Wise Words
भाषा: संकेत है।
सत्यम
भाषा, ज्ञानमार्ग पर ज्ञान के लिए अति आवश्यक साधन है। इसीलिए भाषा का सही एवं सटीक ज्ञान होना भी साधक का एक आवश्यक गुण बन जाता है। क्योंकि तभी "वह" समझा जाएगा जो कहा जा रहा है। एक तो पहले ही ज्ञान को शब्दों में लाया गया है ऊपर से यदि भाषा का भी उचित ज्ञान नहीं होता है तो अर्थ का अनर्थ ही होगा। परन्तु जब भी शब्दों में ज्ञान दिया जाता है तो हम यही पाते हैं कि शब्द नहीं दिए गए हैं, इशारा दिया गया है। संकेत दिया गया है। भाषा मानव के लिए बहुत ही काम का आविष्कार सिद्ध हुआ है। मूल रूप से भाषा के विषय में बात करें तो यह हमारे अनुभव की ओर संकेत या इशारा है। कोई भी शब्द (बोला गया शब्द) अपने आप में एक ध्वनि के अलावा कुछ नहीं। और इसमें भी, जो दो व्यक्ति संवाद कर रहे हैं उन दोनों को यह ज्ञात होना चाहिए कि इस एक ध्वनि से संकेत, इस एक अनुभव की ओर किया जाएगा। अन्यथा भाषा का अर्थ ही समाप्त हो जाएगा, फिर वह किसी काम की नहीं। यानि कि शब्द या ध्वनि नहीं, वह अनुभव काम का है, जिसकी ओर संकेत करने का प्रयास उन शब्दों द्वारा किया जा रहा है। जब भाषा पहली बार लिखावट में आई होगी, तो जीवन थोड़ा और आसान बन गया। अब आपको उस समय और स्थान पर उपस्थित होने की आवश्यकता नहीं है जहां सूचना दी जा रही है। आप बाद में कभी भी उस कागज़ को खोलकर पढ़ सकते हैं (पहली लिखावट शायद पत्तों पर हुईं थी मुझे इसका ज्ञान नहीं।)। लिखी हुई ध्वनियों और शब्दों ने एक क्रांति अवश्य लाई होगी। परन्तु अब मान्यता दोगुनी हो गई है। पहले तो उस अनुभव को एक ध्वनि से बताया जाता था और अब उस ध्वनी को भी उल्टी सीधी रेखाओं में अपनाना पड़ा। अगर आप केवल आंखों से देखे, पढ़े नहीं, तो यह लेख बस एक सुव्यवस्थित रेखाओं का समूह मात्र ही तो है। और जैसा कि आपने विद्यालय की प्रारंभिक कक्षाओं में पढ़ा होगा तो पहले आपको "अ" बोलना सिखाया गया था। जिस "अ" का कोई मतलब नहीं था। फिर लिख कर बताया गया कि ऐसी ऐसी रेखाएं खींचो और अब जो ये उल्टी सीधी रेखाएं हैं इसे "अ" कहते हैं। तो अब आपने उस ध्वनि को रेखाओं पर थोप दिया। या मान लिया कि यही रेखाओं का समूह "अ" ध्वनि है। और ऐसे ही आपने अक्षर जोड़ना आदि सिखा। क्योंकि एक अकेला अक्षर किसी काम का नहीं है। वह शब्द काम का है जो उस ध्वनि की ओर संकेत करता है जो किसी अनुभव की ओर संकेत करती हैं। तो इस प्रकार सम्पूर्ण भाषा (मौखिक या लिखित) बस अनुभवों का "नाम" या संकेत मात्र है स्वयं अनुभव नहीं। "जलेबी" शब्द या जलेबी ध्वनि नहीं, स्वयं जलेबी काम की चीज़ है। तो अंतिम और प्रथम बात "अनुभव" ही है, बात वहां से कभी भटकी ही नहीं। वस्तुओं के नाम के अलावा भाषा में आगे भी बड़ा विकास है। क्रिया, संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण, क्रिया-विशेषण आदि आदि। तो जब शब्दों के माध्यम से नाम दिए गए तो केवल एक जगह पड़ी चीजों को ही नहीं (जिनको "वस्तु" नामक वर्ग में बांट दिया गया है), क्रियाशील अनुभवों के लिए भी नाम खोजें गए। जैसे खेलना, खाना, पढ़ना, लिखना आदि। और इसी प्रकार आगे बढ़ते बढ़ते एक दिन मानव ने खुद को "व्यक्ति" कहना शुरू कर दिया। वास्तव में है तो वहां भी पदार्थ, क्रियाएं, प्रक्रियाएं और दूसरे अनुभव ही। और उनके भी नाम है शरीर, संवेदनाएं, विचार, भावनाएं, बुद्धि, विवेक, अहम, स्मृति, चेतना आदि। स्वयं को व्यक्ति कहने के बाद शायद उसको ज्यादा ही मज़ा आया होगा कि वो भी कुछ तो है ही। अंत में सम्पूर्ण भाषा और सभी भाषाएं पूरी तरह से अनुभवों [वस्तुओं, क्रियाओं, प्रक्रियाओं आदि {और ब्रैकेट के अंदर लिखे यह सब भी नाम ही है, थोड़ा सा अजीब है भाषा का विश्लेषण, भाषा का ही प्रयोग करके।}] के "नाम" है। नाम के अलावा भाषा कुछ भी नहीं। बस एक संकेत मात्र है "उस अनुभव की तरफ"। एक उदाहरण और ले लेते हैं "राम अयोध्या के राजा थे"। अब इस पूरे वाक्य को अलग अलग शब्दों के रूप में समझिए। "राम", एक व्यक्ति का नाम है। व्यक्ति, विभिन्न अनुभवों के समूह का नाम है। "अयोध्या", एक स्थान का नाम है। स्थान, पृथ्वी पर एक सीमित दूरी की जगह का नाम है। "के" दो शब्दों में संबंध स्थापित करने के लिए प्रयुक्त शब्द का नाम है। "राजा", किसी स्थान पर निर्णायक शक्ति रखने वाले व्यक्ति का नाम है। "थे", भूतकाल की किसी घटना के लिए प्रयुक्त शब्द। "भूतकाल", बीते समय का नाम। "समय", अनुभवों में बदलाव के कारण स्मृति में पहली और दूसरी घटना का होना और उनके बीच तुलना करना। और इस प्रकार हमारी इस नाम की गाड़ी को आप जितना आगे तक खिंचना चाहे खींच सकते हैं। इस प्रकार हमारे इस वाक्य का हर एक शब्द एक नाम है। उसी प्रकार इस लेख का हर एक शब्द एक नाम है। उसी प्रकार हर भाषा का हर शब्द एक नाम के अलावा कुछ नहीं जो मूल रूप से किसी न किसी अनुभव या घटना की ओर संकेत करता है। उसी तरह से "ज्ञान" नहीं "ज्ञान का सार" काम की वस्तु है। क्योंकि ज्ञान का सार वह है जिसकी ओर इशारा किया गया है। अनुभव, अनुभवकर्ता और अस्तित्व भी नाम ही सिद्ध होते है। इसीलिए ये नाम रटने में कुछ नहीं उन्हें जानना ही एकमात्र अर्थपूर्ण बात है जिनको इन नामों से बुलाया जा रहा है। जैसा कि एक प्रसिद्ध कहावत है कि "जब मैं अंगुली से इशारा करके कहूं कि वहां देखो! वह चांद है तो अंगुली को मत देखते रह जाना"। तो इसीलिए प्रथम और अंतिम बात यही है कि चांद के लिए अंगुली उठाई गई है, चांद को देखिए कितना सुंदर है। अंगुली का काम चांद दिखा कर खत्म हो जाता है। भाषा वास्तव में उस उंगली के अलावा कुछ भी नहीं है। और अनुभव चांद है, जो वह महत्वपूर्ण चीज़ है जिसके लिए अंगुली उठानी पड़ी। धन्यवाद।
Share This Article
Like This Article
© Gyanmarg 2024
V 1.2
Privacy Policy
Cookie Policy
Powered by Semantic UI
Disclaimer
Terms & Conditions