Wise Words
क्या जगत स्वप्न है?
शुभम
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अक्सर साधकों के मन में ज्ञानमार्ग की शिक्षाओं पर मनन करते समय यह शंका बनी रहती है कि गुरुदेव जगत को स्वप्न की उपमा से समझाने का प्रयास करते हैं, तो क्या यह जगत भी स्वप्न ही है? इस लेख में व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर इसी संदर्भ में कुछ बातें प्रस्तुत की गई हैं। जब हम निद्रा में स्वप्नलोक में प्रवेश करते हैं, तो वह भी जाग्रत जगत की तरह एक संपूर्ण और विराट जगत प्रतीत होने लगता है। लेकिन जब हम वहाँ तर्कपूर्वक विचार करते हैं, तो यह प्रतीत होता है कि वह स्वप्न किसी भौतिक पदार्थ से निर्मित नहीं है और न ही उसका कोई स्वतंत्र भौतिक धरातल दिखाई देता है। स्वप्न के दौरान उसमें दिखाई देने वाले विभिन्न दृश्य, स्थान, व्यक्ति और घटनाएँ वास्तविक प्रतीत होते हैं। उस समय स्वप्न देखने वाले को यह सहज ही अनुभव होता है कि वह किसी ऐसे जगत में उपस्थित है, जहाँ विभिन्न घटनाएँ घटित हो रही हैं। किंतु स्वप्न टूटने के बाद जब हम उस पूरे अनुभव पर विचार करते हैं, तो यह प्रश्न उठता है कि स्वप्न में दिखाई देने वाला इतना विस्तृत जगत कहाँ से आया और वह किस आधार पर प्रतीत हो रहा था? स्वप्न के भीतर रहते हुए जिस जगत को हम अपने सामने उपस्थित मान रहे थे, जागने के बाद उसकी प्रतीति का स्वरूप ही बदल जाता है। यहाँ एक सूक्ष्म बात पर ध्यान देना आवश्यक है कि स्वप्न के पदार्थरहित होने की यह धारणा भी बुद्धि जाग्रत जगत के सापेक्ष ही बना रही है। तो क्या यह संभव नहीं है कि स्वप्न के सापेक्ष जाग्रत जगत का अस्तित्व भी स्वप्न की तरह ही किसी भौतिक पदार्थ पर आधारित न हो? इन सभी बातों पर विचार करते हुए बुद्धि यह समझने का प्रयास करती है कि चाहे वह स्वप्न हो या जाग्रत जगत, उसकी प्रतीति में स्मृतियों की क्या भूमिका है। यहाँ उद्देश्य स्वप्न और जाग्रत जगत को बिना विचार किए एक समान मान लेना नहीं है, बल्कि दोनों की प्रतीति के स्वरूप पर तर्कपूर्वक विचार करना है। स्वप्न और जाग्रत अवस्था के अनुभवों में स्पष्ट अंतर दिखाई देता है, फिर भी स्वप्न की उपमा हमें यह जाँचने का अवसर देती है कि जिस जगत को हम अपने सामने उपस्थित मानते हैं, उसके संबंध में हमारी धारणाएँ किस आधार पर बनी हैं। अंत में जब गुरुदेव जगत को स्वप्न की उपमा से समझाते हैं, तो इस पर विचार करना उपयोगी हो सकता है कि इस उपमा के माध्यम से किन मान्यताओं की ओर हमारा ध्यान आकर्षित किया जा रहा है। क्या इसका उद्देश्य केवल स्वप्न और जाग्रत जगत की तुलना करना है, या इसके माध्यम से हमें जगत की प्रतीति, स्मृतियों की भूमिका और अपनी मान्यताओं की सत्यता पर गहराई से विचार करने का अवसर भी मिलता है? इस प्रकार यह प्रश्न कि “क्या जगत स्वप्न है?” केवल एक निष्कर्ष पर पहुँचने का विषय न रहकर, जगत की प्रतीति और उसके आधार को समझने की एक विचार प्रक्रिया बन जाता है।