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रचना
शैल
रचना अर्थात रूप रंग, एक आकृति, जो अनुभव में आए। अर्थात, एक अनुभव! कोई भी अनुभव परिवर्तन के बिना नहीं हो सकता, इसलिए रचना भी परिवर्तन से ही होगी।और परिवर्तन मिथ्या है इसलिए रचनाएं भी मिथ्या हैं। सभी परिवर्तन और आकृतियों का मूल तत्व अनुभव कर्ता ही है। अतः वही सभी रचनाओं में प्रगट है, दूसरा नहीं। किन्तु माया में नाद ही सभी परिवर्तनों का मूल है। अतः रचना स्वयं समय और स्थान एक साथ निर्मित करती है। जिसमें उसके प्रगट होने की संभावना व्यक्त होती है। हर परिवर्तन स्थान और समय की माया को प्रगट करता है। वस्तुएँ तन्मात्राओं से निर्मित अनुभव मात्र हैं। और ये सभी मिथ्या रूप मिथ्या में ही प्रगट हो सकते हैं। इसलिए परिवर्तन की मूलभूत इकाई को नाद मान लिया गया है, जो सभी रचनाओं के मूल में स्पंदन के रूप में व्याप्त है। अनुभव कर्ता स्वयं ब्रह्मण है, जिसमें होना, न होना और आभाव तीनों है। इस प्रकार नाद संभावनाओं के अनुरूप गति करता है और सरल से जटिल नाद रचनाएँ निर्मित होती प्रतीत होती है। क्योंकि परिवर्तन के साथ समय और स्थान की अवधारणा भी निर्मित हो जाती है। अब स्वयंसंगठन की प्रक्रिया से प्रति कृति बनती जाएगी और रचनाएं निर्मित होती जाएंगी। यहां नाद की गति इतनी धीमी हो जाती है कि स्मृति निर्मित करती जाती है, जो रचना के रूप मैं उभरती प्रतीत होती है। रचना की कोई प्रक्रिया नहीं है, क्योंकि मिथ्या है। संभावित नाद मात्र है।
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