ज्ञानाक्षर
अमृत मंथन
निशिगंधा क्षीरसागर
लेख पसंद करें
अमृत मंथन खोज में अमृत कीं कल्पना हुई समुद्रमंथन कीं देवासुरो ने मंथन किया सबसे पेहले विष हि निकला दों ध्रुव विरुद्ध दिशा विष कें सिवा अमृत कहा ? अमृत कीं खोज में विषकों भी स्वीकारना पडा देव असुर खुद कें भितर वृत्ती विचार मथना होगा निकलेंगे पेहले दोष विकार उनका संयम करना होगा दुःख का विष पीना होगा नीलकंठ हो कंठ में धारण ग्रहण कर सहनशील तितीक्षा साधक कें गुण बढाना होगा छिपे रत्न देहसागर में हिरण्ममयी पात्र मथना होगा गुहय गुहमें छिपा सोना दर्शन धीरे धीरे होगा साधना तपसे तपना होगा काबील खुद कों बनाना होगा प्राप्त कीं हि प्राप्ती होगी आवरण हटाकर जो होगी कठीनाई सहकरही जो होगी प्राप्ती दु:खो कें बाद होगी भितरी मथनकीं जरुरत होगी खोज में अमृत कीं तलाश में शांती कीं.....!!! खोज में अमृत कीं सत्य नित्य शाश्वत कीं तलाश में शांती कीं अशांत मथन सहना होगा अशांती कंपन बदलाव माया पीछे सारगर्भीत तत्व छिपा संकट अशांती सें गुजरना होगा कायर होकर भाग मत हथियार नीचे डाल मत पीडा दुःख सहना होगा कठीनाई दुःख बस है सीख यश अपयश सम्मान सुख दुःख नश्वर सारे अनुभव याद रख नश्वर संसार कीं पिडा क्यूँ ? बिरहा सें तू कष्टी क्यूँ बिछडने का दुःख क्यूँ और यशसें उछले क्यूँ? मिथ्या में सत्यबुद्धी क्यूँ? गहीराई में झाक तू खोज में अमृत कीं तलाश में शांती कीं सत्य होगा जानना सहीसही असतकों त्यागना होगा अभीयही खोज में अमृत कीं.....!!! खोज में अमृत कीं.....!!! खोज में अमृत कीं सागर मंथन हो रहा अपने आप घट रहा जीवन मथन हो रहा मिथ्या उस कीं दिखा रहा ममत्व त्यागकों सिखा रहा माता गुजरी दुःखी क्यूँ? भाई बिछडा विरह क्यूँ? पिछले जनम कीं तेरी माता इस जनम में होगी कहा? प्रश्न पूछ खुद सें जरा? विचार मंथन कर जरा.... आज मिला कल बिछडेगा बिछडनेकें लिये है मिलना कौन यहाँ स्थायी बता ? कौन यहाँ अमर बता ? यही सत्य इस जीवन का जिसका जनम उसका मरना बदले दुनिया सत्य इतनाsसा लेकिन मिथ्या में मिथ्या खेल में खेल कुशलता सुदंरता सें जीना होगा परंतु उसमे नहि फसना आसक्ती छोड आनंद लेना यही खेल समझना होगा मिथ्यासें हि सत्य मिलेगा खोज में अमृत कीं ....!!! तलाश में अमृत कीं ....!!! खोज थी गलत दिशा अंधेरे में रहा खोजता जो मायामें नही था वों वहा मिले कहा हुई गुरूकृपा संकेत मिला मिली खोज कीं अचूक दिशा सब कुछ मुझ में और में सब में मै सबका साक्षी द्रष्टा जीवन बनी एक पाठशाला आवश्यक था अनुभव लेना मिथ्या जिनको मैने जाना अनंत साक्षी चेतन्य अजन्मा देह साधन लेकर जनमा देह मात्र एक आकृती मेरे अज्ञानसें जो निकली मिथ्या माया छाया नकली मिथ्या जीवन मंथन असली अज्ञान का छोडकर पानी असार सें उपर उठा अपने आप माखन दिखा पेहलेसें जो उपस्थित था खेल जीवन था खिलौना खेलकर मंथन जैसे बिलौना संसारमें छिपा असली सोना ज्ञान मथनसें प्रत्यक्ष दिखा देहबुद्धी का असार छास छोडतेहि सत्य प्रगट हुवा माखन उपर तैर आया खोज में अमृत कीं ....!!! खोज में अमृत कीं ....!!!