Wise Words
Home
Read
Write
Publish
Profile
Logout
मुक्ति मेरा मूल स्वभाव
स्वप्रकाश
***मुझ अज्ञानी जीव ने, करी माया से आसक्ति। गुरु ने ज्ञानप्रकाश से, सहज ही दे दी मुक्ति।।* **स्वभाव क्या है?** जब हम स्वाभाव की बात करते हैं तो इसे स्व-भाव में विभाजित कर सकते है। स्व अर्थात आत्मा (तत्व) और भाव अर्थात स्वरुप। आपकी आत्मा का स्वरुप क्या है? हम इसकी शुरुआत प्रकृति से कर सकते है। मुक्ति प्रकृति का मूल स्वरुप है। मूल रूप से मुक्ति, स्वतंत्रता ही आत्मा का मूल स्वरुप है जैसे हम अपने आस-पास की प्रकृति को देखें तो प्रकृति मूल रूप से मुक्त है। पञ्च महाभूतों को देखे तो जैसे आकाश (अनंत है, असीम है) अतः मुक्त है, वायु: सदा बहती रहती है उसका स्वभाव भी मुक्त है, अग्नि भी मुक्त है क्योंकि वह बंद करने पर बुझ जाती है अग्नि सदा खुले में जलती है उसे जलने के लिये वायु की आवश्यकता है। जल भी मुक्त है तभी वह बहता रहता है और तभी वह प्यास बुझाता है। बर्फ से कभी प्यास नहीं बुझती है और जल यदि अपने स्वाभाव के विरुद्ध यदि रुक जाये, तो सड़ने लगता है जैसे तालाब का पानी रुका हुआ होता है तो उसमें दुर्गन्ध आने लगती है, जबकि नदी एवं समुद्र का पानी बहता रहता है। इसलिये स्वच्छ होता है। प्रथ्वी तत्व भी प्रगतिशील है, गतिमान है निरंतर एक रूप से दूसरे रूप में परिवर्तित होता रहता है अर्थात मुक्त है। सूर्य भी मुक्त है निरंतर सभी जीव जंतुओं एवं ग्रहों/लोकों को सामान रूप से प्रकाशित करता है किसी से भेदभाव नहीं करता। पेड़-पौधे भी मुक्त हैं, क्योंकि वे अपने फल-फूल स्वयं उपयोंग नहीं करते सभी को सामान रूप से प्रदान करते हैं। **जो मुक्त है वही सच्चा दाता है** एक बंधक, एक सीमित स्वार्थी व्यक्ति कभी भी पूर्ण रूप से दाता नहीं हो सकता। जो मुक्त है वही असली दाता है, क्योंकि वह निस्वार्थ भाव से दान करता है। जो मुक्त है वह भेद नहीं कर सकता और जो भेद नहीं कर सकता अर्थात उसके लिये सभी एक हैं इसलिये एक मुक्त व्यक्ति/जीव ही असली दाता होता है। आज के समय में जो भी दान करते हैं वे किसी न किसी स्वार्थ की वजह से दान करते हैं। स्वयं को धार्मिक कहने वाला व्यक्ति नरक के भय एवं स्वर्ग को पाने के लोभ में दान करता है अन्यथा दान की एवज में और कुछ विषय-वस्तु की लालसा रखता है, जैसे कोई वैभव, नाम, प्रसिद्धि एवं सम्मान पाने की लालसा में दान करता है। आजकल बड़े-बड़े व्यवसायी, व्यापारी अपने उत्पाद, कंपनी के प्रचार-प्रसार एवं वैभव के लिये दान करते हैं ऐसा आप सभी ने बड़े बड़े मेलों, प्रदर्शिनियों जैसे कुम्भ मेला आदि में बड़े स्तर पर देखा होगा। ये कम्पनियाँ अपने लाभ हेतु, दान करती हैं। उनके हर दान पर उनके ब्रांड का नाम होता है। इस प्रकार का दान, दान नहीं है यह केवल प्रचार मात्र है, जिस प्रकार वे पैसे खर्च करके इन्टरनेट, समाचार पत्रों, टीवी आदि में प्रचार करते है। यहाँ फर्क केवल इतना है की पैसा विज्ञापन करने वाली कंपनी को देने की बजाय दान के रूप में आम जनता को दे दिया जाता है अन्यथा मूल भावना दोनों स्थान पर एक ही है कोई भी कंपनी गुप्त दान नहीं करती है। एक आत्मज्ञानी ही असकी दाता हो सकता है जैसे एक सद्गुरु जो कि निस्वार्थ भाव से सभी को ज्ञान दान करता है वही सच्चा दानी है। भौतिक विषय-वस्तु का दान एवं ज्ञान दान दोनों में ज्ञान दान सर्वथा श्रेष्ठ एवं उत्तम है, क्योंकि किसी विषय-वस्तु का दान एक सीमा तक ही किया जा सकता है क्योंकि विषय-वस्तु का दान सीमित होता है और विषय-वस्तु का दान देने पर ग्राही व्यक्ति/याचक आश्रित भी हो सकता है। इस प्रकार विषय-वस्तु का दान बंधनों में बांध सकता है। जबकि ज्ञान अपने आप में असीमित दान है क्योंकि ज्ञान बाँटने पर वह बढ़ता है तथा जो ज्ञान लेता है वह आत्म निर्भर हो जाता है इसलिये ज्ञानदान सर्वोपरि है। यदि आप किसी भिखारी को प्रतिदिन दान देते हैं तो वह आप पर आश्रित हो जाता है और बंध जाता है। **आत्मज्ञान मुक्ति दिलाता है** आत्मज्ञान के पश्चात साधक जितना आवश्यक को उतना ही विषय-वस्तुओं को संग्रह करता है और उससे अधिक नहीं क्योंकि आवश्यकता से अधिक विषय-वस्तु बंधनों का कारण बनती है। इस प्रकार साधक मुक्तता की ओर बढ़ता है। आत्मज्ञान के पश्चात साधक यह जान जाता है कि वह तो पहले से ही मुक्त है। इसलिये वह अनावश्यक संग्रह नहीं करता है. और जो भी विषय-वस्तु आवश्यक है उससे निर्लिप्त हुए उसका उपयोग कर लेता है। **मुक्त करने वाले कर्म चुनें** सात्विक कर्म जैसे आत्मज्ञान, बोधिसत्व, अहिंसा, करुणा, प्रेम, क्षमा, दया, दान, ज्ञान-प्रसार, सम्मान, सत्यभाषी, सत्यनिष्ठ, स्वाबलंबी आदि कर्म हमें मुक्त करते हैं क्योंकि इनसे असली आनंद प्राप्त होता है। जबकि तामसिक कर्म जैसे संग्रह, लोभ, इर्ष्या, घृणा, हिंसा, चोरी, मोह, झूट, अपमान, छल-कपट आदि वृत्तियाँ एवं कर्म हमें बंधनों में बाँधते हैं। आत्मज्ञान के पश्चात सात्विक कर्म स्वतः होने लगते है. क्योंकि स्वयं के सत्य स्वरुप अर्थात मुक्ति का ज्ञान हो जाता है। प्रकृति में भी हर जीव जंतु मुक्त ही रहना चाहता है, सभी जीव जंतु स्वच्छन्द विचरण करना चाहते है। कोई भी पिंजरों में कैद होकर नहीं रहना चाहता. बंधनों में जीव का विकास नहीं होता जैसे एक पौधा जमीन में जैसी वृद्धि करता है वैसा वह एक छोटे से गमले में नहीं कर सकता है। मनुष्य भी बंधनों में नहीं रहना चाहता है। यदि हमें सोने के घरों में भी कैद कर दिया जाय तो भी हम वह कैद पसंद नहीं करते ऐसा हम सभी ने कोविड महामारी के समय लॉकडाउन अनुभव किया था। बंधनों के कारण व्यक्ति में मानसिक विकार पैदा हो जाते है। ऐसा अक्सर शादी के बाद ज्यादातर गृहिणियों में पारिवारिक बंधनों, रीती-रिवाजों, घरेलु हिंसा के कारण मानसिक विकार पैदा हो जाते है। परिवार रूपी बंधन भी व्यक्ति असुरक्षा के भय से निर्मित करता है, क्योंकि वह स्वयं को सीमित एवं अपूर्ण मानता है और उस अपूर्णता को भरने के लिये, दूसरे व्यक्तियों एवं बाहरी सीमित विषय-वस्तुओं से बंधन जोड़ता है। क्योंकि विषय-वस्तु एवं व्यक्ति स्वयं सीमित हैं तो वह दूसरे सीमित व्यक्ति के खालीपन को नहीं भर सकते हैं । जीव/ मनोशरीर यंत्र जो कि स्वयं को एक व्यक्ति मानता है उसकी इच्छाएँ, लालसाएं कभी समाप्त नहीं होती हैं। एक अज्ञानी व्यक्ति स्वयं नहीं जानता की उसका मूल स्वरुप पहले से ही असीमित है, मुक्त है और जगत की सीमित विषय-वस्तु असीमित को कभी भी तृप्त नहीं कर सकती है। इसलिये अपने सत्य-स्वरुप मूल स्वरुप को जानें और आत्मज्ञान प्राप्त करें। **क्या दान करें?** सूर्य कभी अपना प्रकाश स्वयं के लिये नहीं रखता, वायु सदा दूसरों के लिये बहती है, जल सदा दूसरों की प्यास बुझाता है, अग्नि सदा दूसरों को ऊष्मा प्रदान करती है, प्रथ्वी सदा ही सभी जीव जंतुओं को पोषण प्रदान करती है वह किसी के साथ भेदभाव नहीं करती है। इस प्रकार सम्पूर्ण प्रकृति देने का कार्य कर रही है इसलिये मुक्त है। अतः आप भी अपने मूल स्वरुप को जानें और दान करें। **चित्र १: विभिन्न प्रकार के दान ** <br><br><div class='ui image'><img width='1200px' src='images/69840537-दान.jpg'></div><br><br> यहाँ पर उपरोक्त चित्र में जितने भी प्रकार के दान बताए गए हैं उनमें से अधिकतर दान निशुल्क ही हैं जिनको देने के लिये किसी धन की आवश्यकता नही है। सबसे कम प्रकार के दान विषय-वस्तु का दान हैं जिनके लिये धन की आवश्यकता होती है। अत: कोई यह नहीं कह सकता कि मेरे पास किसी को दान करने के लिये कुछ भी नहीं है। इसलिये अपनी योग्यता अनुसार अधिक से अधिक निस्वार्थ भाव से दान करें बिना किसी वस्तु, पद, धन, शक्ति एवं वैभव की लालसा के। क्योंकि संग्रहण सीमित करता, संकुचित करता है और दान असीमित एवं विस्तारित करता है। **सारांश** आत्मज्ञान के बिना व्यक्ति अपने सत्य स्वरुप को नहीं पहचान सकता है। एक अज्ञानी व्यक्ति जो भी कर्म करता है सभी कर्म स्वार्थ पूर्ण होते हैं। और जो दान भी करता है उसके पीछे भी स्वार्थ भावना होती है। इसलिये आत्मज्ञान प्राप्त करने के लिये गुरु की शरण में जाएँ और स्वयं के सत्य स्वरुप (मुक्ति) को जानें और सीमित से असीमित हो जाएँ, मुक्त हो जाएँ। <font color="green">**सभी सुखी हैं , सभी समृद्ध हैं, सभी ज्ञानवान हैं , सभी मुक्त हैं........**</font> <font color="blue">**श्री गुरवे नमः ....ॐ शांति शांति शांति .....**</font> <font color="blue">**आभार: मैं परम श्रद्धेय गुरुदेव श्री तरुण प्रधान जी एवं गुरुक्षेत्र का उनकी शिक्षाओं एवं मार्गदर्शन के लिए आभारी हूँ।**</font> संपर्क सूत्र.. साधक की कलम से : स्वप्रकाश....... ईमेल: swaprakash.gyan@gmail.com
Share This Article
Like This Article
© Gyanmarg 2024
V 1.2
Privacy Policy
Cookie Policy
Disclaimer
Terms & Conditions