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आवश्यक और अनावश्यक की अवधारणा
Himanshu Nautiyal
**ज्ञान मार्ग में आवश्यक और अनावश्यक की अवधारणा** ज्ञान मार्ग कार्यक्रम के अंत में, जब शिष्य गुरु से पूछता है"अब क्या करूँ?"तो गुरु सामान्यतः उत्तर देते हैं: "अब अनावश्यक का त्याग करो और आवश्यक को अपनाओ।" यह उत्तर प्रथम दृष्टि में विरोधाभासी प्रतीत हो सकता है, क्योंकि अद्वैत वेदांत में यह कहा जाता है कि सब कुछ मिथ्या है और केवल ब्रह्म ही सत्य है। तब प्रश्न उठता है कि जब सब कुछ मिथ्या है, तो आवश्यक और अनावश्यक का क्या अर्थ रह जाता है? **अनावश्यक क्या है?** अद्वैत वेदांत के अनुसार, अनावश्यक वह है जो हमें सत्य, अर्थात ब्रह्म, के साक्षात्कार से दूर रखता है। यह माया का ही एक रूप है, जो जीव को संसार में भ्रमित रखती है। **शास्त्रीय प्रमाण:** "ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या" (विवेकचूड़ामणि) ब्रह्म ही सत्य है, और जगत मात्र एक आभास है। "नेति नेति" (बृहदारण्यक उपनिषद) जो कुछ भी परिवर्तनशील और सीमित है, वह ब्रह्म नहीं है। भगवद्गीता "नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः" असत् की सत्ता नहीं होती, और सत् कभी नष्ट नहीं होता। **अनावश्यक क्या हैं?** अविद्या (अज्ञान) ब्रह्म को न जानना ही सबसे अनावश्यक है। स्वयं को कर्ता मानना - भगवत गीता कहती है "अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते।" अर्थात जो अहंकार के कारण अज्ञान से आच्छादित (मूढ़) हो गया है, वह सोचता है कि "मैं ही सब कार्यों का कर्ता हूँ।" इच्छाएँ और आसक्तियाँ - ये व्यक्ति को संसार में उलझाए रखती हैं। कर्म बंधन - जब तक व्यक्ति स्वयं को कर्मों का भोगता और कर्ता मानता है, वह बंधा रहता है। संसारिक सुख-दुख में फँसना - जो सत्य से दूर करता है, वह व्यर्थ है। **जब अनावश्यक है, तो हो कैसे रहा है?** यह प्रश्न अद्वैत वेदांत के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है। यदि संसार मिथ्या है, तो फिर यह अनुभव में कैसे आता है? शास्त्र प्रमाण: "अध्यासोऽयं निरूपितः" (ब्रह्मसूत्र शंकर भाष्य) जगत केवल अज्ञानवश ब्रह्म पर आरोपित है, आदि शंकराचार्य के "अध्यास भाष्य" में अध्यास को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया है। वे बताते हैं कि अविद्या (अज्ञान) के कारण, आत्मा (निर्विकारी ब्रह्म) और शरीर (अनात्मा) के बीच अध्यास (गलत पहचान) हो जाती है। "मृत्तिकेत्येव सत्यम्" (छांदोग्य उपनिषद) जैसे मिट्टी के बने पात्रों में अलग-अलग नाम-रूप हैं, लेकिन अंततः सब मिट्टी ही है। जिस प्रकार घड़ा, कटोरी, मूर्ति आदि मिट्टी से बने हैं और वे मिट्टी के बिना अस्तित्व में नहीं आ सकते, उसी प्रकार यह पूरा जगत ब्रह्म से उत्पन्न हुआ है, उसी में स्थित है, और अंततः उसी में लय हो जाता है। यह मायिक उपाधियाँ हैं, जो अद्वैत बोध में बाधक बनती हैं। यह अध्यास के कारण होता है। जैसे रस्सी को साँप मानने की भूल होती है, वैसे ही ब्रह्म पर जगत की कल्पना होती है। **आवश्यक क्या है?** अब प्रश्न उठता है कि जब सब कुछ मिथ्या है, तो क्या आवश्यक हो सकता है? आवश्यक केवल वह है जो हमें ब्रह्म की अनुभूति में सहायता करे। या ब्रह्म होने के बोध कराए। **आवश्यक साधन** विवेक : नित्य और अनित्य का विवेक करना ही मुख्य साधन है। वैराग्य : जो नष्ट होने वाला है, उसमें रुचि न रखना। शम और दम: मन और इंद्रियों को संयमित करना। श्रवण, मनन, निदिध्यासन: शास्त्रों को सुनना, उन पर विचार करना और ध्यान द्वारा सत्य को अनुभव करना। साक्षीभाव अपनाना: स्वयं को साक्षी जानकर जगत को देखने से मोह कम होता है। कर्ताभाव का त्याग: जब "मैं कर्ता नहीं हूँ" की दृढ़ता हो जाती है, तो बंधन समाप्त हो जाता है। समत्व बुद्धि: सुख-दुख, हानि-लाभ में समता रखकर स्थितप्रज्ञ बनना। क्या आवश्यक और अनावश्यक भी मिथ्या हैं? जी हाँ, अद्वैत वेदांत में ये दोनों भी अंतिम स्तर पर मिथ्या ही हैं। यह केवल आत्मसाक्षात्कार से पहले की स्थिति के लिए एक उपाय (व्यावहारिक सत्य) है। जब ज्ञान पूर्ण होता है, तो न कुछ आवश्यक रहता है न अनावश्यक केवल ब्रह्म ही शेष रहता है। **शास्त्र प्रमाण:** "सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥" भगवत गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं कि सभी कर्तव्यों और उपाधियों का त्याग कर केवल ब्रह्म में स्थित हो जाओ। श्रीकृष्ण यहाँ यह कह रहे हैं कि "सभी सांसारिक और मानसिक बंधनों को छोड़कर केवल मुझमें (अर्थात् परमात्मा में) लीन हो जाओ। तब मैं तुम्हें संपूर्ण बंधनों से मुक्त कर दूँगा। इसलिए शोक मत करो।" यह श्लोक अद्वैत वेदांत का सार प्रस्तुत करता है केवल ब्रह्म सत्य है, और उसी में स्थित होकर समस्त भ्रम और बंधन समाप्त हो जाते हैं। मांडूक्य उपनिषद "अद्वैतं शान्तं शिवं।" "ब्रह्म अद्वैत (अद्वितीय), पूर्ण रूप से शांत और परम कल्याणकारी (शिव) है।" यह अद्वैत वेदांत का सार है, जो बताता है कि परम सत्य (ब्रह्म) द्वैत से रहित, अचल शांति स्वरूप और पूर्ण मंगलकारी है। **निष्कर्ष** गुरु जब कहते हैं, "अनावश्यक का त्याग करो और आवश्यक को ग्रहण करो," तो वे साधक को यह संकेत देते हैं कि कि ज्ञानोपरान्त यह समझ जाना चाहिये कि वही होगा जो आवश्यक है, अनावश्यक स्वयं छूट जायेगा। यदि कुछ त्यागा जा रहा है तो शायद वह अनावश्यक न हो किन्तु यदि त्याग हो गया है तो निश्चित ही वह अनावश्यक था, जो छूट गया। तो अनावश्यक के त्याग से यह विचार करना कि क्या अपना लूॅ और किसका त्याग करू पूर्णतः कर्ताभाव के अज्ञान से उत्पन्न वृत्ति है। न कोई त्यागने वाला है और न ही कोई अपनाने वाला, अनावश्यक छूट जायेगा और आवश्यक होकर रहेगा। जब पूर्ण बोध हो जाता है तो आवश्यक और अनावश्यक की धारणा का भी लोप हो जाता है, और केवल ब्रह्म की शुद्ध स्थिति रह जाती है। यही अद्वैत वेदांत की परम स्थिति है। साधक से जिज्ञासु हो जाओ। जिज्ञासु से ज्ञानी हो जाओ। ज्ञानी से मुक्त हो जाओ। मुक्त से स्वयं ब्रह्मस्वरूप हो जाओ।
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