ज्ञानाक्षर
एक रुचि पूर्ण विश्लेषण
रमाकांत शर्मा
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एक रुचिपूर्ण विश्लेषण आप इस अस्तित्व में स्वामी की भूमिका में हैं क्यों कि आप ही अस्तित्व हैं। परन्तु आप तत्वतः मात्र साक्षी हैं। आपका एक मुख्य प्राशासनिक अधिकारी है उसका नाम है चेतना। चेतना का उत्तर दायित्व स्वामी और सीईओ के बीच अनुभव के रूप में सम्वाद और साथ साथ एक बिलगाव बनाए रखना है। मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) है जिसका नाम है चित्त। चित्त अपने आगे का क्रिया तंत्र स्वयं स्थापित करता है और अनुभव के रूप में सीधा संवाद स्वामी तक पहुंचाता है। कुछ काल बीत जाने पर स्वामी पार्श्व (परदे) के पीछे हो जाता है। चित्त की समस्त लीला का स्वामित्व चित्त की अहंवृत्ती ले लेती है और मैं तथा मेरा का खेल कभी मन बन कर, कभी बुद्धि, शरीर, वस्तुएँ, भाव, विचार, इच्छाएं इत्यादि बन कर चलता रहता है। चित्त निर्मित तंत्र में फंसा रहता है। जब एक जीव जगत में मारधाड़ करते हुए, सब कुछ प्राप्त करने के बाद भी, अतृप्त रहता है, तब उसको संसार असार अनुभूत होता है, और विरक्ति होती है। तब वो सत्य की खोज करता है। यहाँ उसको गुरु मिलते हैं और उसके सत्य स्वरुप आत्मन में स्थित करवाते हैं। पुनः चित्त (सीईओ) से पूर्ण परिचय करवा कर, चेतना (मुख्य प्राशासनिक अधिकारी) बना कर कुछ काल उसका प्रयोग करवा कर अस्तित्व में स्वामी की भूमिका में प्रतिष्ठित करवाते हैं। तो ये चक्र लीला मात्र है जो सनातन काल से चला आ रहा है। जहाँ भी हैं आनंद में रहना है। ॐ श्री सद्गुरुवे नमः।