Wise Words
कविता संग्रह - २
अमिताभ
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**घर** बिखर गया था मैं, अब सिमट रहा हूँ। उलझ गया था मैं, अब सुलझ रहा हूँ। बुझ सा गया था मैं, अब सुलग रहा हूँ। जम सा गया था मैं, अब पिघल रहा हूँ। एक दर्द सा चला आ रहा था, शायद सदियों से, उस दर्द से धीरे धीरे, अब निकल रहा हूँ। अनजाने रास्तों पर चलते भटक गया था मैं, जो घर दिखा अपना, घर की तरफ चल रहा हूँ। **घर का पता** बड़े दिनों बाद... मुझे मेरे घर का पता मिल गया। भटकता रहा हूँ मैं जन्मों जनम, कभी इस राह पे कभी उस राह पे, गुरु जो मिले आशियां मिल गया। मुझे मेरे घर का पता मिल गया। खो गया था मैं संसार के सर्कस में, बनके जोकर हर करतब दिखाते हुए, थी मुझको मेरी कोई खबर ही नहीं, गुरु- दर्पण में देखा सब याद आ गया। मुझे मेरे घर का पता मिल गया। फंसा था मैं खुद के ही जंजाल में, कर्म-दलदल में फंस के छटपटाते हुए, मुख में मेरे ज्यों ही ज्ञान मोती गिरा, उसी दलदल में मैं कमलवत खिल गया। हां, मुझे मेरे घर का पता मिल गया। मुझे मेरे घर का पता मिल गया। **स्वप्न** स्वप्न प्रश्न कौन है पराया, सब अपने ही तो हैं। सब अपने तो हैं, पर सब सपने ही तो हैं। सब सपने हैं तो क्या, सपने अपने ही तो हैं। सपने मेरे तो हैं, पर मैं सपना तो नहीं। जो मैं सपना नहीं तो कोई अपना ही नहीं। तो बोलो, कौन है अपना और कौन पराया। क्या है सपना और कौन स्वप्न में आया। **तत्व** दृश्य भी मैं, दृष्टा भी हूं, हां मैं दृष्टि हूं। न सृजन मैं, न सृष्टा हूं, पर मैं सृष्टि हूं। तत्व मैं ही सभी नाम रुपों में, घड़े से जो हट न सके, मैं वो मिट्टी हूं। **नाम रूप देश स्थान** मेरे रूप हैं अनेक, अनंत मेरे नाम। मैं ही हूँ सबमें, चाहे कृष्ण कहो या राम। सब स्थानों में मैं हूँ, न मुझमें कोई अंतराल, सब परिवर्तनों मैं स्थिर, चाहे कोई भी हो काल। **अस्तित्व की पुकार** सबकी मंजिलें एक हैं, पर रास्ते नहीं। देखो तुम राह में भटक ना जाना कहीं। एक बार अपने "मैं" से पूछ लो मेरा पता सही। केवल तुम ही आना, कुछ लेके आना नहीं। मुझे कुछ ना चाहिए एक तुम्हारे सिवा, देर जो तुम करोगे तो फिर मैं मिलूंगा नहीं। **आत्मसाक्षात्कार** आत्मन कहे आत्म से... कैसे पहचानोगे मुझे जब मिलोगे तुम, मुझको देखे हुए सदियां हैं बीत गईं। जो यादें थी वो कुछ मिट सी गई हैं, पुराने चेहरे भला अब दिखेंगे कहीं। लो मैं तुमसे कहती हूं, ये राज की बात, जो चेहरे ना मिले पर मिलेंगे जज़्बात। जब मुझे देख के खुद को भुला दोगे तुम, जान लेना मुझे तुमने पा है लिया। ना शिकवा रहेगा ना शिकायत कोई, न मैं तुम रहेंगे बस रहेंगे हमीं। जान लेना तुम्हारा फैसला था सही, मिले जो तो फिर कभी बिछड़ेंगे नहीं। **मानदंड** कोई कहता है मैं सुंदर हूँ, कोई कहता है कुरूप। कैसे मैं जानू अपना सत्य स्वरूप। जो बादल मैं होता निकल जाता बरस के, जो दानव मैं होता सबको खा जाता गरज के। यूं ही बदलता रहा, कौन करेगा यकीं, पर मैं तो खुद को बदलता पाता नहीं। अब कोई सुंदर कहे या कहे कुरूप, मैं तो सत्य हूँ नहीं मेरा कोई रूप। **अस्तित्व** नहीं मैं कोई इच्छा, न ही कोई भावना, हूँ तो मैं शून्य, मेरी अनंत है संभावना। न तो सृष्टि है मेरी , न ही सृष्टा हूँ मैं। सभी दृश्य हैं मुझमें , बस दृष्टा हूँ मैं। सब रूप हैं मेरे पर अरूप हूँ मैं। शांति और आनंद स्वरूप हूँ मैं। कविता और कहानियों में मैं मिलता नहीं सत्य स्वरूप अडिग हूँ मैं जरा भी हिलता नहीं। सर्वत्र होके भी मुझे कोई पा सकता नहीं। सब स्थान मुझमें, बाहर कोई जा सकता नहीं। **अनुभवकर्ता** जो मुझे देखना चाहो, मैं दिखूंगी नहीं। जो मुझे पाना चाहो, मैं मिलूंगी नहीं। जन्मों- जनम से तुम्हारे साथ ही तो हूं। जो मेरे होना चाहो, तुम मैं ही तो हूं।