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त्याग
વિશાલ પટેલ
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- त्याग किसका, कौन और कैसे करें? यह कोई प्रक्रिया नहीं है कि व्यक्ति उसमें गिर सके, त्याग कोई कमॅ नहीं है कि व्यक्ति उसका कर्ता बन सके. त्याग के बाद जो त्याग का कर्ता जीवित है तो वह त्याग नहीं है. - जैसे स्वप्न अपने आप ही आता है, उसकी रचना नहीं करनी पड़ती है. स्वप्न सृष्टि जन्म लेती है बिना प्रयास के और उसका संहार या स्वप्न सृष्टि का विलय का कोई कर्ता नहीं है, वह अपने आप ही हो जाता है और जैसे ही हम जागरूक होते हैं तो स्वप्न सृष्टि का विलय हो जाता है और जागने के बाद कोई कहे कि मैंने स्वप्न का त्याग किया तो वह नीरर्थक है. - ना तो स्वप्न के लिए मनुष्य प्रयत्न कर सकता है, ना जागृति के लिए प्रयत्न करता है. प्रयत्न के बिना ही जाग जाता है, प्रयत्न के बिना ही स्वप्न सृष्टि का त्याग होता है अर्थात स्वप्न का त्याग वह तो जागृति का फल है फिर भी जागृति कमॅ नहीं है. - हमें हमेशा याद रखना है कि जागने से स्वप्न का अपने आप ही त्याग हो जाता है. - जो जागा हुआ है उसको जगत (स्वप्न) दिखता नहीं है. - भौतिक जगत, घर, शरीर, संबंधों यानी कि पति, पत्नी, मां, बाप, भाई, बहन, धन, दौलत, सता, प्रतिष्ठा यह सब का भी त्याग संभव नहीं है क्योंकि यह सब भी स्वप्न मात्र है और स्वप्न का त्याग स्वप्न के द्वारा कैसे हो सकता है? स्वप्न का त्याग करने के लिए जागरूक होना ही काफी है और जागरूक होने के लिए कोई प्रयत्न नहीं करना पड़ता वह तो अपने आप ही हो जाता है. - त्याग कहीं जाने से, कुछ छोड़ने से, कुछ पकड़ने से और कुछ हो जाने से, कुछ प्राप्त होगा ऐसा समझना वह भ्रांति है. आप जहां पर हो वहीं पर, वही समय पर, कोई भी क्रिया किए बिना त्याग प्रकट हो सकता है क्योंकि वह ज्ञान की एक दशा है. जो जगत को जगत के रूप में जानता है, आत्मा को आत्मा के रूप में जानता है उसके लिए संसार शेष नहीं रहता. - आत्म चिंतन करते-करते अनेकता नष्ट हो जाती है, सारे भेद नाबूद हो जाते हैं, वहां दूसरी कोई चीज रहती ही नहीं तो फिर त्याग किसका करें? ज्ञान में भौतिक चीजों का त्याग का कोई महत्व नहीं है. - दृश्य प्रपंच का त्याग ही सच्चा त्याग है. - कर्ता भाव का त्याग ही सच्चा त्याग है. - अहम वृत्ति का त्याग ही सच्चा त्याग है. - खुद के स्वरूप का ज्ञान या आत्मज्ञान होते ही अनात्म का अपने आप ही त्याग हो जाता है. त्याग किया नहीं जाता, त्याग हो जाता है. जैसे ही रस्सी का ज्ञान होते ही सर्प का त्याग हो जाता है और रस्सी के ज्ञान से सर्प का त्याग अपने आप ही हो जाता है और ज्ञान के बिना वह त्याग संभव नहीं है. - चित्त का त्याग ही सर्व वस्तुओं का त्याग है क्योंकि चित्त ही भेद दर्शन करवाता है और दूसरों को खुद का मान लेने से उसका मालिकि भाव खड़ा करता है. ऐसा भेद्ददर्शी चित्त का जब त्याग होता है तब नहीं कोई मेरा बचता और नहीं कोई उसका मालिक. जब चित्त का ही त्याग किया जाए तो समग्र दृश्य प्रपंच अस्तित्व बिना दिखता है और सिर्फ ब्रह्म दर्शन ही होता रहता है. - हम कुछ करते नहीं लेकिन अपने आप ही सब कुछ होता रहता है यह समझ में आ जाता है. भेद्ददर्शी चित्त नहीं रहता, सिर्फ चैतन्य ही होता है. - त्याग कोई कर्म या क्रिया नहीं है. त्याग का अर्थ छोड़ना या त्यजना कदापि नहीं है, छोड़ने से आत्मज्ञान की प्राप्ति होती तो अनेक लोगों ने छोड़ा हुआ है और अनेक लोग छोड़ भी सकते हैं. - त्याग यानी कि मोह की निद्रा में से जागना, अनिद्रा की नींद में से उठ जाना, सतत जागृत रहना. जागृति से त्याग बिना प्रयत्न हीं प्राप्त होता है, अनायास ही उत्पन्न होता है. जाग जाने से त्याग की घटना अपने आप ही घट जाति है. - संसार छोड़ने से स्वरूप का ज्ञान नहीं होता, संसार तो अपने आप छूट जाता है. स्मरण में रखे कि संसार छोड़ने से स्वरूप की प्राप्ति नहीं होती है और नहीं भी होगी वरना तो गृहत्यागी, संतो, महंतों, साधु, त्यागियो, वैरागियों बहुत सारे इस देश में है. निष्कर्ष इतना ही है कि संसार छोड़ने से स्वरूप नहीं मिलता लेकिन स्वरूप प्राप्ति से अपने आप, जहां पर भी आप है वहां पर संसार कि निवृति देख सकते हैं. संसार को जलता हुआ देख सकते हैं. - जगत मायामय है, चित्त निर्मित है, स्वप्नवत है, मिथ्या है. जो जगत मिथ्या है तो उसका त्याग करने की जरूरत क्या है और जगत सत्य भी है तो भी त्याग निरर्थक है क्योंकि जो संपत्ति, धन सब कुछ माटी ही है तो उससे डरना क्यों और उसे छोड़ने की जरूरत क्या है. - पर्दा और सिनेमा दोनों एक साथ नहीं दिख सकते.जो पर्दा दिखता है तो सिनेमा नहीं दिखता और जो सिनेमा दिखाता है तो पर्दा नहीं दिख सकता. वैसे ही जिसको परमात्मा दिखता है उसके लिए संसार अदृश्य है और जिसको संसार दिखता है उसके लिए परमात्मा अदृश्य है. - जब तक व्यक्ति "मुझे त्याग करना है" इस विचार से मुक्त नहीं होता तब तक मुक्ति संभव नहीं है. - अगर त्याग से मुक्ति मिल भी जाए तो भी मुक्ति नहीं हो सकती है क्योंकि मुक्ति की आकांक्षा तो बनी ही रहती है इसलिए "मुक्ति" की मुक्ति ही परम मुक्ति है, मोक्ष है. - मुक्ति का अर्थ है कोई मांग ना होना, कोई आकांक्षा ना होना, कोई अपेक्षा ना होना, कोई इच्छा ही न बचना, मोक्ष की भी नहि.. - आत्म सुख के लिए ना कुछ स्वीकारना है, ना कुछ छोड़ना है, ना कहीं जाना है, ना कहीं से आना है सिर्फ अपने स्वरूप को जानना है. - हम कुछ त्याग नहीं करेंगे फिर भी काल सब कुछ त्याग करवा ही देगा. फिर हम क्यों त्याग के कर्ता बने. इससे अच्छा है कि हम त्याग के साक्षी ही हो जाए. त्याग हो जाए फिर भी साक्षी बने, त्याग ना हो फिर भी उसके साक्षी बने. ऐसे विचार में रहे की ना मैंने कुछ त्यागा है और ना मैंने कुछ भोग किया है सिर्फ साक्षी भाव में दृष्टा बनना है. - जो होता है उसे होने दो, जो जाता है उसे जाने दो, जो आता है उसे आने दो सिर्फ हमें साक्षी को नष्ट नहीं होने देना है, बनाए रखना है. - त्याग का विचार ही हमें कर्ता और भोक्ता बना देता है, जन्म-मरण के जाल में फंसा देता है इसलिए साक्षी में रहने से ही परम शुद्ध और पवन पवित्रता प्राप्त होती है और हमारा परम स्वरूप का भी ज्ञान होता है. *****