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ज्ञानतरंग: "अस्तित्व/अनुभवक्रिया/अद्वैत/एकता"
जानकी
**अस्तित्व/अनुभवक्रिया/अद्वैत/एकता** प्रश्तुत लेख सद्गुरूदेव श्री तरुण प्रधान जी द्वारा विभिन्न सत्संग, प्रवचन और लेखों में "अस्तित्व/अनुभवक्रिया/अद्वैत/एकता" के विषय में व्यक्त कुछ मुख्य बिंदुओं का संकलन है। यह लेख श्रृखला के रुपमें इससे आगे भी क्रमश: प्रकाशित होता रहेगा। <br><br><div class='ui image'><img width='1200px' src='images/89426796-istockphoto-2165362468-1024x1024.jpg'></div><br><br> १। अनुभव और अनुभवकर्ता की एकता का प्रकट रुप यानि दोनों का विलय ही अनुभवक्रिया है। २। अस्तित्व जो भी है हरक्षण अनुभवक्रिया की स्थिति में है; इसके अलावा और कुछ होने की संभावना नहीं है। ३। अनुभवक्रिया का तत्व मौन है। ४। अनुभवक्रिया में आ जाना सरल है बताना कठीन है। ५। अनुभवक्रिया में गतिशीलता प्रतीत होता है, जीवंतता है इसलिए इसको अनुभवक्रिया कहा गया है। ६। अस्तित्व की स्थिति हमेशा अनुभवक्रिया में है। ७। भले ही कोई नामरूप दिख रहा हो अभी भी अनुभवक्रिया ही है। ८। अनुभवक्रिया का अर्थ यह नहीं की वहाँ कोई कार्य हो रहा है; जब सारे प्रक्रिया से ध्यान हटता है और "जो भी है वह अस्तित्व स्वयं है"- यह ज्ञान के साथ उस अवस्था में जो भी बचता है वही अनुभवक्रिया है। ९।अनुभवक्रिया में कोई ज्ञान नहीं होता, "अनुभवक्रिया है" इतना ज्ञान संभव है लेकिन वो क्या है यह जाना नहीं जा सकता। १०। अनुभवक्रिया में सोचने का या जानने का कुछ नहीं; केवल होने का है। ११। अनुभवक्रिया में ज्ञान और चित्तवृत्ति भी प्रतीति ही लगती है; भ्रम सा लगता है। १३। अनुभवक्रिया में कोई अवस्था या ज्ञान की चिंता नहीं होती, उस अवस्था ज्ञान के लिए नहीं; होने के लिए है। १४। कोई रुप दिखना/ना दिखना या उसके बारे में विचार आना भी अनुभवक्रिया के पृष्ठभूमि में हो रहा है। १५। एकता का ज्ञान होते ही द्वैत समाप्त हो जाता है। १६। एकता की स्थिति दिव्य प्रेम की स्थिति है। १७। अज्ञेयता एकता की स्थिति है। १८। एकता को जाना नहीं जा सकता लेकिन एकता तक पहुँचा जा सकता है; उसके बाद जानने को कुछ नहीं बचता। १९। एकता का अनुभव नहीं होता, एकता में अनुभव और अनुभवकर्ता विलीन हो जाते हैं। २०। अनुभवहीनता संभव नहीं, अनुभव और अनुभवकर्ता अकेले कभी नहीं मिलते। २१। अस्तित्व में अनुभव और अनुभवकर्ता ही है जो अमर है। २२। जो पहले से है वह बनने में न प्रयास लगता है न समय। २३। सरलता में जो शक्ति है वह किसी में नहीं, क्योंकि अस्तित्व सरल है। २४। सभी नादों का जोड़ ब्रम्हनाद है जहाँ संभावनाएं एक साथ प्रकट है। २५। अस्तित्व लक्ष्यहीन है, उद्देश्यहीन है, स्वतन्त्र है; यदि अस्तित्व में लक्ष्य-उद्देश्य आरोपित कर भी दिया जाए तो सीमित हो जाएगा; संभावना अनंत है इसलिए लक्ष्य भी अनंत हो गए, अनंत लक्ष्य अर्थहीन होता है। २६। अस्तित्व में न कुछ नियमित है न कुछ अनियमित; यहाँ कुछ भी संभव है। २७। संभावना कोई चीज या गुण नहीं है; नाम मात्र है। २८। संभावना या शून्यता का अर्थ कुछ न होना नहीं है; यहाँ कुछ भी प्रकट हो सकता है। २९। शून्यता में ही अनंत संभावना होती और वही जितने चाहे मिथ्या रूपों में प्रकट होता रहता है। ३०। शून्य ही अनंत है; शून्य ही संभावना है; अस्तित्व संभावना का सागर है। ३१। संभावना मिथ्या नहीं अस्तित्व स्वयं है; मिथ्या शब्द द्वैत के स्तर पर प्रयोग किया जाता है। ३२। संभावना अनुभव में परिवर्तित नहीं होती; संभावना ही रह जाती है, यदि संभावना परिवर्तन हो गयी तो वह भी अनुभव ही हो जाएगी। ३३। अस्तित्व का तत्व शून्य है, माया का आधार शून्यता है लेकिन वह शून्यता अस्तित्वहीनता नहीं है। ३४। शून्यता में जो भी प्रकट होता है वह अनंत हो सकता है। ३५। शून्यता का अर्थ कुछ न होना नहीं है, अस्तित्व सब कुछ होते हुए भी शून्य है; क्योंकि इसका तत्व शून्य है। ३६। शून्यता भी शून्य है। ३७। अस्तित्व पहले से शून्य है ३८। शून्य का अर्थ कोई पदार्थ, धरातल या ऐसा कुछ न होना जो इंद्रियों और बुद्धि से दिख जाए; निर्गुण होना, ख़ाली होना है जहाँ जानने का नहीं होने का है। ३९। जीवन, ज्ञान-अज्ञान सभी मिथ्या है; शून्यता से शुरू होता है बीच में अज्ञान आकार चला जाता है; फिर शून्यता ही बचती है। ४०। रचना ही रचयिता है, रचयिता ही रचना है। ४१। कुछ होने के लिए स्थान, समय और परिवर्तन चाहिए और यह तीनो मिथ्या है; इसलिए अस्तित्व शून्य है। ४२। अस्तित्व स्वयं शून्य है; अस्तित्व का रुप आभासिक है जो शून्य में प्रतीत होता है। ४३। शून्य कुछ बन नहीं सकता इसलिए अनुभव भी शून्य है। ४४। जो अप्रकट है वह तो शून्य है ही; जो प्रकट है वह भी परिवर्तनशील होने के कारण तत्व रुपमें शून्य है। ४५। अस्तित्व में कुछ पहले से बना बनाया नहीं है इसलिए कुछ न कुछ प्रकट होता रहता है; यदि शून्य न होकर कुछ और होता तो केवल वही होता; इस तरह से कुछ प्रकट भी नहीं होता। ४६। जहाँ ज्ञान है वहाँ चित्तवृत्ति होते हुए भी शून्यता है; यदि ये आनंद प्रकट रुप में आता है तो यही समाधि है। ४७। जब तत्व खोजने जाते हैं तो कुछ नहीं मिलता; फिर भी वो है इसीको शून्यता या निर्गुणता कहते हैं। ४८। शून्य होने के लिए केवल अज्ञान हटाना जरुरी है; बांकी सब पहले से शून्य है। ४९। ब्रह्म शांत, निर्गुण और शून्य है, स्मृति आते ही विकृति आति है और उस विकृति कहती है कि मैं ब्रह्म हूँ ; ब्रम्ह तो हमेशा मौन है। ५०। "मैं" का अंत होना शून्य होना है। ५१। सभी अनुभव मैं ही हूँ, मुझे मेरा ही अनुभव होता है। ५२। "जो प्रकट है वह सच में मैं ही हूँ" ऐसा कह नहीं सकते, मिथ्या रूप में प्रकट हूँ इतना ही कहा जा सकता है; क्योंकि संपूर्णता शून्य है, निर्गुण है इसलिए आभास ही हो सकता है। ५३। अद्वैत में केवल शून्यता है, होना मात्र है। ५४। किसी भी वृत्ति को चलाकर या रोककर अद्वैत की अवस्था नहीं आएगी, यह पहले से है, उसी की पृष्ठभूमि में सारी वृत्तियाँ चलते हैं; मनुष्य नाम की घटना अनुभवक्रिया के पृष्ठभूमि में पहले से है। ५५। द्वैत के स्तर पर दृश्य द्रष्टा नहीं हो सकता; अद्वैत के स्तर पर मैं ही अपने मिथ्या रूप में स्वयं के सामने प्रकट हूँ। ५६। अद्वैत में "मैं" कहने वाला कोई नहीं है। ५७। जहाँ गिनती संभव नहीं उसको एक भी नहीं कहा जा सकता; ब्रम्ह में अनुभव भी है अनुभवकर्ता भी है; एक का अनुभव नहीं होगा, इसलिए अद्वैत सही शब्द है। ५८। शिव और शक्ति के मिलन के बाद ही अद्वैत शुरू होता है। ५९। दो होने का मान्यता हट जाना अद्वैत है। ६०। भले ही अद्वैत द्वैत रुप में ही दिखेगा उसका ज्ञान द्वैत में ही होगा लेकिन सत्य यह है की द्वैत नहीं है। ६१। स्वप्न और स्वप्नद्रष्टा एक ही है। ६२। जिस दिन समझ में आता है कि सारा स्वप्न है और मैं स्वप्न द्रष्टा हूँ तो कुछ शुरु या बंद करना नहीं है; सब पूर्ण है। ६३। ब्रम्ह की अवस्था समाधि की है; जो अभी और यहीं है। ६४। ब्रम्ह हुआ जा सकता है; जाना नहीं जा सकता। ६५। स्वयं को मनुष्य कहना या ब्रम्ह से अलग मानना अहंकार है। ६६। अस्तित्व में सब कुछ सही, पूर्ण और सुंदर है, व्यक्ति का सोच और दृष्टिकोण ग़लत है। ६७। अस्तित्व का स्वभाव न होना है। ६८। अनुभव और अनुभवकर्ता में कोई दुरी नहीं है। ६९। होना मात्र तभी कहा जाएगा जब बुद्धि, तर्क, अनुभव आदि का कोई भूमिका नहीं रहता; जानने का कुछ नहीं बचता। ७०। अनुभव और अनुभवकर्ता दोनों एक ही है; चित्त भेद करता है। ७१। अस्तित्व को द्वैत में ही जाना जाता है, विभाजन से ही ज्ञान होता है। ७२। विभाजन वृत्ति रुकना ही अनुभवक्रिया है; जिसमें कोई भेद नहीं है; यही सहज समाधि है। ७३। अनुभवक्रिया वह है जब चित्त के विभाजन वृत्ति शांत हो जाती है या यह वृत्ति को समझ ली जाती है कि एक ही है। ७४। अस्तित्व एक ही है; विभाजन अस्तित्व में नहीं है, विभिन्नता भ्रम है, चित्त निर्मित है। ७५। अस्तित्व को बाँट देने से जानना सरल हो जाता है, बुद्धि में एक शक्ति हैं की जब वह बाँटकर विश्लेषण करती है तो सही ज्ञान होता है, यह बँटवारा केवल सुविधा के लिए है; अनुभव और अनुभवकर्ता के अलग-अलग होना असंभव है। ७६। अनुभवक्रिया में भेद देखना आवश्यक नहीं है। ७७। अस्तित्व स्वतः प्रमाणित है, स्वतः प्रमाणित का अर्थ न उसको व्याख्या की ज़रूरत है न उसका खण्डन ही किया जा सकता है, खण्डन भी करें तो वह करनेवाला और वह खण्डन का वाक्य कहाँ से आया? वह तो अस्तित्व से ही आया है। ७८। जो मूलभूत है, उसका प्रमाण स्वयं है, स्वयं सिद्ध है; अनुभव और अनुमान के द्वारा सिद्ध नहीं होता। ७९। अनुभव के कारण ही अस्तित्व का ज्ञान संभव है, अनुभव हो रहा है तो "अस्तित्व है" यह जाना जाता है। ८०। अस्तित्व में स्वयं को जानने की क्षमता है; यही अनुभवकर्ता है। ८१। असीमित अस्तित्व बुद्धि के सीमा से उपर है, बुद्धि केवल एक सीमा के अंदर वही-वही चक्र में चलती है। ८२। अस्तित्व अज्ञेय है; कभी नहीं जाना जा सकता, क्योंकि वहाँ जानने का कुछ नहीं है केवल होने का है। ८३। जो देख रहा है वही दिख रहा है। ८४। अस्तित्व का अभाव नहीं हो सकता, अभाव भी अस्तित्व में ही है। ८५। सहज समाधि की अवस्था ही नित्य है, अन्य अवस्था इसी पृष्ठभूमि में आते-जाते हैं; समाधि आता-जाता नहीं। ८६। जहाँ कुछ जोडा या घटाया जा सके वह पूर्ण नहीं हो सकता; इसलिए शून्य ही पूर्ण है। ८७। अस्तित्व में न कुछ सही है न गलत; जो है पूर्ण और सुंदर है। ८८। जो जैसा है वैसा हो जाना ही संपूर्णता में विलीन हो जाना है। ८९। मिथ्या अनुभव हो सकता है लेकिन सत्य अनुभव नहीं हो सकता। ९०। जो अस्तित्व स्वयं है वही अनुभवकर्ता है। ९१। अनुभवकर्ता और अनुभव एक ही हैं और एक साथ होगें। ९२। जहाँ पहले से एक हो वहाँ फिर से एकाकार नहीं हुआ जा सकता। ९३। मूल में कोई शुरूआत और समाप्ति नहीं होती। ९४। अस्तित्व अकारण है। ९५। यदि दो होते तो एक का कारण दूसरा होता, कारण पहले और प्रभाव बाद में आता; लेकिन ऐसा नहीं; दोनों एक साथ है। ९६। जो मूलभूत है उस पर कारण-प्रभाव की धारणा लागू नहीं होती; क्योंकि उसका कारण-प्रभाव वह स्वयं ही आ जाता है। ९७। अस्तित्व पर कारण-प्रभाव का धारणा लगाना ग़लत है। ९८। सभी का तत्व एक ही है; सभी घड़े में एक ही आकाश है; विभिन्न घड़ों में आकाश (ख़ाली स्थान) होने से आकाश खंडित नहीं होता, अखंड है। ९९। तत्व एक ही है और वही एक तत्व में अनेक नाम-रूप प्रकट हो सकते हैं। १००। एक को जाना नहीं जा सकता हुआ जा सकता है; क्योंकि जानने के लिए जानने वाला और जानने का वस्तु होना चाहिए। क्रमशः
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