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जीवन: एक रंगीन चलचित्र
प्रवीण कुमार
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कई बार कहा जाता है कि जीवन एक चलचित्र के समान है। परंतु जब हम अपरोक्ष अनुभव लेने का प्रयास करते हैं तो ऐसा दिखता है कि जीव अपना कार्य करने के लिए स्वतंत्र है और प्रकृति अपना कार्य निष्पक्ष भाव से कर रही है। जो भी घटनाएं प्रकट हैं उन सभी के पीछे कारण और फल स्वरूप प्रभाव भी दिखता है। अगर आपसे कोई आपका नाम पूछे तो आप उसे सच और झूठ बता सकते हैं अर्थात जीव के पास विकल्प है सच और झूठ में चयन करने का। अगर प्रकृति के किसी भी घटना का उदाहरण ले जैसे, वर्षा होना, तो इस वर्षा होने का भी कारण मिल जाता है अर्थात घटनाओं का कारण भी मिल जाता है। अगर जीवन वास्तविकता में एक चलचित्र जैसा है, तो हमें विकल्प नहीं देखेंगे, हमें कारण नहीं देखेंगे, और हम प्रभाव का संबंध कारण से नहीं बना पाएंगे। ठीक सिनेमा की तरह जहाँ सभी अभिनेता अपने भाग की पटकथा के अनुसार वही अभिनय करते हैं जो पहले से लिखा हुआ है। अगर सिनेमा में खलनायक ने कुछ बुरा कर्म किया तो नायक उसे दंड देगा। यह दंड नायक इसलिए नहीं देगा, क्योंकि दंड देना तार्किक अगला भाग है (अर्थात दंड प्रभाव है और बुरे कर्म कारण है) बल्कि इसलिए, क्योंकि दंड देना पटकथा में पहले से लिखा हुआ है। परन्तु जब हम जीवन को देखते हैं तो हमें जीवन चलचित्र जैसा नहीं दिखता। जीव मुख्य भूमिका में दिखता है जहाँ जीव के पास किसी घटना को कारण मान कर प्रभावों के विकल्पों को प्रकट करने की क्षमता होती है। फिर क्यों कहते हैं की जीवन चलचित्र के समान है? **तकनीकी विश्लेषण** माया के स्तर पर कारण-प्रभाव और प्रभावों में विकल्प मिल जाते हैं और जीवन तार्किक लगने लगता है। अहम् वृत्ति वर्तमान के अनुभव के अनुसार बुद्धि की सहायता से स्मृति में अंकित अनेक संभावित विकल्पों में से सर्वोत्तम प्रभाव को प्रतिक्रिया के रूप में प्रकट करती है। जो भी कर्म जीव के शरीर से हो रहे होते हैं अहम् वृत्ति उन कर्मों पर स्वयं को उत्तरदायित्व दे देती है और जो कर्म किसी और के शरीर से हो रहे होंगे उन कर्मों को अहम् वृत्ति किसी और का उत्तरदायित्व दे देगी। यह उत्तरदायित्व और कारण-प्रभाव इसलिए तार्किक लगते हैं क्योंकि अभी की घटना पहली घटना के बाद कई बार हो चुकी है और ये जीव स्मृति में संचित भी है। इसलिए जब भी अभी की घटना घटती है, उस क्षण बुद्धि पहली घटना को अभी की घटना का कारण मान लेती है और जो भी विकल्प प्रतीत हो रहे होते हैं वह भूतकाल की स्मृति या भविष्य की कल्पना मात्र होती है। माया के स्तर पर यह देखा जा सकता है कि बुद्धि वर्तमान की घटना को मात्र व्यवस्थित करने का प्रयास कर रही है, जिससे जीवन में तर्क बना रहे, अर्थात अभी के अनुभव को भूतकाल के घटनाओं से क्रमिक रूप से बांधने का प्रयास कर रही है और भविष्य की सर्वश्रेष्ठ कल्पनाओं पर आधारित होकर अगले घटना को प्रतिक्रिया के रूप में अभिव्यक्त करने का प्रयास कर रही है। **जीव की मान्यता** जीवन चलचित्र जैसा प्रतीत नहीं होता है क्योंकि साधक जीवन को माया के स्तर पर देखता है अर्थात साधक स्वयं को अभी भी जीव मान कर जीव के ही दृष्टिकोण से अच्छे-बुरे अनुभव को भोग रहा है। परंतु आप अभी ज्ञान पर धयान दे तो आप जानते हैं की अगर बुद्धि किसी भी घटना को कारण या प्रभाव मान ले तो इसका अर्थ होगा कि बुद्धि को अनुभव हो रहा है इसका अभिप्राय यह है कि बुद्धि को वर्तमान का ज्ञान हो रहा है परन्तु यह संभव नहीं है। हम जानते हैं की अनुभव में अनुभव लेने की क्षमता नहीं है, और अनुभव केवल अनुभवकर्ता को ही होते हैं। इसलिए बुद्धि को कुछ भी ज्ञान नहीं हो सकता है और बुद्धि किसी भी घटना को कारण या प्रभाव नहीं मान सकती है। जब यह विचार उठता है की मुझे कुछ समझ आ रहा है तब यह विचार भी एक अबोध, निर्दोष और स्वतंत्र अनुभव ही है, बस यहाँ समझने का भ्रम उत्पन्न हो रहा है क्योंकि यह नया विचार पहली घाटना और दूसरी घटना के बाद आ गया है। इसलिए ऐसा लगता है कि मुझे समझ आ रहा है परन्तु यहाँ केवल तीन विचार ही है पहला विचार पहली घाटना के रूप में, दूसरा विचार दूसरी घटना के रूप में और तीसरा विचार समझ के स्वीकृति के रूप में और तीसरे विचार को एक मान्यता के रूप में मान लिया गया बिना प्रश्न किये। इसलिए जीवन तार्किक और सत्य लगने लगता है। इसे दो प्रसंगो के उदाहरण से समझने का प्रयास करते हैं : जब दो मनुष्य आपस में बात कर रहे होते हैं तो उन्हें उस वार्तालाप का कुछ भी बोध नहीं होता। १) **पहला प्रसंग :** दो व्यक्ति एक गोपनीय भाषा में वार्तालाप कर रहे हैं और यह भाषा केवल इन दोनों व्यक्तियों को ही समझ आती है। २) **दूसरा प्रसंग :** यहाँ दो व्यक्ति पहले प्रसंग के व्यक्तिओं का नक़ल कर रहे हैं अर्थात दूसरे प्रसंग के दोनों व्यक्ति वार्तालाप करने का नाटक कर रहे हैं और वही शब्द बोल रहे हैं जो पहले प्रसंग के व्यक्ति बोल रहे हैं ठीक उसी शैली में, ठीक उसे भाव में, परन्तु दूसरे प्रसंग के व्यक्तियों को इस गोपनीय भाषा का कोई ज्ञान नहीं। जब एक व्यक्ति कुछ बोलता है तो दूसरा व्यक्ति भावपूर्वक उत्तर देता है पर इन दोनों व्यक्ति को वार्तालाप का कोई बोध नहीं हो रहा क्योंकि ये व्यक्ति केवल नाटक कर रहे हैं। अगर दुसरे प्रसंग को कोई ऐसा व्यक्ति देख ले जिसे नक़ल होने का पता नहीं हो तो वह दुसरे प्रसंग के व्यक्तियों के वार्तालाप को वास्तविक मान लेगा। ठीक ऐसा ही हमारे साथ हमेशा होता रहता है, ध्यान की वृत्ति जब अज्ञान में होती है तब वृत्तियों के क्रमिक रूप से प्रकट होने से जीवन वास्तविक प्रतीत होता है। परन्तु किसी भी वृत्ति को कुछ भी बोध नहीं हो रहा है। **वृत्तियों का कोलाहल** मनुष्य के सभी कर्म बोध रहित हैं और मात्र एक नाटक है। मनुष्य के रूप में कई वृत्तियाँ जैसे अहम् भाव, बुद्धि आदि इस नाटक में भाग ले रहें हैं और किसी भी वृत्ति को कुछ भी बोध नहीं होता है। यह नाटक विभिन्न वृत्तियों के दृष्टिकोण से देखने पर भिन्न प्रतीत होंगे जैसे : १)**शरीर के दृष्टिकोण** से ऐसा प्रतीत होगा कि शरीर कर्म कर रहा है। २) **बुद्धि के दृष्टिकोण** से ऐसा प्रतीत होगा की अनंत प्रतिक्रियाओं में से सर्वश्रेष्ठ प्रतिक्रिया प्रकट किया जा रहा है। ३) **अहम् के दृष्टिकोण** से ऐसा प्रतीत होगा की, वह कर्म करना है जिससे उत्तरजीविता बना रहे। ये सभी वृत्तियाँ झुंड में एक साथ प्रकट हो जाती है और जो भी भासित हो रहा है उसमें जीवन होने का भ्रम उत्पन्न करती है और ऐसा लगता है की जीवन चल रहा है। ज्ञान के अभाव में अहम वृत्ति के दृष्टिकोण से ही अनुभवों को देखा जाता है और क्योंकि यह वृत्ति बाकी वृत्तियों के साथ मनघडंत संबंध बना लेती है एक पृथक मनोशरीर यंत्र व्यक्ति के रूप में प्रकट हो जाता है। परंतु वास्तविकता में जो भी अभी प्रतीत हो रहा है वह एक चाबी वाले खिलौने जैसा है जिसमे चाबी भर देने पर क्रमिक रूप से वृत्तियाँ प्रकट होना शुरू कर देती हैं। हमारे सामने जो भी प्रकट हो रहा है वह केवल क्रमिक अनुभव है। जब यह भाव आता है की ये घटनाएं सत्य है तब यह विचार भी एक अनुभव मात्र ही होता है। जब तक आप इन सभी अनुभवों को ज्ञान के साथ नहीं देखेंगे तब तक जीवन सत्य लगेगा। जब आप ज्ञान बनाये रखते है अर्थात साक्षीभाव में रहते हैं तब यह देखना आसान हो जाता है कि जो भी प्रकट हो रहा है वह केवल अनुभव है। एक के बाद एक वृत्तियों के झुंड के रूप में दृश्य प्रकट हो रहा है जो की, चलचित्र के समान है। जीवन चलचित्र ही है परन्तु यह चलचित्र तभी दिखेगा जब आप किसी भी अनुभव से संबंध न रखें और ध्यान ज्ञान पर बनाए रखें।