ज्ञानाक्षर
ज्ञानमार्ग और चेतना की कठिन समस्या
जितेन्द्र गिरी
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चेतना के संबंध में आधुनिक दर्शन का सबसे कठिन प्रश्नों में से एक है जिसे Hard Problem of Consciousness कहा जाता है। सामान्य रूप से इस समस्या को इस प्रश्न के रूप में प्रस्तुत किया जाता है कि भौतिक मस्तिष्क और उसकी भौतिक प्रक्रियाओं से चेतना या subjective experience कैसे उत्पन्न होता है। मस्तिष्क में neurons हैं, उनमें electrical और chemical गतिविधियाँ होती हैं, विभिन्न प्रकार की सूचनाओं का processing होता है और इन सबके साथ हमें रंग, स्वाद, दर्द, सुख, दुःख और स्वयं के अस्तित्व का अनुभव होता है। विज्ञान इन प्रक्रियाओं का बहुत विस्तृत वर्णन कर सकता है, लेकिन प्रश्न फिर भी बचा रहता है कि इन भौतिक प्रक्रियाओं के साथ अनुभव क्यों है। उदाहरण के लिए, हम यह समझ सकते हैं कि आँख में प्रकाश पड़ता है, retinal cells सक्रिय होते हैं, signals मस्तिष्क तक पहुँचते हैं और neurons की विशेष गतिविधियाँ होती हैं। हम यह भी पता लगा सकते हैं कि किसी विशेष अनुभव के समय मस्तिष्क के कौन से भाग सक्रिय होते हैं। लेकिन इन सभी विवरणों के बाद भी एक प्रश्न बचा रहता है - लाल रंग दिखाई देने का अनुभव आखिर है क्या? दर्द के neural correlates को समझ लेने से दर्द महसूस होने का अनुभव कहाँ से आया, यह पूरी तरह स्पष्ट नहीं होता। लेकिन इस समस्या को देखने का एक बिल्कुल दूसरा तरीका भी हो सकता है। हो सकता है कि समस्या इस प्रश्न में ही छिपी हो कि भौतिक पदार्थ से चेतना कैसे उत्पन्न हुई? यह प्रश्न पहले से ही यह मान लेता है कि भौतिक पदार्थ और चेतना दो अलग-अलग प्रकार की वास्तविकताएँ हैं और चेतना बाद में पदार्थ से उत्पन्न हुई। यदि यही मूल धारणा गलत हो तो Hard Problem का स्वरूप ही बदल जाता है। ज्ञानमार्ग या अद्वैत की दृष्टि से हम पूछ सकते हैं कि जिस पदार्थ को हम चेतना से अलग और स्वतंत्र वास्तविकता मान रहे हैं, वह हमें वास्तव में प्राप्त कैसे होता है? जब हम किसी पत्थर को देखते हैं तो हमारे सामने पत्थर का अनुभव है - रंग, आकार, स्थान आदि के रूप में। जब हम शरीर को देखते हैं तो शरीर भी किसी अनुभव के रूप में ही ज्ञात होता है। जब वैज्ञानिक मस्तिष्क को देखते हैं और उसमें neurons तथा electrical activity का अध्ययन करते हैं, तब वह मस्तिष्क भी अंततः देखने, स्पर्श करने, मापने और विचार करने के माध्यम से चेतना में ही ज्ञात हो रहा है। दूसरी ओर विचार, स्मृति, कल्पना, भावना और सुख-दुःख को हम मानसिक अनुभव कहते हैं। इसलिए सामान्य दृष्टि में हमें दो संसार दिखाई देते हैं - एक बाहरी भौतिक संसार और दूसरा भीतर का मानसिक संसार। लेकिन गहराई से देखने पर दोनों की एक समान विशेषता सामने आती है। दोनों ही ज्ञात हैं। दोनों ही अनुभव के रूप में उपस्थित होते हैं। इस दृष्टि से भौतिक और मानसिक दो अलग-अलग मूल पदार्थ मानना आवश्यक नहीं रह जाता। शरीर का अनुभव भी चेतना में है और विचार का अनुभव भी चेतना में है। पत्थर का अनुभव भी चेतना में है और दर्द का अनुभव भी चेतना में है। बाहरी संसार का अनुभव भी चेतना में है और आंतरिक संसार का अनुभव भी चेतना में है। इसका अर्थ यह नहीं कि पत्थर, पेड़, शरीर या मस्तिष्क केवल कल्पना हैं या उनका कोई व्यवहारिक अस्तित्व नहीं है। व्यवहार के स्तर पर वे निश्चित रूप से वास्तविक हैं। हम उनके साथ व्यवहार करते हैं, उन्हें मापते हैं और उनके आधार पर विज्ञान के नियम बनाते हैं। प्रश्न उनके व्यवहारिक अस्तित्व को नकारने का नहीं है। प्रश्न यह है कि क्या उन्हें चेतना से स्वतंत्र, चेतना के बाहर स्थित ऐसी अंतिम वास्तविकता माना जा सकता है जिसे हमने प्रत्यक्ष रूप से कभी चेतना से बाहर जाना हो? हम किसी वस्तु को जानने के लिए चेतना से बाहर नहीं जा सकते। जो कुछ भी जाना जाता है, वह किसी न किसी रूप में अनुभव के रूप में ही जाना जाता है। यहाँ तक कि चेतना के बाहर कोई भौतिक संसार है यह विचार भी चेतना में ही उत्पन्न होने वाला एक विचार है। यहीं से Hard Problem को देखने का पूरा तरीका बदल जाता है। भौतिकवादी दृष्टिकोण में प्रश्न है कि पदार्थ से चेतना कैसे उत्पन्न हुई। लेकिन ज्ञानमार्ग की दृष्टि से उससे पहले यह पूछा जा सकता है कि पदार्थ को चेतना से स्वतंत्र मानने का आधार क्या है। यदि पदार्थ के बारे में हमारा समस्त ज्ञान चेतना में ही प्रकट होता है, तो पदार्थ को चेतना से स्वतंत्र मूल सत्ता मानकर फिर उसी पदार्थ से चेतना को उत्पन्न करने की कोशिश करना शायद समस्या को हल करने के बजाय समस्या को और जटिल बना देता है। यह कुछ वैसा ही है जैसे पहले यह मान लिया जाए कि अनुभव से स्वतंत्र कोई वस्तु है और फिर पूछा जाए कि उस अनुभव-स्वतंत्र वस्तु को अनुभव करने वाला अनुभव कहाँ से आया। यहाँ हमें अपने ज्ञान की मूल संरचना पर वापस लौटना पड़ता है। हमारे सामने जो कुछ भी है वह किसी न किसी रूप में ज्ञात है, किसी प्रकार का अनुभव है और अनुभव बदलते रहते हैं। शरीर बदलता है, विचार बदलते हैं, भावनाएँ बदलती हैं, स्मृतियाँ बदलती हैं, बाहरी वस्तुएँ बदलती हैं और स्वयं शरीर के बारे में हमारी धारणाएँ भी बदलती रहती हैं। लेकिन इन सभी परिवर्तनों को जानने के लिए जानना आवश्यक है। यहीं साक्षी की अवधारणा सामने आती है। साक्षी स्वयं कोई ऐसी वस्तु नहीं है जिसे बाकी वस्तुओं की तरह देखा, छुआ या किसी स्थान पर रखा जा सके। यदि साक्षी को भी एक वस्तु बना दिया जाए तो फिर उस वस्तु को जानने वाला कौन है, यह प्रश्न फिर खड़ा हो जाएगा। इसलिए साक्षी का अर्थ किसी अदृश्य वस्तु या शरीर के भीतर बैठे किसी सूक्ष्म व्यक्ति से नहीं है। साक्षी वह है जिसके कारण सभी अनुभव ज्ञात हैं। इस दृष्टि से चेतना को किसी भौतिक वस्तु की तरह उत्पन्न होना आवश्यक नहीं है। उत्पन्न होने वाली चीजें वे हैं जो पहले नहीं थीं और किसी कारण से अस्तित्व में आईं। लेकिन यदि चेतना ही वह आधार है जिसमें उत्पत्ति, परिवर्तन, कारण, समय, पदार्थ, शरीर और मस्तिष्क की अवधारणाएँ ज्ञात हो रही हैं, तो चेतना को उसी प्रकार किसी दूसरी वस्तु से उत्पन्न मानना संभवतः category mistake हो सकता है। यहाँ ज्ञानमार्ग और आधुनिक consciousness debate के बीच एक रोचक उलटाव दिखाई देता है। आधुनिक Hard Problem पूछता है - मस्तिष्क की भौतिक गतिविधि से subjective experience कैसे उत्पन्न हुआ? ज्ञानमार्ग पूछ सकता है - जिस मस्तिष्क को हम भौतिक वस्तु कह रहे हैं, वह स्वयं किसके भीतर ज्ञात हो रहा है? क्या हमने पहले ही अनुभव को वस्तु और अनुभवकर्ता को अलग-अलग मानकर एक ऐसी समस्या पैदा नहीं कर ली है जिसका मूल हमारी धारणा में है? इसका अर्थ यह नहीं कि neuroscience निरर्थक हो जाती है। मस्तिष्क और चेतना के बीच संबंधों का वैज्ञानिक अध्ययन पूरी तरह सार्थक है। मस्तिष्क की चोट से अनुभव बदलते हैं, दवाओं से मानसिक अवस्थाएँ बदलती हैं और neural activity तथा conscious states के बीच गहरे correlations पाए जाते हैं। लेकिन correlation और ultimate explanation एक ही बात नहीं हैं। मस्तिष्क की किसी अवस्था के साथ किसी अनुभव का संबंध स्थापित कर देना यह अंतिम रूप से नहीं बताता कि भौतिक प्रक्रिया स्वयं subjective experience क्यों है या उससे experience क्यों उत्पन्न होना चाहिए। इसलिए संभव है कि Hard Problem का वास्तविक संकट चेतना पदार्थ से कैसे पैदा हुई? में नहीं, बल्कि क्या पदार्थ चेतना से स्वतंत्र मूल वास्तविकता है? इस प्रश्न में अधिक गहराई से छिपा हो। यदि पदार्थ और मानसिक अनुभव दोनों चेतना में प्रकट होने वाले अनुभव हैं, तो भौतिक और मानसिक के बीच जो कठोर विभाजन हम सामान्यतः करते हैं वह अंतिम सत्य नहीं रह जाता। तब भौतिक और मानसिक दोनों अनुभव की अलग-अलग श्रेणियाँ हो सकते हैं, लेकिन दोनों की आधारभूत स्थिति एक ही है - वे ज्ञात हैं। तब प्रश्न यह नहीं रह जाता कि जड़ पदार्थ में चेतना कैसे आई। प्रश्न उलट जाता है--जिसे हम जड़ पदार्थ कहते हैं, उसकी जड़ता हमें कहाँ और कैसे ज्ञात होती है? जिस मस्तिष्क को हम चेतना का उत्पादक कहते हैं, उस मस्तिष्क का अस्तित्व हमें किसमें ज्ञात है? और जिस चेतना को हम मस्तिष्क की उपज मान रहे हैं, क्या स्वयं मस्तिष्क की पूरी अवधारणा चेतना में ही उपस्थित नहीं है? शायद इसी कारण चेतना की समस्या को केवल भौतिक विज्ञान के भीतर रखकर देखना पर्याप्त नहीं है। विज्ञान हमें अनुभव के साथ जुड़े भौतिक परिवर्तनों का अत्यंत सूक्ष्म ज्ञान दे सकता है, लेकिन ज्ञानमार्ग उससे भी पहले जाकर यह पूछता है कि भौतिक कहे जाने वाले उस संसार का ज्ञाता कौन है और ज्ञाता को स्वयं ज्ञेय वस्तु मानना क्या संभव है? अंततः बात शायद इतनी सी है कि हम सामान्यतः सोचते हैं कि पहले पदार्थ है, फिर उससे मस्तिष्क बना, फिर मस्तिष्क से चेतना उत्पन्न हुई और तब संसार का अनुभव होने लगा। ज्ञानमार्ग इस पूरी कहानी को उलटकर देखने का निमंत्रण देता है। वह कहता है - पहले यह देखो कि पदार्थ, मस्तिष्क, शरीर, विचार और संसार - इन सबका तुम्हें ज्ञान कहाँ और कैसे हो रहा है। यदि इन सबका ज्ञान चेतना में ही हो रहा है, तो चेतना को पदार्थ से निकली हुई वस्तु मानना एकमात्र संभव व्याख्या नहीं है।