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ज्ञानतरंग: "चित्त, चित्तवृत्ति और अवस्था"
जानकी
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**चित्त, चित्तवृत्ति और अवस्था** <br><br><div class='ui image'><img width='1200px' src='images/89426796-istockphoto-2150855365-1024x1024.jpg'></div><br><br> ज्ञानतरंग के इस भाग में सद्गुरूदेव श्री तरुण प्रधान जी द्वारा विभिन्न सत्संग, प्रवचन और लेखों में "चित्त, चित्तवृत्ति और अवस्था" के विषय पर व्यक्त कुछ ज्ञानतरंगों को प्रश्तुत किया गया है। यह श्रृखला के रुपमें इससे आगे भी क्रमश: प्रकाशित होता रहेगा। १। चित्त विभिन्न प्रक्रियाओं का व्यवस्थित संग्रह है। २। विश्वचित्त ही सृष्टि है। ३। चित्त अनंत है, जैसे-जैसे जीव का विकास होता है वैसे-वैसे ऊपरी परत में जाता है। ४। चित्त भी अद्वैत का ही भाग है; जो द्वैत है वह अद्वैत में ही प्रकट हो रहा है। ५। चित्त ही नियम है, नियम ही चित्त है; जैसी रचना वैसा नियम। ६। चित्त की अवस्था का मूल एक ही है; या तो प्रवृत्ति या निवृत्ति रहेगी। ७। चित्त की अवस्था को बदलने की क्षमता सभी को है, ये प्रकृति की देन है। ८। चित्त के सारे प्रक्रियाएं चक्रमें चलतें हैं; इसलिए सात चक्रों को उपमा के रुपमें दर्शाया गया है। ९। जो सबसे उपयोगी वृत्ति है उसको चित्त सामने लाता है। १०। चित्त का स्वभाव है कि जो अनुभव होता है वह अपने आप स्मृति में छप जाता है। ११। जब स्मृति गति करती है, उसमें प्रक्रिया चलती है तो उसको वृत्ति कहते हैं। १२। चेतना, विचार, भावना आदि चित्तवृत्ति हैं। १३। चित्तवृत्ति के अभाव में अस्तित्व संपूर्ण और पवित्र है। १४। चित्त जहाँ प्रकृति चाहेगी वहीं रहेगा; उसको जबरदस्ती हटाकर कहीं ले जाना मूर्खता है। १५। चित्त कभी रुकता नहीं; अनुभवकर्ता कभी चलता नहीं। १६। जबतक अज्ञान है तब तक सारे अवस्थाएं, लोक, वृत्तियाँ, संसार, जीव आदि सब कुछ है; अज्ञान नहीं है तो केवल शून्यता में अनंत संभावनाएं हैं। १७। चित्त अकेला नहीं है विश्वचित्त का ही भाग है। १८। विश्वचित्त भी अज्ञान से है; जबतक अज्ञान है तभी तक लीला है। १९। पूरा चित्त विलीन कभी नहीं होगा, जो नहीं है वह कैसे जाएगा? घर में भूत नहीं है तो भगाया भी नहीं जा सकता; केवल नहीं है यह ज्ञान से पता चलता है। २०। चित्त अपने लिए हितकारी अनुभव को सकारात्मक और हानिकारक को नकारात्मक रंग से रंग देता है। २१। चित्त को भी स्वयं को बचाने की क्षमता है; इसकी कुंजी चेतना और संकल्प शक्ति है। २२। चित्त के हर परत में स्त्री-पुरुष दोनों गुणों के प्रक्रिया मिलते हैं, दोनों गुण एक दूसरे का पूरक है; अर्धनारेश्वर इसी पर आधारित अवधारणा है। २३। सम्पूर्ण अस्तित्व का अभी का अवस्था निद्रा का है; विश्वचित्त का स्वभाव निद्रा का है। २४। निद्रा ही वो अवस्था है जिसके आधार पर सभी अवस्थाएँ टिके हुए हैं। २५। सारे रचना और सारे स्वप्न निद्रा के पृष्ठभूमि में ही होता है। २६। अज्ञान के कारण अवस्थाओं में भेद दिखाई देता है; जब जागृति से जागेंगे सब अवस्था बराबर है। २७। जागृति, स्वप्न, सूक्ष्म, निद्रा, मृत्यु आदि सभी अवस्थाएं चित्तवृत्ति है। २८। स्वप्न जागृति है, जागृति स्वप्न है; सब अनुभवकर्ता का पटल पर चलता हुआ माया है। २९। अध्यात्म में दूसरी अवस्थाओं और विचित्र अनुभव से ज़्यादा जागृति उपयोगी है; क्योंकि ज्ञान यहीं है, गुरु यहीं है। ३०। जिसको ज्ञान नहीं हुआ उसको जागृति भी बेकार का सपना है। ३१। जागृत अवस्था जीवन का संघर्ष के लिए है। ३२। एक अवस्था/अनुभव से दूसरे में प्रवेश नहीं होता; अवस्था/अनुभव एक से दूसरे में बदल जाता है। ३३। चित्त के सभी अवस्था और चित्तवृत्तियाँ हमेशा विद्यमान रहती है; जो वृत्ति बलशाली है वह दूसरी वृत्ति को ढक लेती है; इसलिए एकसाथ दो अवस्था का अनुभव नहीं होता। ३४। चित्त की अवस्था बदलते ही लोक बदल जाते हैं। ३५। लोक चित्त की अवस्था मात्र है; कोई विशेष जगह नहीं है। ३६। देव लोक का अनुभव होना और देव योनी में प्रवेश करना एक ही बात है। ३७। जिस लोक में और जिस अवस्था में जहाँ भी हो शरीर दिख पड़ता है तो वो मिथ्या रुप ही है। ३८। लोक, शरीर और मानसिक स्थिति एक साथ पाए जाते हैं। ३९। अवस्था प्रकृतिक रुप से बदलती है और उस अवस्था अनुसार के कार्य अपने आप चलते हैं। ४०। अवस्थाओं का ज्ञान स्मृति पर आधारित है। ४१। जहाँ अवस्थाओं के बीच स्मृति पूल नहीं बनता वहाँ अवस्थाओं का निरंतरता टूट जाता है। ४२। अवस्था स्मृति का होता है; अनुभवकर्ता हमेशा वर्तमान में और अवस्थाओं से परे है। ४३। स्मृति हमेशा भूतकाल में संस्कारों के रूप में, भविष्य में कल्पना या अपेक्षा के रूप में होता है। ४४। जागृत अवस्था में जो प्राकृतिक रुपसे मिला है वह सीमित है; लेकिन जीवन और ज्ञान के लिए काफ़ी है। ४५। सृष्टि का सारा प्रपंच मनोमय है, मन जिस तत्व से बना है वही तत्व से सृष्टि बना है। ४६। मन संस्कारों से बंधा है; वह वासना नहीं आएगी जो मन ने पहले अनुभव न किया हो। ४७। मन, शरीर, वस्तु है नहीं; मन, शरीर, वस्तु चित्त निर्मित भ्रम है, धारणा है। ४८। मन, शरीर, वस्तु तंमात्राओं का संग्रह है, वही तंमात्रा प्रकट है; तंमात्रा नाद है, परिकल्पना मात्र है। ४९। मन का विशेषता है कि वह आसक्ति छोड़ नही सकता; जहाँ उसको सुख मिलता है वहाँ आकर्षित हो जाता है। ५०। चित्त की परतें केवल सूचना मात्र हैं; इनको प्रकाश, ध्वनि, भावना आदि किसी भी रुपमें देखा जा सकता है। ५१। स्वर्ग भी यहीं है नर्क भी यहीं है; जब मानसिक स्थिति सुखदायी हो स्वर्ग है, जब दुःखदायी हो नर्क है, जब उत्थान हो स्वर्ग है, जब पतन हो नर्क है। ५२। स्वर्ग-नर्क स्वयं का बनाया हुआ है; स्वयं की मानसिक अवस्था है। ५३। मनोशरीर असिमितता के पर्दे पर सीमित छवि मात्र है। ५४। अंतरसंपर्कता का नियम चित्त एक होने के कारण है। ५५। चित्त के स्तर से चित्त को नियंत्रित नहीं किया जा सकता; चित्त से ऊपर जाकर नियंत्रित किया जा सकता है। ५६। जब नाद रचनाएँ उपयोगी होते हैं तो विकास कह दिया जाता है; जब अनुपयोगी होते हैं तो पतन कह दिया जाता है। ५७। सभी अनुभव कोई न कोई संस्कार बनाते हैं और असत्य होते हैं; जीव उसमें फँसता जाता है। ५८। दृष्टि ही सृष्टि है, इसलिए सृष्टि की कोई सीमा नहीं; अनंत लोक संभव है। ५९। माया में कुछ भी संभव है, जो चाहे बना सकती है; यदि सत्य होता तो सरल होता, सीमित होता। ६०। ज्ञानमार्ग में कोई अनुभव साधारण या विचित्र नहीं है; माया अपने आप में विचित्र है, हर अनुभव विचित्र है। ६१। उद्देश्य सृष्टि के बाहर नहीं, सृष्टि का ही भाग है; इसलिए सृष्टि का कोई उद्देश्य नहीं मिलता। ६२। सृष्टि केवल प्रतीत हो रही है; सच में कोई सृजन या सृष्टि नहीं है। ६३। स्वस्थ चित्त में अहम् पहरेदार के तरह रहता है; बूरा प्रभाव आने नहीं देता। ६४। अशुद्ध चित्त में बूरा प्रभाव अधिक पड़ता है। ६५। जो अशुद्ध, कमजोर, आहत और विमार चित्त है उसकी प्राथमिकता कुछ और होती है, शारीरिक और मानसिक विमारीओं में ही उलझा रहता है; इसलिए अपनी प्रतिरक्षा कम कर देता है। ६६। सभी मनोशरीर अपने आप में अद्वितीय है। ६७। व्यक्ति एक अनुभव है; दोहोरी माया है, व्यक्ति को नहीं व्यक्ति का अनुभव होता है। ६८। अहम् वृत्ति का नाश नहीं होता; यदि कोई ऐसा प्रयास करता है तो वह स्वयं का नाश होता है। ६९। जीव का ऊपरी परत में विकास होने से निचली परत नष्ट नहीं होती; क्योंकि वह भी आवश्यक है। ७०। जितनी चित्तशुद्धि होती जाती है उतनी बुद्धि बढ़ती जाती है। ७१। स्वप्न में ज्ञान पहुँचा है तो चित्त को दोनों अवस्था एक सी प्रतीत होती है; हर जगह दो ही है-दृष्य और द्रष्टा। ७२। स्मृति में वृत्तियाँ बीज रुप में हैं; बीज में अनंत संभावनाएं हैं। ७३। जीव को सीमित अनुभव होने के कारण उत्तरजीविता संभव है। ७४। जो स्वयं के अनुभव में नहीं है उसको सत्य नहीं मानना चाहिए; प्रमाण अपरोक्ष अनुभव से ही मिलता है। ७५। किसी भी स्मृति का अनुभव हो- सीधा अनुभव संभव नहीं है। ७६। सभी अनुभव माया है; चित्त के बिना अनुभव संभव नहीं। ७७। जिन वृत्तियों के कारण मार्ग में प्रगति रुक जाती है उन वृत्तियों को विकार कहते हैं। ७८। वृत्तियों का दमन विकार है; विकार का दमन फिर से विकार पैदा करता है। ७९। कोई भी वृत्ति का पहला प्रभाव स्मृतिपर पड़ता है। ८०। हर वृत्ति में शक्ति होती है, छोटी सी वृत्ति बड़ी रुप लेती है; स्नायुतंत्र से शरीर में और शरीर से कर्म में बदल जाती है। ८१। एक ही विश्वचित्त है, किसी भी घटना का प्रभाव सभी में पड़ता है; कार्मिक संबंध और चित्त के क्षमता अनुसार प्रभाव कम या अधिक होता है। ८२। जिसकी चेतना और संकल्प शक्तिशाली है उसको नकारात्मक विचार/प्रभाव छू भी नहीं सकता। ८३। भौतिकता और भौतिक शरीर की सीमा होती है; लेकिन मानसिकता और चित्त की कोई सीमा नहीं है; इसलिए जितना सके उतना शक्तिशाली बनाया जा सकता है। ८४। विचार कितना भी अच्छा लगे यदि वह नकारात्मक है तो कभी न कभी चित्त उसको पहचान ही लेगा। ८५। दूसरों के विचार, भावना आदि जान लेना मानसिक दूरसंचार है। ८६। जिसका चित्त विकसित है वह दूसरों की भावना पकड़ सकता है। ८७। कर्षण के नियमानुसार जितनी शुद्ध चित्त है उतनी शुद्ध और उच्च जीव संपर्क करने लगते हैं। ८८। चित्त आइना है; जो मन में है वही बाहर दिखाई देगा। ८९। जिस लोक पर ध्यान केन्द्रित होता है वही ठोस एवं सत्य लगता है; क्योंकि वहाँ स्मृति बदल गई और सीमित हो गई। ९०। जीव संस्कारों का परिणाम है। ९१। जीव का जन्म कारण शरीर निर्धारण करता है, भौतिक शरीर को डीएनए निर्धारण करता है। ९२। व्यक्ति जैसा है वैसे ही लोग उसकी ओर आकर्षित होते हैं; यही चित्त का नियम है। ९३। सुख-दुःख चित्तवृत्ति हैं; वृत्ति का अभाव मुक्ति है, आनंद है। ९४। शरीर में चक्र नहीं होते, चक्र के क्षेत्र होते हैं; शरीर स्वयं चक्र है, शरीर चित्त की स्थूल और जटिल परत है। ९५। शरीर या व्यक्ति का पुनर्जन्म नहीं होता; जीव का होता है। ९६। संसार रंगमंच के तरह है; शरीर, जीव कठपुतली के तरह है; संस्कार और चित्तवृत्ति उनको चला रहे हैं। ९७। जैसे वासना, संस्कार है वैसा नया शरीर मिलता है। ९८। साधना को जीवनशैली बनाना और अपनी इच्छा से कभी भी किसी भी अवस्था/लोक में जा पाना साधक का लक्ष्य होना चाहिए। ९९। सृजन और विलय वस्तुओं के स्थायित्व के अनुसार होता है। १००। सभी अनुभव मायावी है और इन्हीं अनुभव जीवन के लिए उपयोगी हैं। क्रमश: