Wise Words
देह के बंधन अब टिकते नहीं !!
अखंडिता
क्या लिखूं और क्यों लिखूं कुछ याद नहीं जो बन के रहूं। जो जीती रही वह बीत गया जो बीत गया वह याद नहीं । अब हूँ कि नहीं कुछ पता नहीं चलता है पता कि कुछ हूँ ही नहीं। किस राह चले किस डगर बढ़ें जाना है कहां कुछ खबर नहीं । चलते भी नहीं अब ठिठक गए यात्रा अब पूरी हुई सही । हूँ मैं जहां वह है ही नहीं जाना ही नहीं कि जाना कहीं । पूर्ण निरंतर हूं मैं वही रुकी हुई बस ठहरी हुई । तड़प यह इतनी जोर उठी ना नींद है ना जागृति । छोड़ चलें यह देह भला देह के बंधन अब टिकते नहीं ..... २२.६.२०२५ संदर्भ : बार-बार जब माया के उठा पटक निर्धारित प्रारब्ध के अनुसार पाठ पढ़ाते हैं और जीव को असत्य का भान होता है , वह सत्य की खोज में आगे बढ़ने को तैयार हो जाता है । तब सद्गुरु का अवतरण होता है । सद्गुरु का जीवन में आगमन किसी भी साधक के जीवन की प्रमुख और विशिष्ट घटना है। सद्गुरु के द्वारा दीक्षा दिया जाना अर्थात स्वीकार किया जाना उसके जीव रूप को सार्थक कर देता है। इतना होने पर देह और देह के बंधनों का टिकना असंभव हो जाता है और आसक्ति का छूटना अपरिहार्य। प्रणाम
Share This Article
Like This Article
© Gyanmarg 2024
V 1.2
Privacy Policy
Cookie Policy
Powered by Semantic UI
Disclaimer
Terms & Conditions