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ज्ञानतरंगः "साक्षीभाव"
जानकी
"ज्ञानतरंग" सद्गुरूदेव श्री तरुण प्रधान जी द्वारा विभिन्न सत्संग, प्रवचन और लेखों में व्यक्त किए गए कुछ मुख्य विचारों का संकलन है। इस भाग में "साक्षीभाव" से संबंधित कुछ ज्ञानतरंगों को प्रश्तुत किया गया है। यह श्रृखला के रुपमें इससे आगे भी क्रमश: प्रकाशित होता रहेगा। <br><br><div class='ui image'><img width='1200px' src='images/89426796-download.jpg'></div><br><br> **साक्षीभाव** १- आत्मज्ञान के बाद अपने स्वरुप में स्थित होना ही साक्षीभाव है; यही "स्वस्थ" होना है। २- साक्षीभाव कोई विचार या भावना नहीं, ज्ञान का परिणाम है। ३- जब सम्पूर्ण चित्त ज्ञान से प्रकाशित होता है वह साक्षीभाव है। ४- साक्षीभाव अनुभवकर्ता नहीं है उसका प्रतिबिंब है। ५- साक्षीभाव वृत्तियों का द्रष्टा बनना है, वृत्तियोंको बंद करना नहीं है। ६- दृष्टिकोण अनुभव से बदलकर अनुभवकर्ता का हो जाए तो वह चेतना है। ७- स्वप्न से जागना चेतना है; चेतना में जो भी होता है खेल की तरह होता है, उसमें आनंद होता है। ८- साक्षीभाव भी चित्तवृत्ति ही है लेकिन वह चित्तवृत्ति है जो अन्य सभी चित्तवृत्तियों का नियंत्रण करती है। ९- साक्षीभाव भी मिथ्या है लेकिन माया के स्तर पर यही महत्वपूर्ण है। १०- चेतना चित्तवृत्ति है इसलिए अनुभव मान सकतें हैं लेकिन कोई विशेष अनुभव नहीं है। ११- जो अभी का अनुभव है उसको ज्ञान से प्रकाशित करें तो वही चेतना है। १२- चेतना कोई जादू नहीं, प्राकृतिक घटना है। १३- ज्ञानी में जिस समय जो आवश्यक है वहीं वृत्ति सक्रिय होती है। १४- ज्ञान के लिए प्रयास लगता है, चेतना के लिए नहीं; ज्ञान होने पर चेतना स्वयं प्रज्वलित होगी। १५- जहाँ स्वयं होने में शंका है वहाँ ज्ञान भी नहीं साक्षीभाव भी नहीं है। १६- कुछ न करना साक्षीभाव नहीं है, साक्षीभाव में कर्म अधिक कुशलता से होगें। १७- साक्षीभाव में कर्म प्रकाशित करने का अर्थ अज्ञान का अंधकार हटाकर ज्ञान स्मरण के साथ कर्म करना है। १८- चेतना और ध्यान दोनों चित्त की स्थिति है; चेतना में अनुभवकर्ता और अनुभव का ज्ञान रहता है, ध्यान बिना चेतना के भी हो सकता है। १९- अनुभवकर्तायुक्त ध्यान चेतना है। २०- ध्यान में जहाँ ध्यान होता है उसी बात यानि कि ध्यान वस्तु पर ध्यान रहता है और उसीका अनुभव होता है। जब यह अनुभव अनुभवकर्ता के साथ मिलाया जाता है तो वह चेतना हो जाती है। २१- ध्यान चेतना तक पहुँचने की सीढ़ी है। २२- ध्यान एक क्रिया है, चेतना स्वयं को जानना है। २३- जिनका ध्यान अच्छा नहीं है वे और जो ध्यान में ही अटक गए हैं वे भी चेतना तक नहीं पहुँच पाएँगे। २४- चेतना ध्यान से ऊपर की अवस्था है। २५- साक्षी के ऊपर ध्यान जा ही नहीं सकता; ध्यान देने के लिए कोई वस्तु चाहिए, अनुभव चाहिए; साक्षी का ज्ञान ज़रूर होगा और वह ज्ञान विचार के रूप में आएगा। २६- अनुभवकर्ता ध्यान का विषय/वस्तु नहीं है। २७- कोई चित्तवृत्ति, बौद्धिकवृत्ति या स्मृति को चेतना समझना अज्ञान है। २८- सभी अनुभव जिस प्रकाश में प्रकाशित हो रहे हैं यही चेतना है, जो इसी क्षण प्रत्यक्ष है। २९- यदि अनन्य ध्यान में चेतना है तो वह साक्षीभाव है; और यदि समावेशी ध्यान में चेतना है तो वह अनुभवक्रिया है। ३०- यदि मैं की अवस्था चित्तवृत्ति पर है तो वह वृत्ति न अनुभव को पकड़ पाती है न अनुभवकर्ता को। ३१- कोई भी वृत्ति "मैं" नहीं हूँ। वृत्ति से ऊपर उठकर "मैं" कि स्थिति अनुभवकर्ता पर लाना चेतना है। ३२- जो अभी के सामान्य अवस्था है वही सहज समाधि है जो नित्य है। ३३- सहज समाधि को जानने के लिए सभी वृत्तियों के साथ चेतनायुक्त अवस्था होनी चाहिए। ३४- जब चेतना सभी अवस्था में स्थिर हो जाती है वही तुर्या है। ३५- साधना और ज्ञानार्जन के लिए आलस्य और समर्पण दोनों अवस्था में प्रयत्न नहीं लगता। ३६- आलस्य कुछ ना जानने की वृत्ति है; कुछ नहीं जाना जा सकता, प्रयत्न से प्रगति नहीं होती; यह समर्पण है। ३७- रोग ठीक होने के बाद औषधी आवश्यक नहीं है। ३८- जैसे सूर्य दिन में एक ही बार निकलता है वैसे ज्ञान भी जीवन में एक ही बार होता है। ३९- अनुभवकर्ता का ज्ञान होने वाला ज्ञान है, रटने या दिखने वाला ज्ञान नहीं। ४०- वाद-विवाद और तर्क-वितर्क बुद्धि के स्तर तक सीमित है; चेतना के स्तर पर मौन है। ४१- पशुपक्षीयों में प्राकृतिक चेतना होती है। इसीलिए आने वाले विपदा को पहले ही जान लेते हैं, संकेत देते हैं और सुरक्षित रहते हैं। मनुष्य में अहम् के कारण प्रकृति से सम्पर्क ही टूट गया है। ४२- अनुभव और अनुभवकर्ता का विलय योग है; चित्तवृत्ति रुकना योग नहीं; योग चित्त की अवस्था नहीं है। ४३- चित्तवृत्ति को रोकना असंभव है, शुद्ध किया जा सकता है, उसके बाद चित्तवृत्ति माया जान पड़ती है; तब योग प्रकट होता है। ४४- सारा प्रयास चित्तशुद्धि के लिए लगता है; योग तो पहले से है। ४५- साक्षीभाव में इच्छा, विचार आदि आना अज्ञान नहीं है, उस पर कोई मान्यता या कल्पना आना, उसको सत्य मानना अज्ञान है। ४६- विचार ज्ञान के हो या अज्ञान के वे साक्षी नहीं है; साक्षीभाव के लिए ज्ञान के विचार आ सकते हैं लेकिन विचार को सत्य मानना अज्ञान है। ४७- अज्ञान की विषेशता है कि सामने चमकता हुआ सूर्य हो तो भी अंधेरा ही दिखेगा। ४८- ज्ञान और साक्षीभाव से चित्त शुद्ध होता है; चित्त शुद्धि से विकास तेज़ हो जाती है। ४९- जब बुद्धि एक स्तर तक विकास होती है तो चेतना प्रकट होती है; बुद्धि वह सीढ़ी है जो बुद्ध तक पहुंचाती है। ५०- सालों साल पुराना अंधकार भी दीया जलाते ही क्षण भर में प्रकाशित हो जाता है। ५१- अचेतन में कर्म अंधकार में होते हैं और चेतना में वही कर्म प्रकाश में होते हैं। ५२- चेतना के प्रकाश में व्यक्ति जो चाहेगा वह करेगा; जो करेगा वह शुद्ध होगा। ५३- चेतना चित्त पर आधारित है। यदि चित्त शुद्ध है तो चेतना रहती है अशुद्ध है तो नहीं रहती। ५४- साक्षीभाव से अशुद्धि जाएगी नहीं। साक्षीभाव इलाज नहीं है; साक्षीभव में अशुद्धियाँ और शुद्धिकरण का उपाय भी प्रकाशित होगें। ५५- साक्षीभाव में वृत्तियाँ बंद नहीं होगें, दुगुना भी हो सकते हैं; लेकिन ज्ञान के प्रकाश में दिखेगें; द्रष्टा पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। ५६- साक्षीभाव में जो ज़रूरी नहीं वह अपने आप रुकेगा, जो ज़रूरी है वह चलेगा॥ ५७- शक्ति में संवेदना, बुद्धि, चेतना, आदि है लेकिन ब्रम्हप्रकाशद्वारा प्रकाशित है। ५८- साक्षीभाव जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य होना चाहिए, साक्षी से प्रेम होना चाहिए; तब साक्षीभाव को भूलना असंभव होगा। ५९- साक्षीभाव का जाना-आना प्राकृतिक है। ६०- साक्षीभाव स्वाँस लेने से भी सरल है, प्रयासहीन प्रयास है। ६१- साक्षीभाव साधनाहीन साधना है; कर्महीन कर्म है। ६२- प्रयास से और कोई भी कर्म से चेतना नहीं आती; कर्महीनता, प्रयासहीनता से चेतना आती है। ६३- ज्ञान प्रसार चेतना लाने का उपाय है। ६४- जिसका सही मार्ग है उसमें ज्ञान बीज कहीं नहीं जाएगा; यदाकदा विस्मरण से घबराना नहीं चाहिए। ६५- प्रतिकुल परिस्थिति में साक्षीभाव को माया के बाढ़ बहा ले जाती है; अधिक तेज़ करने का संकल्प लेना चाहिए। ६६- साधक जितनी प्रगति करता है उतनी बड़ी परीक्षाएँ होती है। ६७- कठिन परिस्थिति और परीक्षा के समय में उस परिस्थिति से बाहर आने की शक्ति भी साथ में मिल जाती है। ६८- जो भी करते हैं चेतना में करें; बदलाव अपने आप आएगा। ६९- अधिक नियंत्रण का प्रयास प्राकृतिक नहीं है; साक्षीभाव में जहाँ पर आवश्यक है कर्म अपने आप होगा; जहाँ नहीं वहाँ अपने आप रुकेगा। ७०- जो जागृति में जगा नहीं है उसका जीवन सोया हुआ है, जो जागृति में जगा है उसकी चेतना प्रकाशित है; उसको सब दिखाई देगा। ७१- जो व्यक्ति दो नाव पर सवार है वह तो डूब जाएगा। ७२- ज्ञानमार्ग में अंत में सभी साधना छुड़ाया जाता है। ७३- अज्ञान के लिए बहुत प्रयास लगता है, ज्ञान के लिए नहीं; ज्ञान होते ही चेतना प्रकट होनी चाहिए। ७४- साधना में कुछ जोड़ना नहीं घटाना ज़रूरी है। जो बाधा है वह तो विलकुल जोड़ना नहीं; साधना सरलीकरण है। ७५- आम लोग में यह धारणा है की आध्यात्मिक/साक्षीभाव की साधना बहुत कठिन है; बल्कि यह साधना सबसे आसान और शक्तिशाली है। ७६- साक्षीभाव की साधना जीवन को प्राकृतिक बनाती है, अनेक उलझने जोड़कर जटिल बनाना विफलता है। ७७- चेतना का विस्तार अधिक ज्ञान से नहीं मिलता; चेतना का विस्तार उसका प्रयोग में है। ७८- चेतना स्मृति में नहीं है, वर्तमान में "स्व" में स्थित होना है। ७९- केवल याद करने से चेतना नहीं मिलेगी, विचार मिलेगा, जो स्मृति से उभरा है; चेतना में होना होता है। ८०- कोई भी साधना जब तक कष्टदायी नहीं तब तक सामान्य है, जब कष्ट देने लगे तो छोड़ देना चाहिए। ८१- चेतना के साथ शक्ति शिव में मिल जाती है; इसलिए आत्मज्ञान सृष्टि की सबसे बड़ी घटना है। ८२- साधना अपने आप में मिथ्या है, माया का भाग है। एकता का ज्ञान होने के बाद साधना बेकार है; फिर भी जब तक मन अंधकार में जाता रहेगा तब तक साक्षीभाव के साधना आवश्यक है। ८३- अनुभव का कोई स्थान नहीं है; स्थान अनुभव है, सारे अनुभव का स्थान चेतना है, चेतना का कोई स्थान नहीं। ८४- साक्षीभाव इस सृष्टि में सबसे प्रभावकारी साधना है। ८५- योग्य और सच्चा साधक जो चाहता है वह करता है। ८६- ज्ञान होना ही बड़ी कृपा है; विचित्र घटना होना कृपा या प्रगति नहीं है। ८७- ज्ञान और साक्षीभाव का प्रभाव तथा आध्यात्मिक परिवर्तन बाह्य नहीं आंतरिक रूप से होता है। ८८- ज्ञान के बाद सरल, सात्विक जीवन जीना चाहिए। ८९- साक्षीभाव प्राकृतिक रुपसे आएगा, प्रगति अपने आप होगी। ९०- मैं और मेरा भाव ही अहमवृत्ति है, यह जीवन के लिए ज़रूरी है; अहमवृत्ति नाश हुआ तो जीव भी नाश हो जाएगा। ९१- शब्द और साधना वह नाव है जो अज्ञान का नदी पार करने में सहायक है; नदी पार करने के बाद नाव को वहीं छोड़ना चाहिए। ९२- गुरु ही शब्द देता है, ज्ञान के ओर संकेत करता है, नाव देता है, नदी पार करवाता है; और पार होने के बाद गुरु ही उसको छुड़वाता है। ९३- सरलता में जो शक्ति है वह किसी में नहीं; क्योंकि अस्तित्व सरल है। ९४- समाधि में आना अपने घर आना है और अन्य अवस्था में रहना यात्रा पर जाना है। ९५- अस्तित्व की अवस्था समाधि की है; हर क्षण समाधि है। ९६- ज्ञानमार्ग में ज्ञान होने के बाद जब शुद्धीकरण शुरू होगा तब सारे योग, ध्यान, प्राणायाम, क्रिया, आसन, समाधि सभी वहीं के वहीं हो जाते हैं, सभी मार्ग एक साथ होते हैं। ९७- चेतना में सुख और मुक्ति है, इसीलिए आपने आप आ जाती है। यदि दूसरी वृत्ति बलशाली है तो चेतना को भी हटा देती है। ९८- अवस्थाएँ चित्त की हैं, मेरी कोई अवस्था नहीं; मैं एक ही अवस्था में हूँ "सच्चिदानन्द"। ९९- जिस वर्तन के नीचे आग जल रही है वह गर्म हो ही जाता है। १००- चित्त के बिना चेतना या ज्ञान नहीं हो सकता। चित्त ही अज्ञान और ज्ञान का करण है। वही चित्त अज्ञान और दुःख देता है, वही चित्त मुक्ति और ज्ञान भी देता है; दृष्टि किस तरफ़ है उस पर निर्भर करता है। क्रमश:
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