप मुक्ति की और जाता है। क्या करना पड़ता है? आप को कुछ नहीं करना है समाधि में रहने के लिए। जब भी कुछ करने जाएँगे तो समाधि से बाहर आ जाएँगे। जो अकर्म की क्रिया है उसे समाधि मिलती है। यदि लोग कहते हैं समझना बहुत कठिन है तो जब तक आपको समाधि का स्वाद नहीं मिलेगा, समाधि के जो शब्द है समाधि का जो भाषा है वह भी समझ नहीं आएगी। बहुत लोगों को समझ में नहीं आता है कि योगी जो है वह गुफा में क्यों बैठे रहते हैं कई सालों तक तो उनकी बुद्धि के बाहर है; क्योंकि रस अभी तक चखा नहीं है चित्त ने समाधि का। पहले प्रयोग करें फिर प्रश्न करें। उससे आपको बहुत आसान हो जाएगा। बिना प्रयोग के प्रश्न करेंगे तो तरह-तरह के प्रश्न ही रहेंगे; क्योंकि अध्यात्म में प्रायोगिक जीवन है। उसमें कुछ भी सैद्धांतिक नहीं है, जब भी आता है प्रश्न तो प्रयोग के द्वारा ही मिल सकता है उसका उत्तर। जिन्होंने प्रयोग नहीं किया प्रयास करें और शून्यता की तरफ़ अग्रसर हों; क्योंकि बहुत अच्छी चीज़ है शून्यता। उससे डरने की आवश्यकता नहीं है; क्योंकि वही सत्य है। यदि आप कहेंगे कि मैं शून्य नहीं होना चाहता तो एक तरह का अज्ञान है; क्योंकि आप पहलेसे ही शून्य है। शून्यता आपको कुछ घटाती नहीं है, शून्यता आपको कम नहीं कर देंगी। शून्यता तो आपको दिखाएगी कि जिसका आपने कुछ मान लिया था वह नहीं है, वह माया का अंत है, माया अंत ही मुक्ति है। इस तरह से ब्रह्मज्ञान मुक्ति का मार्ग है। ब्रह्मज्ञान की शुरुआत आत्मज्ञान से होती है, आत्मज्ञान की शुरुआत अहंकार का नाश से होती है। बहुत सीधा मार्ग है, बहुत सरल भी है। अभी चलेगें तो शायद कुछ दिनों में या कुछ महीनों में ही पहुँच जाएँगे शून्यता में। उसके बाद क्या? आप पुछ सकते हैं! उसके बाद भी शून्यता ही होगी। आप ध्यान दें कि शून्यता में न कभी कुछ हुआ है, न कभी कुछ होगा। तो इसके बाद क्या? उसके बाद क्या? यह सब चित्त में आने वाले भ्रम है; कल्पना है।
आप थोड़ा प्रयोग करें कुछ दिन तक। पहले आत्मज्ञान के प्रयोग करें। अहम का नहीं होने का ज्ञान आत्मज्ञान है। जब आत्मज्ञान में स्थिर हो जाएँ तो उसके बाद ब्रम्हज्ञान का प्रयोग करें। ब्रह्मज्ञान के प्रथम चरण जो मैंने किया जिससे मुझे सफलता मिली वह मैंने आपको बताया। और भी कई तरीक़े हो सकते हैं। प्रथम चरण है अनुभव को एकीकरण करें। जब आपको इसमे शंका आया तो ढूँढ के प्रश्न कर करके शंका मिटाएँ। और फिर अनुभव और अनुभवकर्ता का एकीकरण करें। कई तरीक़े के प्रयोग बताए हैं; कई तरह के प्रश्न मैंने बताए है। कई चरणों में कर सकते हैं, जिस तरह से योगी करता है। योगी पहले शरीर को ठीक करता है ताकि शरीर का साधना हो जाए, ताकि शरीर को भूल सके। इंद्रियों को वश में करता है; यानी कि जो यम नियम और इस तरह के जो अष्टांग योग है, करता है, ताकि इंद्रियाँ बीच-बीच में न आए ब्रम्हज्ञान के। फिर मन को बश में करने के प्रयत्न करता है। ध्यान, प्रत्याहार और धरणा का ताकि मन बीच में न आए। अहम नष्ट हो जाता है और उसके बाद जो है समाधि की स्थिति आपने आप आने लगती है। वह भी एक बहुत अच्छा मार्ग है। जिन्हें ज्ञानमार्ग से सफलता नहीं मिलता उसको योगमार्ग से जाना चाहिए। योग में प्रयास लगता है, ज्ञानमार्ग में कोई प्रयास नहीं लगता। ज्ञानमार्ग के लिए बुद्धि आवश्यक है। यदि आपको कभी समझ में न आए कि सारे अनुभव एक क्यों है तो क्षीण बुद्धि है। ऐसे व्यक्ति को योगमार्ग से जाना चाहिए। योगमार्ग में आपने आप अनुभव हो जाएगा, सारे अनुभव एक ही हैं। ऐसे कई मार्ग है, ज्ञानमार्ग सब से आसान है, सब से सरल है। जिन के बुद्धि तेज़ है उनको पाँच मिनिट्स लगता है, जो कगार पर है उनको दो मिनट लगता है। बहुत से लोगों को अनुभव यह होता है कि यह तो मुझे पहलेसे पता था, मैं तो पहलेसे ही ब्रह्मज्ञान में हूँ, पहलेसे ही एक हूँ, पहलेसे ही अद्वैत में हूँ। बहुत कम होते हैं ऐसे लोग, लेकिन होते हैं। उनकी साधना का फल है।
प्रश्न
पूर्ण ज्ञान होने पर भी और शून्यता का सुख जानकर भी धीरे-धीरे मन क्यों वापस विचारों की दुनिया में द्वैत में लाकर खड़ा करता है?
तो उसका एक ही अर्थ है कि अभी तक पूरी तरह से चित्त ब्रम्हज्ञान में स्थापित नहीं हुआ है। पतंजलि का श्लोक आपको याद होगा कि जब योग में नहीं होता चित्त तो चित्तवृत्ति का अंत नहीं होता। उसकी तरह-तरह की स्थितियां होती है। पाँच तरह के वृत्तियों में लगा रहता है। आपको एक ही काम करना है; जो भी अनुभव आपके आस-पास हो रहे हैं और अनुभवकर्ता जो उसका साक्षी है दोनों एक ही है। यदि आप यह चेतना हमेशा रखें, बार-बार चित्त को स्थिर करें समाधि में तो धीरे-धीरे उसका आदत हो जाती है। यह आदत की बात है, यह साधना की बात है। जितना प्रयोग करेंगे उतना चित्त स्थिर होता जाता है। यदि वह न भी हुआ तो भी कोई बढी बात नहीं है; क्योंकि वह शून्यता में ही है। चित्त को ज्ञान नहीं है, शून्यता से दूर हो गया हूँ यह अज्ञान भर भी जाए तो भी वह सत्य से दूर नहीं हो सकता; क्योंकि शून्यता या ब्रम्ह या अद्वैत ही सत्य है। चित्त की कोई भी स्थिति हो सत्य सत्य ही रहेगा। जब चित्त अपने अनुभव से प्रतिक्रिया कर रहा हो तो उस समय हो सकता है कि भूल जाए थोड़ी देंर के लिए, लेकिन जब आप शांत होकर एक जगह बैठे, वापस आ जाएँ तो फिरसे स्मरण करके फिर से प्रयोग करें। फिर से समाधि में जाएँ, फिर से चेतना को वापस लाएँ। यह मैंने बहुत बार कहा है कि तीन चरणों में चेतना बढ़ती है। पहला चरण यह है कि जब चित्त खो जाता है अनुभव में उसके कई घंटों बाद कई दिनों के बाद आप के चेतना का जन्म होती है। चित्त कहेगा कि यह मैंने क्या किया? मुझे ऐसा नहीं करना था? यह जो चेतना का जन्म कभी कभी घंटों में होता है, कभी-कभी मिनटों में होता है, कुछ लोगों में सालों बाद होता है। दूसरा चरण यह है कि जब चित्त विचलित हो; यानी कि प्रतिक्रिया कर रहा हो अनुभव से कैसा भी अनुभव हो तो उस समय जब चेतना जागृत होती है कि यह मैं ठीक नहीं कर रहा हूँ या इस अनुभव से मैं विचलित हो रहा हूँ। यहाँ चेतना जो है दूसरे चरण पर पहुँच गई है। तीसरे चरण में कुछ भी अनुभव होने के पहले चेतना वहाँ पहुँच जाती है, अनुभव बाद में होता है। यह तीन चरण है चेतना को बढ़ाने का या उसके साधना का।
चेतना यानी क्या? चेतना यानी यह ज्ञान कि न अनुभव है, न अनुभवकर्ता है, एकता है, शून्यता है। इसमें बहुत ज़्यादा प्रतिक्रिया करने की आवश्यकता नहीं है। आप कहेंगे कि फिर मैं जीवित कैसे रहूँगा? ऐसा वैसा। ध्यान दें कि जीवित रहना भी चित्तवृत्ति है। ऐसा संभव नहीं होगा कि आज से ही जीवन समाप्त हो जाए। धीरे धीरे धीरे वह भी समाप्त हो जाएगा। शरीर का अंत करना जीवन का अंत नहीं है; चित्तवृत्ति का अंत करना जीवन का अंत है जो हर तरह के अनुभव का अंत है। फिर आप देखेंगे वही स्थिति अभी भी है। चित्तवृत्ति भी शून्यता है; वह भी नहीं है, वह भी माया है, वह भी प्रतीति मात्र है, वास्तव में है नहीं। आप कैसे भी जाएँ आप सत्य पर ही हैं। बस कभी-कभी उसकी याद नहीं रहती; भूल जाते हैं। यह तो ब्रह्मज्ञान की एक विशेषता है कि आपको एक बार ब्रह्मज्ञान हो गया तो आप इस सत्य से हट नहीं सकते भले ही कोई किसी भी तरह की वृत्ति हो चित्त की। पूरा जीवन आप अज्ञान में बिता दें तो भी अगली बार आपका जो चित्त है याद रखेगा, उसका प्रभाव पड़ेगा। एक बार भी ब्रह्मज्ञान हो गया तो मुक्ति निश्चित हो जाती है। आपने देखा होगा बहुत से ज्ञानीओं ने लिखा हुआ ग्रन्थ है जैसे कि अवधूत गीता का आख़िरी श्लोक यही है कि जो भी यह ज्ञान प्राप्त करता है उसका पुनर्जन्म नहीं होगा। यह श्लोक एक तरह से आशीर्वाद की तरह रहता है, ज्ञानी ने आशिर्वाद दिया है आपको। पढ़ने मात्र से कभी-कभी ब्रह्मज्ञान हो जाता है। बहुत से किताबें हैं, अबधूत गीता है या अष्टाबक्र गीता है, पढने मात्र से ब्रह्मज्ञान तक पहुँच सकते हैं। जो कगार पर हैं जो तैयार हैं शून्यता में गिरने के लिए उनको एक दो श्लोक बहुत होते हैं। आपने एक बार भी वह अनुभव कर लिया, एक बार भी आपको ज्ञान हो गया तो उसको भूल भी गए तो भी कोई फर्क नहीं पड़ता। परिवर्तन हो जाता है चित्त में। यदि आप बार-बार करते रहें तो बहुत तेज़ होता है परिवर्तन। चित्त की जो विकासक्रम है बहुत तेज़ हो जाता है। अजीबोग़रीब घटनाएँ होने लगेंगे आपके जीवन में, जहाँ अभी हम नहीं जा सकते; क्योंकि यह माया है। माया ताश के पत्तों को घर है, आप एक पत्ता खींच लें तो सारा का सारा ताश के पत्तों का घर गिर जाता है। ब्रम्हज्ञान वह एक पत्ता है जो सबसे नीचे है। वह आपने खींच लिया तो सारी की सारी माया जो है नष्ट होने लगती है। यदि गुरु नहीं है तो आपको गुरु मिल जाएगा, तरह-तरह की घटनाएँ होंगी। आपके जो संस्कार काटने लगेंगे, जलने लेगेंगे, मिटने लगेंगे, बहुत तेज़ हो जाएगा विकास। यह ज्ञानीओं का, योगीयों का, आध्यात्मिक जो शिष्य है उनका अनुभव है कि ऐसी घटनाएँ होती है। यह इसलिए हो रहा है; क्योंकि चित्त बदल रहा है, चित्त का विकासक्रम तेज़ हो गया है; विलीनता की और जा रहा है चित्त। विकासक्रम यानी कि चित्त का विलीन होना। कुंडलिनी के शब्द में कहें तो कुंडलिनी ऊपर जा रही है। शक्ति के शब्द में कहें तो शक्ति शिव की तरफ़ जा रही है; शिव; यानी कि शून्यता। हर चीज़ को शिव नष्ट करता है, चित्त नष्ट होता है, हर अनुभव नष्ट हो जाता है। जब तक जीवन है एक आध्यात्मिक मार्गी को यही सब करना है। बाक़ी हो या न हो कोई रुचि नहीं होती फिर आप देखेंगे सबसे पहला यही प्रभाव पड़ता है कि अनासक्ति होती है- यह क्यों कर रहा हूँ मैं? कुछ कुप्रभाव भी पड़ सकते हैं। जैसे कि लोग अपना घर बार छोड़ देतें हैं कभी-कभी। यदि आप ज्ञानमार्ग पर है तो बुद्धि का प्रयोग आप करेंगे और इतना कठिन मार्ग आप नहीं चुनेंगे। कोई आवश्यकता नहीं है। घर बार आपका वैसे भी नहीं है, वैसे भी शून्य ही है। जो नहीं है उसको आप कैसे छोड़ेगे? है न? यह सब करने की आवश्यकता नहीं है। कुछ लोग कहते हैं नहीं मुझे शरीर छोडना है, नहीं मुझे वह करना है, यह करना है। जो नहीं है वह नहीं छुटेगा, प्रयास न करें। केवल यह देंखें कि शून्यता है; बाक़ी आपने आप होगा। जो तांत्रिक है तंत्र विद्या से कर रहा है शरीर से मुक्ति; वह आप अपने घर में बैठे-बैठे कर सकते हैं। चाहे ऐसे ज्ञान होगा या वैसे ज्ञान होगा, लेकिन यही ज्ञान होगा। कोई आपको कहे कि इससे ऊपर भी ब्रह्मज्ञान होता है, बड़ा अनुभव मैं दिलता हूँ, वह सब मूर्खता है। आध्यात्मिकता पैसे कमाने का धन्दा हो गया है। यह बहुत आसान है, बहुत सरल है, इसका कोई अनुभव नहीं है, न आत्म का अनुभव है न ब्रम्ह का अनुभव है। अज्ञान दूर करना आत्मज्ञान और ब्रम्हज्ञान है; जो बैठे-बैठे ही मिल सकता है। जरा सा मार्गदर्शन चाहिए होता है, कोई शंका हो कोई प्रश्न हो तो जरा सा उसका उत्तर चाहिए होता है वह मिल जाता है। जितना आप प्रयोग करेंगे उतना प्रश्न आपके आयेंगे और जितने उत्तर आयेंगे उतने आपका प्रयोग अच्छा होता जाएगा। मैं यह करता हूँ और सुझाव देता हूँ कि आप भी यह करें। मनुष्य जीवन में और कुछ नहीं है करने का; किसी भी कार्य का कोई अर्थ नहीं है। यह सारी बातें तभी समझ में आएगा जब आपको एक बार आत्मज्ञान और ब्रह्मज्ञान का स्वाद मिल जाएगा। जो होता है जीवन में होता रहेगा। यदि आप जीवन को मोड़ने के प्रयास करें, उसको बदलने के प्रयास करें तो वह भी एक अज्ञान का ही सूचक है। अज्ञानी ही आपने आस पास की चीज़े, ख़ुद को और शरीर को बदलने प्रयास करता है; क्योंकि अभी तक अज्ञान गया नहीं है। यह सब शून्य है, यह सब माया है, यह सब प्रतीति है, यह सब चित्तवृत्ति है, अभी तक गया नहीं है यह अज्ञान। एक बार वह अज्ञान भी दूर हो जाए तो फिर आप देखेंगे कोई करता नहीं है, यह कर्मयोग है। सब कुछ करना है यह जानते हुए कि न करने के बराबर है, यही कर्मयोग है। कर्मयोगी भी वहीं पहुँच रहा है जहाँ ज्ञानी पहुँच रहा है और भक्त ने तो यह सब कुछ पहले से जान लिया है। किसी भी अनुभव का कोई अर्थ नहीं है तो सभी मार्ग आपको शून्यता तक ही पहुँचाएँगे। जहाँ बुद्ध ने आपको सीधे पहुँचा दिया था थोड़ा सा घूम फिर कर भी आ सकते हैं। कोई बड़ी बात नहीं है, उसमें कोई बड़ी समस्या नहीं है, आपकी जैसी रुचि हो वैसे कर सकते हैं। ब्रम्हज्ञान के बाद कुछ भी जानना जो है एक तरह समय नष्ट करने के बराबर है। फिर भी हम सत्संग जारी रखेंगे। मैं आपको माया के बारे में, मायावी ज्ञान के बारे में थोड़ा बहुत बताऊंगा चित्त की क्या वृत्ति है। बहुत से लोगों को यह होता है कि ज्ञान होने के बाद चित्तवृत्ति अपने आप बंद हो जाती है तो माया का ज्ञान कभी कभी काम आता है।
प्रश्न
एक भय है कि आत्मज्ञान ब्रम्हज्ञान के पश्चात संसार से पूर्ण अरुचि न हो जाए!
पहली बात तो यह है कि यह संसार नाम की कोई चीज़ नहीं है। उसमें जो रुचि है वह भी माया है। सांसारिक रुचि भी माया है तो बड़ा कुछ आपको नुकसान नहीं होने वाला है। यदि अरुचि आपको होगी तो आपको समाधि में रुचि बढ़ेगी; तो आपका जो डर है वह भी कल्पनिक है। मैंने काफ़ी ब्रह्मज्ञानी देंखें हैं, आत्मज्ञानी तो बहुत हैं किसी का भी सांसारिक जीवन कुछ गड़बड़ नहीं हुआ है, नष्ट नहीं हुआ आज तक। एक दो होते होंगे जो अज्ञानी होते हैं, मतलब जिस को पूरा ज्ञान नहीं हुआ जो सोचते है कि संसार छोड़ने के बाद ही ब्रह्मज्ञान होगा। ऐसा संभव नहीं है। जो नहीं है अब उसको कैसे छोड़ सकते हैं? जो माया है वह कहाँ जाएगी? क्योंकि जो है नहीं उससे छुट्टी कैसे होगी? जो नहीं है केवल यह जानना है कि वह माया है। इतना काफ़ी है उसके बाद संसार चलता रहता है और शरीर चलता रहता है। जैसा कि गीता में लिखा है- कुशलता के साथ आपका काम करना सांसारिक कर्म करना ही कर्मयोग है; क्योंकि वही सच्चा योगी करता है। जब कुछ मिलने की संभावना नहीं है; कुछ खोने की भी संभावना नहीं है तो कुशलता आपने आप आ जाती है। जब डर है कि कहीं यह छूट न जाए, कहीं नुकसान न हो जाए, या लालच है मुझे यह चाहिए, मुझे वह चाहिए तो जो भी अनुभव होता है वह दुःख से भरे होते हैं, संघर्ष से भरे होते हैं, उनको शांति नहीं होती। आपने देखा होगा जो भी आप चाहते हैं मिल जाए तो भी शांति नहीं होती है। शांति कहाँ होती है उसमें? संसार में रुचि है तो भी शांति नहीं है। संसार कितना भी अच्छा लगे तो भी प्रसन्नता नहीं है। सुख नहीं है, आनंद नहीं है तो उसमें रुचि होने के बाद भी आपको आनंद नहीं मिलेगा। यह ध्यान रखें कि जो माया है वह भी ब्रह्म है। द्वैत अद्वैत में ही है। द्वैत अलग अद्वैत अलग ऐसा नहीं है। द्वैत का जो अनुभव है वह अद्वैत का ही अनुभव है। चित्त ने मान लिया है कि द्वैत है। जब यह ज्ञान हो जाता है तो आपके लिए द्वैत भी अद्वैत हो जाता है। फिर संसार भी उतना ही आनन्दमय हो जाता है जितना कि समाधि। धीरे-धीरे आपको यह समझ में आने लगेगा। अभी तो लगता है कि क्या कह दिया है? यह तो कोई अर्थ नहीं निकलता; बड़े बड़े लोग कहते हैं ऐसा। मेरे भी कभी समझ में नहीं आया है कि इस संसार में आनंद कैसे हो सकता है? और समाधि सुख कैसे हो सकता है जब कुछ भी न हो ऐसे कोई कैसे बैठ सकता है बिना कुछ किए? धीरे-धीरे यह समझ में आने लगता है तो यह जो डर है वह आपने आप चला जाएगा। जो आवश्यक है वह होगा; क्योंकि मैं नहीं हूँ तो कोई करने वाला भी नहीं है, कर्ता नहीं है, केवल कर्म रह जाते हैं और उनका भी कर्ता नहीं होता; तो डर भी आपने आप चला जाएगा। जैसे कि मैंने कहा प्रायोगिक है। यदि आप यह सारी चिंताएँ लेकर प्रयोग करेंगे तो फिर आगे बढ़ने कि संभावना नहीं है। सबकुछ भूल के चित्त को एकाग्र करें। हमने जब ज्ञानदीक्षा पर सत्संग की थी तो मैंने कहा था कि जो ज्ञानी का पहला गुण है वह है मुमुक्षत्व; यानी कि बहुत तीव्र इच्छा मोक्ष की। बुद्धि नहीं है तो चलता है, बुद्धि आ जाती है, यदि स्वास्थ्य नहीं हो तो चलता है, स्वस्थ हो सकते हैं, मानसिक कोई समस्या है तो भी चलता है, लेकिन मुक्ति की इच्छा नहीं हो तो कुछ भी नहीं होगा, आगे नहीं बढ़ पाएंगे। श्रवण, मनन, निदिध्यासन आत्मविचार, समाधि यह प्रयोग है, यह प्रायोगिक मार्ग है।
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