ज्ञानाक्षर
परिभाषाएँ एवं उद्धरण (हिन्दी)
रोशन
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परिभाषाएँ एवं उद्धरण *यह अनुवाद गुरु तरुण प्रधान जी के ज्ञानाक्षर में प्रकाशित (Definitions And Quotes) अंग्रेज़ी लेख का जेमिनी की सहायता से ज्ञान के संरक्षण एवं प्रसार के उद्देश्य से किया गया सरल भाषान्तरण मात्र है; किसी भी त्रुटि हेतु विनम्रतापूर्वक क्षमाप्रार्थी हैं।* यह लेख मुख्यतः अध्यात्म अथवा दर्शन के क्षेत्र में नए आए लोगों हेतु है, परन्तु यह वरिष्ठ जिज्ञासुओं और नवीन शिक्षकों को भी लाभान्वित करेगा। **आपका क्या आशय है? ** ज्ञान की खोज के दौरान यह अक्सर होता है कि साधक किसी शिक्षक से मिलते हैं, जिन्हें वे पसंद करते हैं और उनके तथा उनके वचनों से तुरन्त मोहित हो जाते हैं। परन्तु यह भी होता है कि ये जिज्ञासु कही गई बातों को पूर्ण रूप से नहीं समझते, विशेष रूप से, उन्हें व्याख्यान में प्रयुक्त महत्त्वपूर्ण शब्दों के अर्थ ज्ञात नहीं होते। इसका परिणाम अधूरा ज्ञान होता है अथवा निकृष्टतम परिस्थितियों में, जैसे-जैसे वे अधिक से अधिक शिक्षकों को सुनते हैं, उनकी अज्ञानता बढ़ती जाती है। यह पुस्तकों के सन्दर्भ में भी हो सकता है, विशेष रूप से प्राचीन धर्मग्रन्थों में, जहाँ अर्थ और परिभाषाएँ कभी-कभी पूर्ण रूप से लुप्त होती हैं अथवा किसी अन्य व्यक्ति द्वारा किसी अन्य भाषा में व्याख्यायित की जाती हैं। कभी-कभी भाषाएँ इतनी प्राचीन होती हैं कि सही अर्थ कोई नहीं जानता। समस्या तब अधिक विकट हो जाती है जब पाठ काव्य, गीत अथवा गूढ़ सांकेतिक भाषा के रूप में होता है। अनेक जिज्ञासु यह सब भूल जाते हैं, त्याग देते हैं अथवा कहीं सुने या पढ़े गए शब्दों और वाक्यों के अर्थों की खोज करना आरम्भ कर देते हैं। अनेक लोग इस कहानी से सम्बन्ध स्थापित करेंगे। स्पष्ट है, यह इसलिए होता है क्योंकि ये जिज्ञासु व्यवस्थित रूप से अध्ययन नहीं करते हैं। प्रायः वे किसी स्थापित प्रणाली, परम्परा, मार्ग अथवा गुरु से जुड़े नहीं होते हैं। अतः इसका शुद्ध प्रभाव समय की बर्बादी और अर्थहीन शब्दों से भरा हुआ मन होता है। **सामान्य जन अथवा नवीन साधक परिभाषाओं और अर्थों से कैसे निपटते हैं? ** प्रायः वे भ्रमित हो जाते हैं और इसके विषय में भूल जाते हैं। कुछ अपनी रुचि का एक काल्पनिक अर्थ मान लेते हैं। कुछ निश्चित होते हैं कि उन्हें अर्थ जानने की आवश्यकता नहीं है, "मुझे तो पहले से ही ज्ञात है" यह उनकी प्रिय पंक्ति होती है। "शब्द ज्ञान नहीं लाते, इसलिए कोई भी शब्द ठीक है" वे ऐसा मानते हैं। कुछ लोग केवल अपनी मातृभाषा में अनुवाद माँगते हैं, और उन्हें जो कुछ भी प्राप्त होता है, उससे सन्तुष्ट हो जाते हैं, प्रायः उनके पास यह सत्यापित करने का कोई साधन नहीं होता कि अनुवादित संस्करण सही है या नहीं। कुछ अधिक समर्पित होते हैं, वे अन्तरजाल (Internet), विश्वकोषों पर खोज करते हैं या शब्दकोश में देखते हैं, जहाँ यदि वे भाग्यशाली हों, तो उन्हें किसी चीज़ का एक स्पष्ट अर्थ मिल सकता है, परन्तु प्रायः उन्हें कम से कम २० परिभाषाएँ या अर्थ मिलते हैं, जिनमें से अनेक उनकी स्वयं की भाषा में अनुवादित होने पर कोई अर्थ नहीं बनाते। अतः, प्रायः वे अंधेरे में तीर चलाते हैं और कोई भी सुविधाजनक अर्थ चुन लेते हैं। कुछ अपने माता-पिता या मित्रों से, या शायद ही कभी अपने विद्यालय/महाविद्यालय के शिक्षक से पूछ सकते हैं, जो अपनी स्वयं की विविधता प्रदान करते हैं, और कभी-कभी विशेषज्ञ होने का दिखावा करते हैं। "मुझे ज्ञात नहीं है" ये शब्द कम ही सुनने को मिलते हैं। अनेक बार, जो पहला अर्थ वे सुनते या पढ़ते हैं, वही उनके लिए एकमात्र 'वास्तविक' अर्थ बन जाता है, वह एक प्रकार की सिद्धांत स्थापना (Indoctrination) बन जाती है, और उसके बाद वे परिभाषाओं को सुधारने या सही करने अथवा एक नया अपनाने या एक बेहतर व्याख्या स्वीकार करने से अस्वीकार कर देते हैं। यह संकीर्ण-मनस्कता प्रभावी ढंग से उनकी प्रगति को रोक देती है। निःसन्देह, कभी-कभार, वे परिभाषाओं और अर्थों को बिल्कुल सही पाते हैं, परन्तु यह विरल है। आप शीघ्र ही देखेंगे कि यह इतना विरल क्यों है। **किसी वस्तु को परिभाषित क्यों करें?** हाँ, हम सब सरल रूप से काव्य का प्रयोग करने के लिए सहमत क्यों नहीं हो सकते? यह सुनने में सुन्दर लगेगा, परन्तु पूर्णतः निरर्थक होगा। कल्पना कीजिए कि आप किसी उपकरण, सॉफ्टवेयर अथवा यन्त्र के लिए एक निर्देशिका सुन्दर काव्य और अज्ञात रहस्यमय शब्दों में पढ़ रहे हैं। अथवा एक भौतिकी शिक्षक छात्रों को पढ़ाते समय जैसे-जैसे बोलते जाते हैं, हवा से शब्द बनाते जाते हैं और उन्हें प्रतिदिन बदलते रहते हैं। प्रभावी सम्प्रेषण हेतु उचित परिभाषा अनिवार्य है। परिभाषा ठोस होनी चाहिए और अन्ततः एक वास्तविक अनुभव की ओर संकेत करनी चाहिए। अनुभव से, हम सीखते हैं, हम किसी बात को निश्चित रूप से जानते हैं, अन्यथा नहीं। हम शब्द, भाषा और अर्थ चुनने के लिए स्वतंत्र हैं, परन्तु एक बार जब यह सम्बन्ध स्थापित हो जाता है, तो सन्देश पूर्ण रूप से प्रसारित होने तक इसे परिवर्तित नहीं होना चाहिए। **हम शब्दकोश का प्रयोग क्यों नहीं कर सकते? ** निश्चय ही, आप कर सकते हैं, परन्तु यह केवल रोज़मर्रा के शब्दों के लिए ही कार्य करता है। और अनेक शब्दों हेतु यह बहुविध अर्थ प्रदान कर सकता है। एक अर्थ के लिए, आपको अनेक शब्द मिलेंगे। यह प्रायः आध्यात्मिक या वैज्ञानिक शब्दों के विषय में कोई सूचना नहीं देता, विशेष रूप से जो कम प्रचलित हैं। एक शब्द के बदले में, आपको केवल एक अन्य शब्द या वाक्यांश प्राप्त होता है। शब्दकोश शीघ्र ही कालभ्रमित (Outdated) हो जाते हैं और भरोसे के योग्य नहीं होते, क्योंकि जिन्होंने इसे मुद्रित करने का निर्णय लिया, वे उस विषय के विशेषज्ञ न भी हो सकते हैं। विश्वकोष (या कभी-कभी विकिपीडिया) बेहतर कार्य कर सकते हैं, परन्तु वे भी सर्वाधिक विश्वसनीय स्रोत नहीं हैं; अनेक प्रकरणों में आपको असत्य सूचना, विरोधाभास (और बहुविध व्याख्याएँ (Multiple Interpretations) मिलेंगी। अन्ततः, किसी एक शब्द या एक वाक्य का अर्थ ज्ञात करने हेतु व्यक्ति को विषय में गहराई से उतरना, अनेक पुस्तकों का परामर्श लेना, और गहन शोध करना चाहिए। वैसे भी, आध्यात्मिक ज्ञान अत्यन्त विशिष्ट अथवा व्यक्तिगत होता है और आपके गुरु द्वारा उच्चारित शब्दों के अर्थ किसी भी पुस्तक या शब्दकोश में कभी नहीं मिलेंगे। **अर्थ और मार्ग ** महत्त्वपूर्ण शब्दों (जिन्हें कभी-कभी तकनीकी शब्द भी कहते हैं) के अर्थ मार्गों के साथ परिवर्तित होते रहते हैं। एक नया साधक निर्दोषता से यह मान लेता है कि संसार का प्रत्येक मार्ग किसी एक विचार अथवा एक अनुभव के लिए केवल एक ही शब्द का प्रयोग करेगा, और वह कभी नहीं बदलेगा। परन्तु शीघ्र ही उसे ज्ञात होता है कि प्रत्येक मार्ग के पास अपने उपयोग किए गए शब्दों की एक बहुत विशिष्ट परिभाषा होती है। अन्य मार्गों में, वही शब्द पूरी तरह से कुछ और अर्थ रखता होगा। जो लोग मार्ग बदलते हैं, वे आसानी से भ्रमित हो जाते हैं जब वे पाते हैं कि जिन शब्दों पर वे इतना निर्भर करते हैं, वे या तो नए मार्ग में उपस्थित नहीं हैं या वहाँ कुछ और अर्थ रखते हैं। कभी-कभी, एक ही मार्ग में, समय और स्थान के साथ अर्थ परिवर्तित हो जाता है। अथवा वही वस्तु २० नए नाम प्राप्त कर लेती है। अनेक बार एक जिज्ञासु परिभाषाएँ जाँचने या पूछने में विफल रहता है और इसलिए प्रगति नहीं कर पाता, अथवा उन शब्दों का कोई अन्य अर्थ मानकर अधिक अज्ञान संचित कर लेता है। यह बहुत पुरानी परम्पराओं और मार्गों के साथ भी हो सकता है। चूँकि उनके संस्थापक अब नहीं रहे और उनके सर्वश्रेष्ठ विद्वान और छात्र सैकड़ों वर्ष पूर्व मृत्यु को प्राप्त हो चुके हैं, इसलिए अर्थ पूरी तरह से विकृत हो गए हैं। प्रायः लोग 'वास्तविक' अर्थ को लेकर आपस में झगड़ते हैं, या स्वयं को अधिकारी घोषित करते हैं, अथवा अपने मनचाहे ढंग से कार्य करने या किसी भी प्रकार के लाभ के लिए उनका दुरुपयोग करने हेतु अर्थों की पुनर्व्याख्या करते हैं। जैसे-जैसे अर्थ भिन्न होते जाते हैं और खंडित होते जाते हैं, मार्ग उप-मार्गों में टूट जाते हैं, परम्पराएँ गुटों और पंथों में विभाजित हो जाती हैं। आप इस प्रक्रिया को अभी भी होते हुए देख सकते हैं। एक समय आता है जब उन शब्दों का अर्थ वास्तव में किसी को ज्ञात नहीं होता है। **अर्थ और गुरु ** भिन्न-भिन्न गुरु और दार्शनिक एक ही शब्द की भिन्न-भिन्न परिभाषाओं का प्रयोग करते हैं। कभी-कभी एक ही मार्ग अथवा एक ही परम्परा में होते हुए भी, वे एक ही वस्तु को व्यक्त करने हेतु भिन्न शब्दों का प्रयोग करते हैं। कभी-कभी गुरु जिज्ञासु की प्रगति के आधार पर अर्थों को परिवर्तित करते हैं (यह उनकी शिक्षण-शैली हो सकती है)। कभी-कभी वे एक छात्र के समझ के स्तर के आधार पर शब्द की व्याख्या करते हैं। जैसे-जैसे छात्र विकसित होते हैं, अर्थ परिवर्तित होते जाते हैं। यह कहना अल्पोक्ति (Understatement) होगी कि गुरु एक ही वस्तु को समझाने हेतु ५० भिन्न शब्द प्रयोग करते हैं। यह केवल स्पष्ट करने के लिए हो सकता है, अथवा अपनी वार्ताओं में विविधता लाने हेतु हो सकता है। प्रायः यह बहुत भ्रामक होता है। कभी-कभी एक गुरु के छात्र उनकी बातों अथवा शिक्षाओं को अपने स्वयं के बोध और रुचि के आधार पर भिन्न अर्थ प्रदान करते हैं। यह विशेष रूप से गुरु की मृत्यु के पश्चात् होता है। जैसे-जैसे समय बीतता है, अर्थ धीरे-धीरे विकृत हो जाते हैं, क्योंकि मूल गुरु वहाँ अर्थों को स्पष्ट या सही करने हेतु उपस्थित नहीं होते। **परिवर्तनशील अर्थ ** परिभाषाएँ और अर्थ समय और स्थान के साथ परिवर्तित होते हैं। वे सन्दर्भ के साथ भी बदलते हैं। वही शब्द किसी अन्य सन्दर्भ में कुछ और अर्थ रख सकता है, भले ही वह वही मार्ग, वही गुरु, वही शिक्षा हो। अर्थ सिखाए जा रहे विषय पर निर्भर करते हैं। उदाहरणार्थ, 'ऊर्जा' शब्द का अर्थ भौतिकी और तंत्रविद्या में पूर्णतः भिन्न हो सकता है। इसी प्रकार, 'आयाम' (Dimension) शब्द के अर्थ गणित, संगणक विज्ञान (Computer Science) और अध्यात्म में भिन्न-भिन्न होते हैं। इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि एक नवआगन्तुक शब्दों की इस अराजकता से व्याकुल हो जाता है। उसे क्या करना है यह ज्ञात न होने पर, वह मार्ग को दोष देता है या गुरु को कपटी घोषित कर देता है। किसी भी प्रकार, असफलता सुनिश्चित है। सत्य अथवा ज्ञान पूरी तरह से चूक गया, केवल इस सरल कारण से कि वह सही अर्थ या परिभाषाएँ पूछने में विफल रहा। **वास्तविक अर्थ कौन जानता है? ** निश्चय ही, जो व्यक्ति उस शब्द को कहता है, वह अर्थ जानता है। (आशा है कि वे जानते होंगे!) प्रायः किसी भी शब्द के प्रथम प्रयोग के साथ ही उसकी परिभाषा भी दी जाती है। उत्तम शिक्षक यह सुनिश्चित करते हैं कि जैसे ही वे कोई महत्त्वपूर्ण (तकनीकी) शब्द प्रस्तुत करते हैं, वे उसे वहीं और तत्काल परिभाषित कर दें। लिखित रूप में भी यही किया जाता है। कभी-कभी शब्दों और उनके अर्थों की एक पूर्ण सूची स्वयं पुस्तक में मुद्रित होती है। एक उत्तम शिक्षक परिभाषाओं और अर्थों को बार-बार दुहराता है, और एक उत्तम छात्र वह है जो उसे सटीक रूप से लिख लेता है और उसे स्मरण करता है। यदि आप व्यवस्थित रूप से सीख रहे हैं और शिक्षक के निर्देशानुसार अनुसरण कर रहे हैं, तो आप अर्थ चूकेंगे नहीं। परन्तु यदि आप किसी भी जगह से शिक्षाओं की एक या दो पंक्तियाँ सुन रहे हैं और एक ही समय में २० गुरुओं को साध (Juggling) रहे हैं, तो वास्तव में कोई आशा नहीं है। अतः एक सरल समाधान यह है यदि आप किसी कारणवश चूक गए हैं, तो सदैव स्पष्ट अर्थ पूछें, चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ें और निर्देशों का अनुसरण करें। यह इतना ही सरल है अनुशासित रहें। कोई अर्थ न मानें या कल्पना न करें। जिस अर्थ को आप अतीत में जानते थे, उस पर आग्रह न करें। अपने शिक्षक की परिभाषाओं को अपनाएँ। स्मरण रखें कि यहाँ परिभाषा या अर्थ बहुत अद्वितीय (Unique) होगा, यह अन्य गुरुओं, मार्गों, पुस्तकों आदि से मिल भी सकता है और नहीं भी मिल सकता है। क्या आप बात समझे ? भाषाओं, शिक्षकों अथवा मार्गों का मिश्रण न करें। यही कुंजी है। **वास्तविक अर्थ कौन नहीं जानता है? ** सामान्य जन (जो साधक नहीं हैं), अन्य सहपाठी छात्र, अन्य किसी मार्ग के शिक्षक एवं जिज्ञासु, समान मार्ग के शिक्षक, पुस्तकों एवं धर्मग्रन्थों के लेखक, तथाकथित अधिकारी , जो अन्य किसी भाषा का प्रयोग करते हैं, शब्दकोश, विश्वकोष, गूगल, एआई (AI), विकिपीडिया, इन्टरनेट पर जिस किसी को , आपके परिवार के सदस्य अथवा मित्र यह सूची बहुत लम्बी है। संक्षेप में, केवल वही व्यक्ति जो उसे बोलता है, शब्द अथवा वाक्य का वास्तविक अर्थ जानता है, अन्य कोई नहीं। इसे सदैव स्रोत से ही ग्रहण करें। **सभी एक ही परिभाषा का प्रयोग क्यों नहीं करते?** वे अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयास करते हैं, परन्तु यह एक नियम है कि समय के साथ में प्रत्येक वस्तु परिवर्तित होती है, जिसमें अर्थ, व्याख्याएँ और परिभाषाएँ भी सम्मिलित हैं। इसीलिए यह आवश्यक है कि उसका अनुसरण किया जाए जो सत्य को जानता है, न कि उसका जो शब्दों को जानने का दावा करता है। एक परम्परा अपनी शिक्षाओं की प्रामाणिकता को अक्षुण्ण रखने हेतु प्रयास करती है। कभी-कभी यदि कोई अपनी शिक्षाओं को पुनः परिभाषित या पुनर्व्याख्यायित करने का प्रयास करता है, तो कठोर दण्ड भी होते हैं, परन्तु कालान्तर में व्याख्याता स्वयं ही परम्पराओं को रूपान्तरित कर देते हैं। यह दैनन्दिन (रोज़मर्रा के) शब्दों के लिए भी सत्य है। जैसे हम किसी को फ़ोन पर उसका अंक डायल करके बुलाते हैं; इसे 'डायल करना' इसलिए कहा जाता है, क्योंकि पुराने फोनों में एक यांत्रिक डायल होता था जो प्रणाली को बताता था कि आप किस अंक से जुड़ना चाहते हैं। जब हम वार्तालाप समाप्त करते हैं, तो हम 'हैंग-अप' करते हैं, क्योंकि उन फोनों में रिसीवर भाग एक लीवर पर लटकता था जो लाइन विच्छेदित करता था। इन दिनों हम स्मार्टफोन का प्रयोग करते हैं, परन्तु ये शब्द वही हैं, अर्थ परिवर्तित हो गए हैं। एक अन्य उदाहरण, पाश्चात्य वैज्ञानिक परम्परा में, इलेक्ट्रॉन शब्द के अर्थ पर कोई असहमति नहीं है; जब इस शब्द का उच्चारण होता है, तो प्रत्येक व्यक्ति इसे केवल एक ही प्रकार से समान रूप से भली-भाँति समझता है। क्या यह सत्य है? आप जाँच कर सकते हैं, यह शब्द पदार्थ के एक मूलभूत कण के नाम के रूप में आरम्भ हुआ, फिर यह एक तरंग (Wave) बन गया, फिर एक क्वांटम वस्तु (Quantum object) या केवल किसी प्रकार का एक क्षेत्र (Field) बन गया। 'बल' (Force) अथवा 'देश-काल' (Space/Time) शब्दों के विषय में क्या? जैसे-जैसे विज्ञान प्रगति करता है, वही शब्द भिन्न अर्थ प्राप्त करता है। संक्षेप में, यदि अर्थ परिवर्तित नहीं होते, तो प्रगति नहीं होगी। अपनी स्वयं की प्रगति के आधार पर, कुछ लोग पुराने अर्थों पर ही अडिग रहेंगे, और यह परिभाषाओं और अर्थों की एक अत्यधिक विविधता का कारण बनता है। इसलिए, भले ही हम प्रत्येक वस्तु को मानक (Standard) बनाए रखना चाहें, यह परिवर्तित होता रहता है। कला सही शब्द खोजने में है। **वास्तव में किसने क्या कहा? ** नए साधक अक्सर मुझसे ऐसे शब्दों के अर्थ पूछते हैं जो उन्होंने कहीं से सुन लिए हों, या वे किसी महान गुरु का उद्धरण लाकर मुझसे उसका अर्थ पूछते हैं। कई बार वे किसी पूरी तरह से अलग मार्ग से जुड़ी जानकारी जानना चाहते हैं। वे भोलेपन से यह मान लेते हैं कि सभी गुरु सब कुछ जानते हैं। यह पहली गलती है, दूसरी गलती यह है वे मान लेते हैं कि जो कुछ भी मैं कहूँगा, वही सही अर्थ या परिभाषा होगी। एक गुरु/शिक्षक/आचार्य वह व्यक्ति होता है जो केवल एक क्षेत्र, केवल एक मार्ग का विशेषज्ञ है। वह जिसकी शिक्षा वह अभी दे रहा/रही है। यह समझदारी नहीं है कि यह आशा रखी जाए कि यह व्यक्ति संसार की हर बात जानता होगा। हजारों पुस्तकें, गुरु, ग्रन्थ, मार्ग और परम्पराएँ हैं, और वे सभी अलग-अलग शब्द और अर्थ प्रयोग करते हैं। क्या यह जानना सम्भव भी है? हालाँकि गुरु को कई विषयों का सामान्य ज्ञान या ऊपरी जानकारी होगी, पर वह उनकी मुख्य शिक्षा नहीं है। दूसरी बात, चूँकि आप अपने शिक्षक से सीख रहे हैं, इसलिए सिखाई जा रही शिक्षाओं, शब्दों और परिभाषाओं पर ध्यान देना सबसे अच्छा है। जैसे ही आप किसी और चीज या किसी और व्यक्ति के बारे में प्रश्न करते हैं, इसे शिक्षाओं (या कार्यक्रम) में अरुचि के रूप में देखा जाता है, और गुरु फिर उसी अनुसार आपका आंकलन कर सकते हैं। मुझे अक्सर पता चल जाता है कि कौन कार्यक्रम में रुचि रखता है, और कौन मुझे ठीक से समझता है। क्योंकि वे सही प्रश्न पूछते हैं, कार्यक्रम में सच्ची रुचि दिखाते हैं और मेरे निर्देशों का पालन करते हैं। वे सरलता से उस प्रणाली को अपना लेते हैं। जो ऐसा नहीं करते, वे बेतरतीब बातों के बारे में पूछते हैं, वे सब कुछ जानना चाहते हैं सिवाय उसके जो सिखाया जा रहा है। ऐसे लोग मेरा सहयोग खो देते हैं, मैं जानता हूँ कि वे ज्यादा नहीं सीखेंगे, मैं उन पर अपना समय नहीं लगाता। भले ही आप इन सभी शब्दों और किसने-क्या-कहा जैसी बातों को जानते हों, आप फिर भी अज्ञानी ही रहेंगे। यह निश्चित है, क्योंकि यह कोई रुचि, कोई लक्ष्य, कोई मार्ग और कोई समझदारी नहीं दिखाता है। यह आपके स्कूल में इतिहास की कक्षा में गणित की समस्या का हल पूछने जैसा है। यहाँ किसे लाभ होगा? ज्ञान शब्दों, विचारों, तथ्यों और सामान्य जानकारियों को जम्मा करना नहीं है। ज्ञान तो मूल शिक्षाओं को समझने, आजीवन अभ्यास और स्वयं के प्रत्यक्ष अनुभव द्वारा प्राप्त होता है। **धर्मग्रन्थों की व्याख्या ** कुछ छात्र किसी ग्रन्थ के कुछ वाक्यों का अर्थ जानना चाहते हैं। सम्भवतः जिज्ञासा के कारण, परन्तु अधिकतर प्रणाली के अज्ञान के कारण। किसी भी नवआगन्तुक को यह जान लेना चाहिए कि एक विशिष्ट परम्परा केवल एक विशिष्ट ग्रन्थ की शिक्षा देती है, वे अन्य लाखों ग्रन्थों और पुस्तकों के बारे में कुछ नहीं जानते। दूसरी बात, यह बुद्धिमानी है कि ग्रन्थ के विषय में तभी पूछा जाए, जब वह विशेष ग्रन्थ या पुस्तक पढ़ाया जा रहा हो, और शिक्षक ठीक उसी भाग की व्याख्या कर रहे हों। यह अपना प्रश्न पूछने का एक अच्छा सन्दर्भ है। क्या परिणाम होगा यदि आप किसी ऐसे व्यक्ति से किसी पुस्तक या ग्रन्थ के विषय में पूछते हैं जो उसे नहीं पढ़ाता, जो उनके मार्ग का नहीं है, या जो प्रासंगिक नहीं है? अथवा शिक्षक केवल अंग्रेज़ी जानते हैं, और आप संस्कृत श्लोक का अर्थ पूछते हैं? स्पष्टतः, इस एक-पंक्ति-सूचना-की-खोज (One-line-information seeking) के माध्यम से कुछ भी सीखा नहीं जाता। **क्या आप गुरु की परीक्षा ले रहे हैं? ** कुछ लोगों को यह भ्रम होता है कि वे गुरु से अधिक जानते हैं। इसलिए वे यह जाँचने के लिए शब्दों और उद्धरणों के अर्थ पूछते रहते हैं कि क्या इस गुरु को कुछ पता है या नहीं। जो हुआ है वह यह है उन्होंने इधर-उधर से कुछ शब्दों और वाक्यों की ऊपरी जानकारी एकत्र की है, और पूरी तरह से आश्वस्त हैं कि यही अन्तिम सत्य है, और वे स्वयं उस विषय के विशेषज्ञ हैं। वे गुरु का अन्तर्वार्ता लेते हैं और देखते हैं कि गुरु वही बात कह रहे हैं या नहीं जिसे वे सत्य मानते हैं। यदि यह शब्दशः मेल (Word for word match) नहीं खाता है, तो वे तुरन्त गुरु को कपटी घोषित कर देते हैं। इस प्रकार के व्यवहार को निम्न माना जाता है, और गुरु तुरन्त ऐसे लोगों का आशय समझ जाते हैं। वे वास्तव में यहाँ सीखने के लिए नहीं हैं, बल्कि अपमान करने या बिना सोचे-समझे वाद-विवाद करने के लिए हैं। ज्ञान के वचन प्रायः निम्न लोगों के अहंकार को उकसाते हैं, और यह इसी प्रकार प्रकट होता है। इसलिए, यदि आप निर्दोषता से भी प्रश्न पूछ रहे हैं, तो गुरु इसे एक चुनौती के रूप में, या जिज्ञासु द्वारा गुरु के ज्ञान की परीक्षा लेने का एक प्रयास के रूप में देख सकते हैं, खासकर जब जो पूछा गया है वह मुख्य शिक्षा या मार्ग से असम्बन्धित है तो। कोई भी शिक्षक इसे पसंद नहीं करेगा, और इसलिए ऐसे लोगों को जल्द ही कार्यक्रम या आश्रम से बाहर कर दिया जाता है। तो फिर गुरु की परीक्षा कैसे लें? आप नहीं ले सकते, परन्तु आप अपनी स्वयं की प्रगति से जान जाएँगे कि गुरु सहायक हैं या नहीं। यदि आप प्रगति नहीं कर रहे हैं, तो गुरु अच्छे नहीं हैं। वही गुरु किसी अन्य व्यक्ति के लिए एक आदर्श गुरु हो सकते हैं। इसलिए यह बुद्धिमानी नहीं है कि गुरुओं की परीक्षा इस बात से ली जाए कि वे कितने शब्द जानते हैं या उनके किसने-क्या-कहा-और-क्यों पर क्या विचार हैं। सरलता से सीखें कि वे क्या शिक्षा दे रहे हैं, देखें कि क्या यह आपके लिए लाभदायक है। सामान्यतः गुरु सभी आवश्यक शब्द सिखाएँगे, और सभी वाक्यों या शिक्षाओं को सरल भाषा में बहुत स्पष्ट कर देंगे। और यदि आप इतना भी नहीं समझ सकते, तो कोई आशा नहीं है, ऐसे मामलों में असम्बन्धित विषयों के बारे में पूछकर या गुरु की परीक्षा लेकर कुछ भी सीखा नहीं जाएगा। **व्याख्या के खतरे ** कुछ शिक्षक, अपनी दयालुता के कारण, अन्य मार्गों से या अन्य गुरुओं अथवा धर्मग्रन्थों से, विशेष रूप से महान गुरुओं से, लिए गए शब्दों और उद्धरणों के विषय में कुछ कह देते हैं। परन्तु वे इसके लिए कोई अधिकार नहीं जताते। यदि वे ऐसा करते हैं, तो वे उसे पढ़ाने के लिए पूर्ण रूप से प्रशिक्षित होते हैं, और वह उनकी अपनी परम्परा या मार्ग से सम्बन्धित होना अनिवार्य है। यहाँ नवीन शिक्षकों के लिए मेरा सुझाव यह है कि यदि वह आपके मार्ग या शिक्षाओं से सम्बन्धित नहीं है, और आप उसे अपने तरीके से व्याख्यायित करने का प्रयास करते हैं, तो यह खतरनाक हो सकता है, क्योंकि आपके छात्र उसे गलत समझ सकते हैं और अधिक अज्ञानी हो सकते हैं या उनकी प्रगति रुक सकती है। केवल वही व्यक्ति जिसने मूल रूप से वह बात कही है, अपने शब्दों की व्याख्या कर सकता है, या वे लोग जो शिक्षाओं या धर्मग्रन्थों की व्याख्या के लिए प्रशिक्षित हैं, वे ही यह कार्य कर सकते हैं, हर कोई नहीं। इसलिए, यदि आप उत्तर देना भी चाहें, तो सदैव एक अस्वीकरण जोड़ें कि यह आधिकारिक व्याख्या नहीं है, यह केवल आपका निजी विचार (Opinion) है। वैसे भी, सबसे अच्छा यह है कि उत्तर न दिया जाए और छात्र को मुख्य विषय पर वापस लाया जाए। केवल वही पढ़ाएँ जो आप पढ़ा सकते हैं, यही आपके छात्रों के लिए सबसे अच्छा है। **उचित मार्गदर्शन** छात्र को आप जो पढ़ा रहे हैं, उस पर ध्यान देने के लिए प्रोत्साहित करें, यह मेरा ऐसे छात्रों का सामना करने वाले शिक्षकों के लिए सुझाव है। उन्हें बताएँ कि वे पहले आपके पढ़ाए जा रहे विषय को सीखें, और इधर उधर के शब्दों तथा किसने-क्या-कहा की चिन्ता न करें। आप छात्रों को स्रोत की ओर भी भेज सकते हैं, या उन्हें उस स्थान पर निर्देशित कर सकते हैं जहाँ वे अपने प्रश्नों के विषय में जान सकें। यह कोई पुस्तक, कोई आश्रम या कोई अन्य गुरु हो सकता है। यदि उनके लिए यह जानना महत्त्वपूर्ण है, तो वे प्रयास करेंगे। परन्तु अधिकतर, यह तुच्छ और अमहत्त्वपूर्ण होता है, जिसे वे आवेगवश पूछते हैं। यदि वे अन्य मार्गों, अन्य शब्दों, अन्य अभ्यासों और अन्य गुरुओं के विषय में पूछते रहते हैं, तो आप निश्चित हो सकते हैं कि उनकी आपकी शिक्षाओं में रुचि नहीं है। **क्या हो यदि मूल शिक्षक अब नहीं रहे? ** प्रायः वह गुरु जिसने वे सभी शब्द कहे थे, वह बहुत पहले ही जा चुके हैं। यदि उनकी कोई परम्परा अथवा वंश है, तो वहाँ ऐसे लोग अवश्य होंगे जिन्हें उनके शब्दों की व्याख्या करने का अधिकार प्राप्त है। यदि आप एक शिक्षक हैं, तो आपको छात्र से उस विषय में पता लगाने और अपनी जिज्ञासा (प्रश्न) लेकर उनके पास जाने के लिए कहना चाहिए। उन्हें यह चेतावनी भी दें कि इसमें काफी समय, प्रयास और धन लगेगा। आप उन्हें यह सलाह भी दे सकते हैं कि वे उस गुरु या उनके शिष्यों द्वारा लिखी गई अधिक से अधिक पुस्तकें पढ़ें। कोई भी बुद्धिमान छात्र संकेत समझ जाएगा। अधिकतर लोग केवल एक शब्द या एक वाक्य का अर्थ जानने के लिए इतना कठोर परिश्रम नहीं करेंगे। **क्या हो यदि मेरा जीवन उन अर्थों पर निर्भर हो? ** क्या हो यदि वे शब्द और उद्धरण आपके लिए बहुत महत्त्वपूर्ण हों? उन्हें आपके जीवन का उद्देश्य या उससे सम्बन्धित होना चाहिए। यदि आप एक छात्र हैं, और जिन शब्दों को आप खोज रहे हैं वे महत्त्वपूर्ण हैं, और आपका शिक्षक आपको अर्थ नहीं बताता, या वह आधा-अधूरा विवरण है जो उसने कहीं से सुना है, या यदि वह आपको मूल गुरु अथवा हिमालय में उनके आश्रम में भेजता है, तो आपको सरल रूप से उस गुरु को छोड़ देना चाहिए। किसी ऐसे व्यक्ति से जुड़ें जो उन शब्दों और शिक्षाओं को जानता हो, क्योंकि यहाँ आपको कुछ नहीं मिलेगा, यह आपका मार्ग नहीं है। आपको किसी भी स्थिति में शिक्षक से तर्क नहीं करना चाहिए या मार्ग अथवा शिक्षाओं का अपमान नहीं करना चाहिए। याद रखें, गुरुक्षेत्र सदैव देख रहा है, और इसके कर्मके दृष्टिकोण से बहुत बुरे परिणाम हो सकते हैं। चुपचाप निकलना और उन शब्दों तथा उद्धरणों के रहस्य का अनुसरण करना सबसे अच्छा है। यदि यह आपका जीवन लक्ष्य है, तो आप वैसे भी इसे प्राप्त करेंगे। **एक नया शब्द कब गढ़ें? ** जब शिक्षण हेतु जिन शब्दों का आप प्रयोग कर रहे हैं, वे अतीत या अनेक मार्गों के अर्थों से भरे होने के कारण बहुत अधिक भ्रम उत्पन्न करते हैं, तो सर्वोत्तम यह है कि एक नया शब्द का आविष्कार किया जाए और उसे सटीक रूप से परिभाषित किया जाए। यह एक स्पष्ट विचार अथवा एक अनुभव की ओर संकेत करना चाहिए। सदैव स्पष्ट करें कि इस शब्द का अर्थ आपकी शिक्षाओं के बाहर कुछ भी नहीं है। इससे छात्रों की सभी गलतफहमियाँ, मान्यताएँ और कल्पनाएँ दूर हो जाएँगी। वे अन्य भाषाओं में, या पुस्तकों में अथवा अन्य शिक्षकों से इसके अर्थ और अनुवाद की खोज करने के बजाय स्वयं इसका अनुभव करने का प्रयास करेंगे। अपने छात्रों को अपनी शब्दावली अपनाने के लिए प्रोत्साहित करें। यदि वे चाहें तो उनका पाठ्यक्रम या कार्यक्रम समाप्त होते ही वे इन परिभाषाओं को छोड़ सकते हैं, और आवश्यकता पड़ने पर पुराने शब्दों पर वापस जा सकते हैं। परन्तु किसी भी स्थिति में, आपका सन्देश स्पष्ट रूप से प्रेषित हो चुका होगा। **एक प्राचीन शब्द का पुन: प्रयोग कब करें? ** जब इससे बचा नहीं जा सकता है, जब यह आपके मार्ग और उसकी शिक्षाओं का अभिन्न अंग है, या जब यह अनावश्यक भ्रम उत्पन्न नहीं करेगा। फिर भी, इसकी परिभाषा, उत्पत्ति इत्यादि को स्पष्ट करना उत्तम है, ताकि इच्छुक छात्र इसे अन्य स्रोतों से खोज सकें। यह सलाह भी दी जाती है कि आप छात्रों को यह चेतावनी दें कि अन्य मार्गों में इसका अर्थ कुछ और हो सकता है। **अस्थायी अर्थ ** कभी-कभी, एक छूट के रूप में, एक शिक्षक किसी शब्द या उद्धरण की पुनर्व्याख्या कर सकता है और एक अस्थायी अर्थ पढ़ा सकता है, यदि वे सोचते हैं कि इससे कुछ प्रगति हो सकती है। बाद में सत्य बताया जाता है, परन्तु यह सामान्यतः आवश्यक नहीं होता, क्योंकि कोई भी बुद्धिमान छात्र यह समझ जाएगा कि ऐसा क्यों किया गया। शिक्षक ऐसा तब करते हैं जब वे देखते हैं कि इस चरण पर छात्र कुछ भी नहीं समझेगा, और केवल उसकी जिज्ञासा को शान्त करने हेतु कुछ बता दिया जाता है। उदाहरण के लिए, जब एक बालक 'परमाणु' शब्द का अर्थ पूछता है, तो आप उसे बता सकते हैं कि यह केन्द्र में एक बड़े गोले की परिक्रमा करते हुए गोलाकार कणों वाला एक छोटा सौरमण्डल जैसा है। जैसा कि आप जानते हैं, यह पूरी तरह से सही नहीं है। इस समय उस बालक को किसी विश्वविद्यालय के प्रोफेसर के पास भेजना या उसे उन्नत भौतिकी सीखने की सलाह देना सम्भव नहीं होगा। **जब लोग हठ करते हैं ** क्या करें जब दूसरा व्यक्ति परिभाषा पर सहमत नहीं होता? चाहे वह आपका छात्र हो, या सहकर्मी हो, या कोई अन्य हो, जब परिभाषाओं पर मतभेद होता है, तो इसके विषय में पढ़ाने या बात न करना समझदारी है, क्योंकि यह समय नष्ट करता है, और कभी-कभी यह गरमागरम तर्कों की ओर ले जाता है। आपको विनम्रता से कहना चाहिए कि आपके पास प्रश्न में दिए गए शब्द की कोई अन्य परिभाषा है, और उस व्यक्ति से किसी और स्थान पर उत्तर खोजने के लिए कहना चाहिए जो उनकी अपनी सोच से अधिक मेल खाता हो। अपनी परिभाषाएँ थोपने का कोई अर्थ नहीं है। आप शीघ्र ही देखेंगे कि ९०% तर्क और गलतफहमियाँ प्रयोग किए जा रहे शब्दों के अर्थ या परिभाषाएँ ज्ञात न होने के कारण उत्पन्न होती हैं। अधिकतर, लोग एक काल्पनिक अर्थ मान लेते हैं और अर्थ मेल खाते हैं या नहीं, यह जाँचने की परवाह किए बिना तर्क करना शुरू कर देते हैं। यह सदैव सेब और संतरों के बारे में वाद-विवाद होता है। **किताबी ज्ञान ** क्या होता है जब आप उन अनुभवों को वास्तव में जिए बिना ही किसी शब्द या उद्धरण की सभी जानकारी, अर्थ और अनुवाद एकत्रित कर लेते हैं, जिनकी ओर वे शब्द संकेत करते हैं? हाँ, यह बुद्धिमत्ता नहीं है, यह किताबी ज्ञान है। या फिर केवल आधारहीन जानकारी। हर प्रकार के शब्दों का एक कूड़ा-करकट का ढेर। इसके अतिरिक्त, यह मूर्खता उत्पन्न करता है, क्योंकि ऐसा व्यक्ति तुरन्त स्वयं को सभी विषयों का स्वामी घोषित कर देगा और किसी भी मूल्यवान वस्तु को सीखने से मना कर देगा। ऐसे लोग केवल वही प्रचार और तर्क करते पाए जाते हैं जो वे सोचते हैं, और वे निश्चित रूप से संसार के सभी विषयों के बारे में जानते हैं। वे बुद्धिमत्ता से भरे नहीं होते, बल्कि अपुष्ट स्रोतों से जमा किए गए कूड़े से भरे होते हैं। वे सभी शब्द जानते हैं, किसने-क्या-कहा जानते हैं और उन्हें विश्वास होता है कि वे सब कुछ जानते हैं, जो वे जानते हैं वही एकमात्र सत्य है, और वे इस पर गर्व करते हैं। यह कम पढ़े-लिखे लोगों को कुछ समय के लिए मूर्ख बना सकता है और ऐसे व्यक्ति को समाज में बुद्धिमान माना जाता है, सम्भवतः वे दूसरों को प्रभावित करने आदि के लिए स्वयं का ऐसा झूठा व्यक्तित्व खड़ा करते हैं, परन्तु एक समझदार व्यक्ति इसे भाँप सकता है, और ये समझदार लोग हर कीमत पर ऐसे लोगों से दूर रहते हैं। कोई भी समझदार व्यक्ति उन्हें पढ़ाने या सुधारने की इच्छा नहीं रखता, क्योंकि वे परिणामों को भली-भाँति जानते हैं। परिणाम यह है वे कभी प्रगति नहीं करते, वे अज्ञानी ही रहते हैं या आध्यात्मिक और नैतिक रूप से पतन को प्राप्त होते हैं। **निष्कर्ष ** इधर-उधर से शब्दों का कूड़ा-करकट जमा न करें और स्वयं को हार्ड-डिस्क में न बदलें। एक ही मार्ग, एक ही गुरु पर अडिग रहें, जो महत्त्वपूर्ण शब्द वहाँ सिखाए जाते हैं, उन्हें सीखें। अनुशासित और केन्द्रित रहें। इसका अभ्यास करें, अनुभव करें, जीएँ। यह आपकी प्रगति सुनिश्चित करेगा। यदि आप कोई प्रगति नहीं देखते हैं, तो अपना मार्ग बदलें, अपना गुरु बदलें। जिन पाए (Random) शब्दों के अर्थों की कितनी भी जानकारी, सैकड़ों परिभाषाएँ, २० भाषाओं में अनुवाद या किसने-क्या-कहा पर विचार आपको प्रगति नहीं कराएँगे, और यह निश्चित रूप से आपको आचार्य नहीं बनाएगा। एक समय में एक ही मार्ग, एक ही गुरु, एक ही भाषा, एक ही शब्दावली, एक ही अभ्यास पर अडिग रहें। यह बहुत महत्त्वपूर्ण है। प्रणाली को अपनाएँ, क्रमबद्ध तरीके से चलें, व्यवस्थित होकर चलें। मार्ग तभी बदलें जब आप निश्चित हों कि आप प्रगति नहीं कर रहे हैं। यदि आप एक शिक्षक हैं, तो ऐसे छात्रों को उचित मार्गदर्शन दें, उन्हें आप जो पढ़ा रहे हैं, वह सीखने के लिए प्रोत्साहित करें, किसने-क्या-कहा की कहानियाँ सुनाने में और अपने शब्द-संग्रह का प्रदर्शन करने में अपना समय बर्बाद न करें। छात्रों को सबसे मूल शिक्षा सीखने दें और उन्हें अपने स्वयं के अनुभव द्वारा उसकी सत्यता प्रमाणित करने दें। शब्दों को जमा करने वाले को तुरन्त बाहर कर दें। शब्द ज्ञान नहीं हैं, न ही आचार्यों के कथन, वे सत्य की ओर संकेत कर रहे हैं, वे ज्ञान की ओर कदम हैं, देखें कि वे किस ओर संकेत कर रहे हैं, अनुभव से उसे जानें, उसका अभ्यास करें, जब आप अपने लक्ष्य तक पहुँच जाएँ, तो शब्दों को त्याग दें, यदि आप एक सफल साधक बनना चाहते हैं, तो यही कुंजी है।