Wise Words
Home
Read
Write
Publish
Profile
Logout
एक साधक की यात्रा
निशांत कुमार सिन्हा
पता नहीं इस विचार का कारण, पता नहीं क्या बात हुई अज्ञान की काली घटा हटी या ज्ञान की आज बरसात हुई। अज्ञान हटा है कह नहीं सकता, ज्ञान घटा है कह नहीं सकता। पर कुछ तो हुआ है कह सकता हूँ। साधन के अभिमान से मैं कभी ज्ञानमार्ग पे हसता था। साधना नहीं इस मार्ग में ये जान के मैं बेचैन हुआ। फिर प्रश्नों की बरसात हुई, फिर ना जाने कैसी बात हुई। साधन का अभिमान तो था पर गुरुक्षेत्र को भी पकड़ लिया। प्रश्नों की बारिश चिंतित मैंने स्वयं को उनसे जोड़ दिया। फिर कृपा घटी अभिमान हटा, और हाथ से माला छूट गयीं। गुरुक्षेत्र की करुणा में प्रश्नों की चिंता भी छूट गयीं। यात्रा पे निकला ये साधक चरण चार में जा पंहुचा। ज्ञान की बूँद को मैं तरसा, ना जाने कितने प्रश्न किये। पर मार्ग के सभी साधकों ने तब मुझको वहां संभाला था। हर प्रश्न के उत्तर दे दे कर अज्ञान को मेरे काटा था। गुरुदेव की ऊँगली थामे अब साक्षी से मुलाक़ात हुई। ह्रदय में फिर करुणा पनपी, स्वयं का फिर विस्तार हुआ। हो कर साक्षी फिर मेरे रूपो का अनगिनत विस्तार हुआ। लगा की जैसे धन्य हुआ मैं, अब मेरा बेड़ा पार हुआ। पर अभी भी प्रश्न बाकी थे, ना मौन घटा ना प्रश्न हटे फिर कैसे बेड़ा पार हुआ? फिर प्रकाशदूत की मशाल को थामे गुरुक्षेत्र से प्रार्थना किया। अब तो वो बस होने दो जिसके लिए मैंने जन्म लिया। फिर कृपा हुई, सब प्रश्न हटे आकाश को मैंने जान लिया। वृतियों की बदली को फिर सूर्य सा हो के छांट दिया। गुरु की परम कृपा के आगे मैं नतमस्तक अब होता हुँ, शब्द नहीं है मेऱ पास बस धन्यवाद मैं कहता हुँ। धन्यवाद गुरु को कहता, धन्यवाद सभी साधक को। कदम बढ़ाता हुँ अब आगे गुरुक्षेत्र में मिल जाने को। अज्ञान की काली घटा हटी या ज्ञान की आज बरसात हुई। अज्ञान हटा है कह नहीं सकता, ज्ञान घटा है कह नहीं सकता। बस इतना ही मैं कह सकता हुँ, मुस्कान खिली है अधरों पे अब ना जाने कैसी बात हुई, आनंद भरा है भीतर मानो प्रेम की शुरुआत हुई। प्रणाम
Share This Article
Like This Article
© Gyanmarg 2024
V 1.2
Privacy Policy
Cookie Policy
Disclaimer
Terms & Conditions