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ज्ञानतरंग: "कर्मचक्र"
जानकी
ज्ञानतरंग" सद्गुरूदेव श्री तरुण प्रधान जी द्वारा विभिन्न सत्संग, प्रवचन और लेखों में व्यक्त किए गए कुछ मुख्य विचारों का संकलन है। इस भाग में "कर्मचक्र" (इच्छा, कर्म, कर्ताभाव, कर्मफल, संबंध/कर्मबन्धन और निष्काम कर्म) से संबंधित कुछ ज्ञानतरंगों को प्रश्तुत किया गया है। यह श्रृखला के रुपमें इससे आगे भी क्रमश: प्रकाशित होता रहेगा। **इच्छा** १। इच्छाओं के कारण शक्ति जीव के माध्यम से प्रकट होना चाहती है। २। जीवित रहने के लिए इच्छाएँ होना जरुरी है। ३। प्रारब्ध में उतना ही मिलता है जितना हम पुरा कर पाए। ४। इच्छा मूल नाद है, शक्ति है। इच्छा होने पर ही गति होती है और अस्तित्व में कुछ प्रकट होता है। ५। चित्त इच्छा को दिशा देता है; शक्ति को चित्तद्वारा सीमित कर दिया जाता है। ६। जो है उसमें कोई इच्छा नहीं; जो है ही नहीं, वह कभी जाता भी नहीं। ७। पहला कदम लेना आवश्यक है; अस्तित्व तभी कोई फल देता है जब कोई इच्छा, कर्म या सांकेतिक प्रयास होता है। ८। साधक की इच्छा प्रबल होती है, अच्छी इच्छा पुरी होगी; क्योंकि यह ब्रम्ह की इच्छा है। साधक इच्छा अभिव्यक्ति का माध्यम है। ९। जीस को सत्य से प्रेम है उन की इच्छा जल्दी पुरी होती है; क्योंकि गुरुक्षेत्र की वृत्ति सत्य की तरफ है। १०। अधिकाशं इच्छा आरोपित होते हैं; ज्ञान प्रसार की इच्छा भी गुरुद्वारा आरोपित है। ११। जब सारे कर्म और फल प्रकट हो जाते हैं, तब कारण शरीर विलीन हो जाता है। कर्म ही वासना बनकर पुनः प्रकट होता है। १२। इच्छा भौतिक शरीर मार्फत ही प्रकट होती है और कर्म मार्फत अभिव्यक्त होती है। १३। संकल्प में नाद को बदलने की शक्ति होती है। जो नाद को बदल सकता है, वह माया में जो चाहे प्रकट कर सकता है। १४। इच्छाएँ सत्य को विकृत कर देती है। १५। इच्छा मूलभूत है, निर्दोष है, अच्छी बुरी नहीं होती; उसके पीछे क्या भावना और कर्म किया जा रहा है वह अच्छा बुरा होता है। १६। कुविचार विष के समान होता है; एक बार मन में घुल जाए तो दिन बर्बाद करता है, सबसे पहले स्वयं को हानि पहुँचाता है। १७। प्रगति होगी या पतन इच्छा निर्धारित करती है। आध्यात्मिक इच्छा प्रगति और सांसारिक इच्छा पतन की ओर ले जाती है। १८। सब की इच्छा पूर्ण होती है, लेकिन तब जब वह व्यक्ति/साधक तैयार हो जाता है। १९। इच्छाओं का नाश नहीं होता; साक्षीभाव में उनको नकारा जाता है। २०। कर्म मार्ग में सही और पुण्य कर्मद्वारा आध्यात्मिक उद्देश्य प्राप्त करना ही लक्ष्य है। २१। अत्याधिक काल्पनिक जीवन अतृप्त इच्छाओं का संकेत है। २२। अधिक सोचना समस्या नहीं, विषय समस्या है; सोचने को क्या मजबूर कर रहा है उसका मूल तक जा कर समाधान करना चाहिए। २३। योग्यता से अधिक पाने की इच्छा ही अशांति का कारण है; जरुरत में जीना चाहिए। २४। जब अनुभव इच्छा के विपरीत होता है चित्त नकारात्मक विचार, भावनाएँ, वाणी, कर्म निर्मित करता है; यही दुःख की अवस्था है। २५। इच्छाओं का जितना दमन या विरोध होता है उतना परेशान करती है। इसलिए दमन नहीं सांकेतिक पूर्ति करना उचित होता है। २६। इच्छा दु:ख का कारण नहीं है; इच्छा को मेरा मान लेना दु:ख का कारण है। २७। इच्छाओं को पूरा न करना भी कर्म है; यहाँ पर कर्म इच्छाओं का दमन है। २८। इच्छापूर्ति से आनंद नहीं मिलता; जिसके कारण बेचैनी हुई थी वह पूरा होने से जो ख़ालीपन है आनंद वही अवस्था है। **कर्म** २९। वासना>विचार>भावना>वाणी>कर्म>फल>संचय ये कर्म चक्र हैं। ३०। विश्वचित्त के हर परत में कर्म अपने आप चल रहा है। ३१। हर परत में कर्मों का अलग-अलग स्वरूप होता है। ३२। डर के कारण कर्म विकृत हो जाता है। ३३। चित्त नाद रचित है नाद चित्त निर्मित है। जिस प्रक्रिया से चित्त की रचना हुई है उसको चित्त ने ही निर्मित किया है। ३४। माया में स्थिरता संभव नहीं है। हर अनुभव ऊपर या तो नीचे की तरफ़ गति करता है। ३५। यदि जीवन के प्रक्रिया को समय से पहले काट दिया जाए जो फिर से दोहराता है; प्राकृतिक रुपसे होना सबसे अच्छा है। ३६। कर्म को रोका नहीं जा सकता, यह चित्त का नियम है। ३७। जब सही समय है; सही कार्य करना चाहिए। ३८। जो हो रहा है वह सही और सम्पूर्णता में हो रहा है यह ज्ञान ही सही ज्ञान है। ३९। प्रेम के लिए आकर्षण ज़रूरी है, उसी अनुसार चित्त की सभी परतें कार्य करते हैं; यही संपूर्णता है। ४०। चित्तवृत्ति रोकना संभव नहीं है; उसके पार जाना संभव है। ४१। चित्तवृत्ति स्वभाविक है; इसमें दखल देगें तो जीवन अस्तव्यस्त बन सकता है। ४२। कभी-कभी कुछ न करना ही सही कर्म हो जाता है। ४३। हर मामले में अलग-अलग उपाय होता है। ४४। ज्ञान में कुछ जमा नहीं होता त्याग होता है। ४५। माया का बाढ़ रोकना इस जीव के बस में नहीं है; नियंत्रण संभव है। ४६। पीड़ा नैसर्गिक है, इसका संकेत स्नायु तंत्र में चलता हैं और जीव को उचित कर्म करने के लिए प्रेरित करता है। ४७। जीव का ऊपरी परत में विकास होने से निचली परत नष्ट नहीं होती; क्योंकि वह भी आवश्यक है। ४८। मनुष्य रुप मिला है तो उसके साथ बहुत से कर्म भी मिले हैं। ४९। शरीर मेरा नहीं है यह जानने के बाद उसकी रेखदेख की जिम्मेदारी दुगुनी हो जाती है। ५०। जहाँ पर ज्ञान का अभाव है वहाँ अहिंसा भी हिंसा ही है। ५१। चाहे वह अच्छा हो या बुरा हो जो बार-बार आता रहता है, वह प्रारब्ध है। वही करने के लिए जन्म होता है। ५२। जीवंतता साक्षी के होने से है, कर्म या वृत्तिओं के कारण नहीं। ५३। कर्म पराभौतिक-परामानसिक है, जहाँ प्रकट होता है सांकेतिक कर्मद्वारा वही नष्ट किया जा सकता है। ५४। सब चीज यहीं है। जो आवश्यक है वह लेना है, जो अनावश्यक है वह छोड़ना है। ५५। सबकुछ अर्थहीन होने का अर्थ यह नहीं है कि अब उसका कोई प्रयोग नहीं किया जा सकता। ५६। मानवशरीर कारणशरीर के प्रगति का उपाय है। ५७। देवयोनि भोगयोनि है, मनुष्ययोनि कर्मयोनि है। ५८। अस्तित्व में सब अपने आप हुआ है; मनुष्य अपने उपयोगिता के अनुसार विकास, विनाश, असल, ख़राब का ठप्पा लगाता है। ५९। कर्म नैतिक/अनैतिक नहीं होते, बस होते हैं। उत्तरजीविता के लिए नैतिक/अनैतिक का रंग मनुष्यद्वारा लगगाया जाता है। ६०। सुंदरता वह अनुभव है जो आकर्षित करता है; नैतिकता वह कर्म है जो उचित लगता है; मनुष्य सुंदरता चुनता है। ६१। सुंदरता/कुरूपता चित्त निर्मित धारणाएँ है। इसलिए चित्त के कर्म उनसे प्रभावित होते हैं। ६२। अपना-अपना ज्ञान, सत्य और सुंदरता के आधार पर व्यक्ति को अपनी नैतिकता स्वयं तय करना चाहिए। ६३। नैतिक/अनैतिक व्यक्तिनिष्ठ है। व्यवहारिकता में जीवन नैतिकता/अनैतिकता पर आधारित है; अद्वैत के स्तर पर नहीं। **कर्ता भाव** ६४। कर्ता कोई नहीं, कर्म केवल होता है। ६५। कर्ता भाव भी कर्म है जो कर्म के बाद विचार के रुप में आता है। सामाजिक व्यवस्था के लिए कर्ताभाव उपयोग किया जाता है। ६६। ज्ञानी में जिस समय में जो आवश्यक है वही वृत्ति सक्रिय होती है। ६७। अहम् वृत्ति का नाश नहीं होता; यदि कोई ऐसा प्रयास करता है तो वह स्वयं का नाश होता है। ६८। सब कुछ अनित्य है, सुधार विनाश अपने आप हुआ है; जो अनुकुल है उसको सुधार जो प्रतिकुल है उसको विनाश कहते हैं। ६९। मनुष्य का कोई कर्म नहीं है, अनुभवकर्ता तो वैसे ही निष्काम है; तो कर्म किसी का नहीं। ७०। जिसमें चेतना है वह वासना के स्तर पर ही कर्म को रोक देता है। ७१। बुद्धिमान व्यक्ति विचारों के स्तर पर कर्म रोक देता है। ७२। अज्ञानी में वासना, निर्णय और कर्म करना एक साथ होता है; निर्णय पशुवत् होता है। वासना ही कर्म होता है; भावना और आवेग के गति तेज़ होती है। ७३। विश्व चित्त की अवस्था निद्रा की है, सृष्टि का स्वभाव आराम करना है; जो भी आवश्यक है वह प्राकृतिक रूप से अपने आप होता है। ७४। न कोई करनेवाला है न रोकनेवाला; जो आवश्यक है वह अपने आप होकर रहेगा। ७५। अज्ञान नाश होने के बाद न साधक बचता है न साधना; न कर्ता बचता है न कर्म। ७६। अज्ञानी झगड़ते हैं, अर्धज्ञानी वादविवाद करते हैं, ज्ञानेच्छुक प्रश्नोत्तर करते हैं और ज्ञानी मौन रहतें हैं। ७७। कर्महीन होते हुए भी व्यावहारिकता में कर्म करना है। ७८। साधक वह है जो यह जान गया है कि अब वह कर्म, कर्मफल और प्रारब्ध के परे चला गया। ७९। सामान्य व्यक्ति कर्म को संसार में प्रकट करकर भौतिक शरीर के माध्यम से कर्म करके ही समाप्त कर सकते हैं। ८०। मनुष्य में अमूर्त विचार की क्षमता होती है; यह क्षमता जो नहीं है उसको भी सत्य बना सकती है। ८१। माया का खेल कभी बंद नहीं होता, साधक को सही खेल चुनना चाहिए; प्रगति का खेल सबसे अच्छा है। ८२। जिसमें चेतना है वह व्यक्ति कर्म के प्रति जो विचार आया है उसको देखकर परिणाम आँकलन कर पाता है। ८३। जिनमें आंतरिक शांति होती है उनका कर्म तूफ़ान के तरह होतें हैं, जो भी करते हैं सफल होता है, तूफ़ान के बीच में शांति है। जो अशांत है वह कुछ कर नहीं पाता, हमेशा अन्यौल में रहता है। ८४। निर्णय लेनेवाला कोई नहीं है, अपने आप हो जाता है, बाद में बुद्धि विवेक उस निर्णय पर कुछ रंग भर देता है। ८५। संसार में रहकर भी संसारी नहीं होना ज्ञानमार्गी की ख़ासियत है। ८६। ज्ञानी कर्म योगी भी है। ८७। साधक कर्म का नियम तोड़ता नहीं है, उससे ऊपर उठ जाता है। ८८। जो शांत है वह हमेशा शांत ही रहेगा और जो अशांत है वह हमेशा अशांत ही रहेगा। ८९। कर्महीनता का अर्थ यह जानना है कि कर्ता कोई नहीं है। ज्ञान होने पर कर्ता चला जाता है और कर्म रह जाता है। ९०। सांसारिक व्यक्ति को सफलता के बाद विशाल खालीपन और अर्थहीनता मिलती है; ज्ञानाभाव में उन्ही सांसारिक वस्तुओं में खोजकर अपने आंतरिक शून्य को भरने का प्रयास करते हैं। ९१। शक्तिहीन लोग अधिक नुकसान या अच्छा नहीं करते, क्योंकि वे बाहरी परिस्थितियों की दया पर होते हैं। ९२। इस सृष्टि का प्रत्येक कण हम से जुड़ा हुआ है। उन पर प्रभाव डालने की क्षमता हम में है, कोई ग्रह नक्षत्र में नहीं। संकल्प शक्ति मनुष्य में ही होता है, उनमें नहीं; प्रभावित साधक करता है। **कर्मफल** ९३। विफलता ही सफलता की सीढ़ी बन सकती है। ९४। प्रभाव में कारण, बीज में फल, फल में बीज पहले से ही अंतर्निहित है; यह क्रम चक्र में चलता है। ९५। कर्म में फल पहले से मौजूद होता है। जो कर्म दुःख की ओर ले जाता है वह करने से पहले दुःख का भाव उत्पन्न होता है। ९६। निष्काम कर्म संभव नहीं है; क्योंकि बिना कामना कर्म ही नहीं होता, कर्म का बीज ही कामना है। निःस्वार्थ कर्म संभव है। ९७। कर्म ही रक्षा कबच है, यदि भावना, नियत और कर्म अच्छा नहीं है तो कोई भी विधि, गुरु या शक्ति रक्षा नहीं कर सकता। ९८। अंधकार में किए गए कर्म का फल उल्टा-सीधा ही आता है और ज्ञान के प्रकाश में किए गए कर्मों का फल अच्छा होता है। ९९। कर्म पर भावना का प्रभाव अधिक पड़ता है। किस भाव से कर्म किया जा रहा है उसके अनुसार कर्म फल आता है। १००। फल तो फल होता है, अच्छा बूरा नहीं होता; जैसा बोया है वैसा मिलता है। १०१। यांत्रिक कर्म और निश्वार्थ कर्म का फल नहीं मिलता; जिस कर्म में स्वार्थ और भावना होती है उसका फल आता है। १०२। जैसे नदी पर्वतों से निकलकर सागर में पहुँचती है; वैसे ही जीव का विकास अपने आप देवयोनि के तरफ़ जाता है। १०३। कर्म के प्रक्रिया हटाते हटाते कर्म, कर्मफल और शुद्ध चित्तवृत्ति बचती है; यहाँ कर्म त्याग है, जीव विलीन होता है। १०४। श्रेष्ठ कर्म कोई नहीं है, जो आवश्यक है वह अपने आप होगा। जो पसंद हो वही अच्छा है। १०५। अच्छा कर्म किया नहीं जा सकता, क्योंकि अच्छा कर्म क्या है यह पता नहीं; केवल बुरा कर्म रोका जा सकता है। १०६। जो कर्म हमारी प्राकृतिक बुद्धि के अनुसार ठीक नहीं है, बुरा है वह रोक देना ही नियंत्रण है। १०७। अस्तित्व में पूर्णता है, कुछ अनावश्यक नहीं यह ऊपरी ज्ञान है। माया में आवश्यक/अनावश्यक भेद ज़रूरी है। १०८। साक्षीभाव कर्ताभाव के ऊपर है; साक्षीभाव में अनावश्यक कर्म अपने आप छुटता है। **संबंध/कर्मबंधन और निष्काम कर्म** १०९। सेवा का वदला सेवा से चुकाया जा सकता है। ११०। जो भी आवश्यक है साक्षीभाव में करके कोई भी कार्य मेरा नहीं यह जानने से ही कर्म से मुक्ति संभव है। १११। साधक का लक्ष्य केवल आत्मनिर्भरता नहीं; सभी बंधनों से मुक्ति है। ११२। जैसे पानी में लकीरें नहीं खींचीं जाती वैसे ज्ञानी के कर्म का कर्मबंधन नहीं बनता; क्योंकि उसके सभी कर्म साक्षीभाव में होते हैं। ११३। कर्म मिथ्या है, क्योंकि करनेवाला कोई नहीं है। ११४। अहम को समझते ही कर्म समाप्त होते हैं। ११५। विश्वचित्त में चल रहे हर प्रक्रिया कर्म है, प्रक्रिया नाद में चलता है और नाद ही प्रकट अस्तित्व का मूल है तो कर्म से मुक्ति संभव नहीं है। ११६। अहंकार भी देवी की ही रचना है। ज्ञान, इच्छापूर्ति, कर्मबंधन से मुक्ति के लिए यह ज़रूरी है। ११७। दूसरों पर निर्भरता जो उनकी उपलब्धियों पर हावी रहती है, पीड़ा का स्रोत है। वे केवल दूसरों का उपयोग कर सकते हैं, पा नहीं सकते। ११८। संबंध हमें सुख देने के लिए नहीं; न भोग के लिए है, न ज़िम्मेदारी है, यह सीखने के अवसर है। ११९। दूसरों का व्यवहार मेरे नियंत्रण में नहीं, मैं अपना व्यवहार अच्छा कर सकता हूँ। १२०। दूसरों को वही सुधार सकता है जो ख़ुद सुधरा है; इसलिए पहले स्वयं की प्रगति होनी ज़रूरी है। १२१। कोई मुझे परेशान कर पा रहा है तो मेरी ही गलती है, क्योंकि काँटे का स्वभाव है चुभना, सांप का स्वभाव है काटना। १२२। संबंध जो सुखपूर्वक हैं वे निचली वृत्तियों के कारण से हैं। जैसे ऊपरी वृत्तियाँ शक्तिशाली होती है वैसे संबंध टूटने लगता है। १२३। संबंधों में दाँतों और जिह्वा की तरह रहना है। सबकुछ मैं हूँ लेकिन सभी अंग अपने अपने स्थान पर रहना चाहिए। १२४। क्षमाभाव और क्षमादान में भिन्नता है। केवल क्षमादान ही करने से स्वयं में सुधार नहीं होता। १२५। अच्छा या बुरा जो भी होता है वह मेरे ही कर्म का फल है, यह सोचकर स्वयं को सुधारना क्षमाभाव है। १२६। ज्ञान के बाद संघर्ष समाप्त होता है। प्रश्नोत्तर समाप्त होते हैं, प्रश्न आते हैं तो उत्तर के साथ आते हैं; यह समर्पण की अवस्था है। १२७। समर्पण किया नहीं जाता, हो जाता है। १२८। समर्पण का अर्थ क्रियाहीनता या हार मानना नहीं है; क्रियाशीलता, स्वीकारभाव, गलती सुधारना और आगे बढना है। १२९। लेनदेन में भावना का महत्व है कि किस भाव से लिया है। बाध्यता बस लेना भी पड़े तो मन में उसको लेकर घर न बनाने दें कि मैंने किसी से कुछ लिया; दुगुना चुका दें। १३०। मनोशरीर में चल रहे वृत्तियों की स्थिति जानना आत्ममूल्याँकन है; यह प्रगति का माप है। १३१। चेतना का अर्थ कर्महीनता नहीं प्रकाशित कर्म है। प्रकाशित होने के कारण अशुद्धियाँ दिख जाएँगे और कर्मशुद्धि होता है। १३२। चेतना अकेली नहीं चलती, बाक़ी वृत्तियों के साथ जुड़ जाती है। सभी परत समानांतर रूप में कार्य करते हैं। १३३। चित्त में कोई भी वृत्ति बेकार नहीं है। हर वृत्ति का अपना महत्व और कार्य हैं; बस संतुलन और चेतना में चलना चाहिए। १३४। चेतना पहरेदार की कार्य करती है। चेतना के प्रकाश में व्यक्ति जो चाहेगा और जो करेगा वह शुद्ध होता है। १३५। अचेतन में कर्म अंधकार में होते हैं। सारी अशुद्धियां व्यक्ति में आ जाती है। १३६। जो हो रहा है वह कष्टदायी नहीं है तो होता रहे; उपयोगी है तो उपयोग करना है, कष्टकर है तो छोडना है; साक्षी बनकर देखना है। १३७। जो अनियंत्रित और अनावश्यक था वह चेतना के प्रकाश में नष्ट हो जाता है; शुद्धिकरण जीवन भर चलेगा। १३८। जो पूर्वनिर्धारित है वह पूर्वनिर्धारित ही है; नहीं बदलता। जो बदलता हुआ प्रतीत होता है वह माया के स्तर पर है। १३९। जब तक जीवन है नीचली परतें रुककर ऊपरी परतें ही चलना संभव नहीं है; सभी परत समानांतर रूप में कार्य करते हैं। १४०। जब चेतना का स्तर बढ़ जाता है, संचित ऊर्जा को सही दिशा देना और नया लक्ष्य निर्धारण करना आवश्यक है। १४१। यदि अभी के कर्म ठीक हो गए, नियंत्रित हो गए तो आनेवाला संस्कार अच्छा बनेगा, विकासक्रम तेज हो जाएगा; क्योंकि पूराने में अब हमारा हात नहीं लेकिन नया में तो है। १४२। स्थितियों को बदलने से अच्छा है स्वयं को बदलना। १४३। स्वयं को बदलना प्रगति है दूसरों को बदलने का प्रयास करना दुर्गति है। १४४। समाज पर दया, करुणा रखने का अर्थ वहाँ पडे रहना नहीं। साधक को समाज में एक पैर रखना है और यथाशिघ्र कर्मबंधन पूरा करके वहाँ से चले जाना है। क्रमश:
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