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दृष्टि बनूँ तत्व की
जानकी
क्या हूँ मैं परेशान थी, भ्रमित थी कोहराके कौवा सरी। वाणी का जो तरंग था क्षितिजमें मार्ग मिला उसघड़ी॥ वाणी अमृत सा जो सिंचित हुआ वो व्यग्र मुमुक्ष में। खोजी अंत हुआ विश्रांति मनका चित्त चला मोक्ष में॥ कृपा से पहुँची ये ज्ञान तल में मैं तो यही ब्रह्म हूँ। मेरे ही रुप वासना के खेल है खेलूँ भी तो गुम न हूँ॥ जो प्रसारित है पृथ्वी तल में शिक्षा परम लाभ की। बोधिसत्व प्रबल निःस्वार्थ वासना इच्छा बनूँ आपकी॥ विद्या का परिमाण नाप नतीजा अंत कहाँ है शुरू? बुद्धि का ये पर्याप्तता कहीं न था कैसे समेटा गुरु? जो उत्तर हर प्रश्न का संचित है वो ज्ञान भंडार की। ये विस्तार का सार भेदन करूँ सीमा बनूँ आप की॥ सृष्टि से अभी तक अनेक गुरु के, अवतार के, संत के। खिंचा सार्थक सार दिव्य नतीजा संपूर्ण ज्ञानांत के॥ इतना शुद्ध बनूँ चलूँ वो पथ में गुरुत्व का भाव ली। इतना योग्य बनूँ अखंड चेतना प्रज्ञा बनूँ आप की॥ सौभाग्य हर व्यक्ति का पहुँच है ये ब्रम्ह प्रकाश में। सर्वव्यापक ब्रम्हवाक्य सुमधुर है गुंज आकाश में॥ फैलाऊँ अद्वितीय ज्ञान महिमा सत्संग संलाप की। वो शक्ति परिपूर्णता मधूरता वाणी बनूँ आप की॥ हर शिष्य हर प्रश्न का हल कला वात्सल्य आभास में। अस्तित्व गुरु रूप में प्रकट है हर व्यक्ति का पास में॥ व्याप्त है हर क्षेत्र में जो करुणा जिस प्रेमका राग की। वैसा प्रेम बनूँ बिखेरूँ सब में ममता बनूँ आप की॥ हर कार्य परिपूर्णता अति सरल निःस्वार्थ सेवा भरा। हर चाल में पदचाप करूँ अनुसरण चित्त सुधारूँ जरा॥ कैसे प्राप्त करूँ ये धैर्य, शीलता, वो मुक्ति संताप की। स्वच्छ गगन सा प्रशांत प्रतिरूप शांति बनूँ आप की॥ यात्रा ये गुरुलोक का सुगम हो यही मेरी कामना। इतना शक्ति मिले सुमार्ग गतिका बाधा करूँ सामना॥ आत्मदर्शन के जो माध्यम बना वो ब्रह्मका साथ की। ब्रम्हेक्षा परिपूर्ति हेतु रचना, शक्ति बनूँ आप की॥ करती हूँ विनती सदा बनी रहे दृष्टि खुला नेत्र की। ज्ञानोत्थान शुभ कार्य सारथी बनूँ मैं भी गुरुक्षेत्र की॥ मैं भी तो वही अंश हूँ सृजन की सृष्टि बनूँ सत्व की। किंतु लीन बनूँ एकत्व लय में दृष्टि बनूँ तत्व की॥
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