Wise Words
Home
Read
Write
Publish
Profile
Logout
ज्ञानतरंगः "अनुभवकर्ता"
जानकी
"ज्ञानतरंग" सद्गुरूदेव श्री तरुण प्रधान जी द्वारा विभिन्न सत्संग, प्रवचन और लेखों में व्यक्त किए गए कुछ मुख्य वाक्यों का संकलन है। इस भाग में "अनुभवकर्ता" के विषय में व्यक्त कुछ ज्ञानतरंगों को प्रश्तुत किया गया है। यह श्रृखला के रुपमें इससे आगे भी क्रमश: प्रकाशित होता रहेगा। **अनुभवकर्ता** <br><br><div class='ui image'><img width='1200px' src='images/89426796-IMG_0038.jpeg'></div><br><br> १। कल्पना का अनुभव करने वाला काल्पनिक नहीं हो सकता। २। जिसको अस्तित्व का अर्थात स्वयं का अनुभव होता है वही अनुभवकर्ता है; यही तत्व है। ३। मैं सत्य हूँ बाक़ी सब मेरा ही मिथ्या रुप है। ४। मैं स्वप्न द्रष्टा हूँ, स्वप्न के श्रृंखला है, बाक़ी कुछ नहीं है यही ज्ञान का सार है। ५। स्वयं को जानना ही आत्मदर्शन है। ६। अनुभवकर्ता मृत से भी मृत और सजीव से भी सजीव है। ७। अनुभवकर्ता के सारे विवरण नकारात्मक है। ८। मैं अवैयक्तिक हूँ, तत्व हूँ, तत्व सार्वभौमिक है; और माया भी मैं ही हूँ। ९। न मैं जीवन हूँ; न मैं जीवन से भिन्न हूँ। १०। कोई कभी आत्मन नहीं बन सकता; क्योंकि वह आप पहले से हैं। ११। अनुभवकर्ता परिवर्तनहीन है, स्थायी है; सभी परिवर्ननों का द्रष्टा है। १२। अज्ञान मल है, ज्ञान भी मल है, ज्ञान का अंत होना अनुभवकर्ता का प्रकट होना है। १३। अनुभवकर्ता का ज्ञान नहीं होता; हुआ जाता है। १४। अनुभव में आनंद नहीं मिलता; आनंद तो मेरा स्वभाव है। १५। ज्ञान के लिए शरीर (उपकरण) आवश्यक है, मेरे होने के लिए नहीं। १६। आत्मन किसी चीज के अंदर/बाहर नहीं है। १७। सभी अनावश्यक हटाने पर जो निर्गुण स्वरूप या शून्यता दर्शाने वाला मूल तत्व बाक़ी रह जाता है; यही आत्म-साक्षात्कार है। १८। सभी जीवों, अवतारों को आते और जाते हुए देखने वाला ही अनुभवकर्ता है। १९। आत्मन में स्वामित्व का कोई भावना नहीं। २०। जो व्यापक है वह सबसे छोटा है, जो विराट है वही मामूली है। २१। आत्म के कोई रंग, रुप, सीमा, बंधन, वृत्ति, बदलाव आदि कुछ भी नहीं है; यह कोई रचना या ढाँचा नहीं है। २२। मैं ही शून्य हूँ; मैं ही संपूर्ण हूँ। २३। कुछ भी मेरा नहीं है; सब कुछ मेरा ही है। २४। मैं निर्गुण, निर्मल और निर्लिप्त हूँ; कुछ भी मुझमें नहीं; फिर भी सगुण रूप मेरी ही छाया है। २५। मेरा जन्म नहीं हुआ और मृत्यु भी नहीं होगी; यह अस्तित्व मुझमें ही जीवंत है। २६। एक हो जाना प्रेम है; मैं प्रेम हूँ। २७। प्रेम नश्वर नहीं अटल है, शाश्वत है, सभी में एक ही संबंध है प्रेम का; अन्य कोई संबंध नहीं है। २८। शून्यता को बांधा नहीं जा सकता; अनुभवकर्ता हमेशा मुक्त है। २९। जिससे जिसका दर्शन होता है वह मैं स्वयं हूँ। ३०। अनुभव बदलने से अनुभवकर्ता नहीं बदलता। ३१। प्रकाश से संभावना प्रकट होती है। ३२। जहाँ प्रकाश है आस-पास का वातावरण भी प्रकाशित होता है। ३३। अनुभवकर्ता नित्य, सत्य, और स्वयं सिद्ध है; स्वयंभू है। ३४। यदि मैं सबकुछ हूँ तो मैं किसी एक चिज में स्थित नहीं रह सकता; या तो मैं सब कुछ हूँ या तो कुछ भी नहीं हूँ। ३५। अनुभवकर्ता और माया शिव-शक्ति का ही नाम है, दोनों एक है; दोनों के मिलन से अद्वैत शुरु होता है। ३६। अनुभवकर्ता ही सत्य है; सत्य के लिए कोई प्रमाण आवश्यक नहीं; झूठ को सिद्ध करने के लिए अनेक प्रमाण जुटाने पड़ते हैं। ३७। अनुभवकर्ता खण्डन करने मात्र से भी सिद्ध हो जाता है; अनुभवकर्ता नहीं है यह बात भी अनुभवकर्ता होने का प्रमाण है; नहीं तो यह वाक्य/विचार किसको अनुभव होता। ३८। ज्ञान याद करना और भूलना चित्तवृत्ति है; चाहे चित्तवृत्ति हो या न हो मैं तो हमेशा हूँ; भूल जाने के बाद भी मैं वही रहूँगा; मैं जो हूँ उसे कैसे भूल जाऊँ? मैं प्रयास से कैसै मिल सकता हूँ? ३९। ज्ञान स्मरण का अर्थ शून्य स्वरुप में स्थित होना है; ज्ञानका विचार लाना या ज्ञानवृत्ति चलना नहीं। ४०। यदि स्वयं को जानने में प्रयास लग रहा है तो आत्मज्ञान नहीं हुआ; शाब्दिक ज्ञान आत्मज्ञान नहीं हो सकता। ४१। केवल मैं हूँ जिसको नकार नहीं सकते, लेकिन कुछ बोल भी नहीं सकते; बाक़ी सब नकारा जा सकता है। ४२। अनुभवकर्ता कोई कारण और प्रभाव से नहीं है; शाश्वत है, बिना कारण है, बस है। ४३। मैं ब्रम्ह पहले से हूँ; जो अहम का घेरा बना है उसका नाश जरुरी हैं; मनोशरीर का भ्रम मिटाना ज़रूरी है। ४४। जब तत्व खोजने जाते हैं तो कुछ नहीं मिलता; फिर भी वो है; इसीको शून्यता या निर्गुणता कहते हैं। ४५। जीसको मिथ्या साबित न कर पाए तो वहाँ कुछ है लेकिन क्या है यह जाना नहीं जा सकता, अज्ञेय है। ४६। अस्तित्व में दो ही वर्ग है-अनुभव और अनुभवकर्ता; एक दूसरा कभी नहीं हो सकता। ४७। न अनुभव का स्वतंत्र अस्तित्व है न अनुभव के बिना अनुभवकर्ता का ज्ञान होता है। ४८। दृष्य और द्रष्टा का भेद जानना ज्ञान की पहली सीढ़ी है; अनुभव और अनुभवकर्ता एक होते हुए भी अस्तित्व का दो अनन्य श्रेणीयाँ हैं, एक दूसरे की श्रेणी में कभी नहीं आ सकते; सत्य असत्य नहीं हो सकता और असत्य सत्य नहीं हो सकता; यही दृश्य-द्रष्टा विवेक है। ४९। जैसे एक म्यान में दो तलवार नहीं रह सकते वैसे ही मैं एक साथ अहम और आत्मन दोनों नहीं हो सकता; या तो व्यक्ति रहेगा या अनुभवकर्ता रहेगा। ५०। कुछ बनने का प्रयास शुद्धिकरण नहीं है; हटाना शुद्धीकरण है; मैं पहले से ही पूर्ण और शुद्ध हूँ। ५१। अनुभवकर्ता अप्रकट और अदृष्य है, लेकिन अभी यहीं मौजूद है। ५२। अनुभवकर्ता का कोई आकार नहीं है; इसलिए सभी आकार उसमें प्रकट है। ५३। अनुभवकर्ता सर्वव्यापी है; लेकिन कोई भी स्थानों में नहीं मिलता; सभी स्थान, आकाश, पूर्णता, शून्यता अनुभवकर्ता के भीतर ही समाता है। ५४। पास भी यहीं है, दूर भी यहीं है, लोक भी यहीं है, परलोक भी यहीं है। ५५। कुछ न मिलने से अनुभवकर्ता को काल्पनिक आयाम देना ग़लत है। ५६। अनुभव नहीं होता तो अनुभवकर्ता नाम की कोई चीज़ भी होती है यह बात स्मृति में संयोजित नहीं होती। ५७। जो तत्व है उसको किसी भी विधि, प्रक्रिया या पदार्थ से नहीं बनाया जा सकता। ५८। मूल में कोई शुरूआत और समाप्ति नहीं होती। ५९। सभी का तत्व एक ही है; सभी घड़े में एक ही आकाश है; विभिन्न घड़ों में आकाश (ख़ाली स्थान) होने से आकाश खंडित नहीं होता, अखंड है। ६०। पर्दे पर पर्दा स्वयं प्रकट नहीं हो सकता, उसका मिथ्या रुप प्रकट होता है। ६१। असीमित का अर्थ इतना बड़ा होना नहीं है कि जो कोई काल्पनिक चीज में नहीं समा सके; असीमित का अर्थ यह है कि किसी भी प्रकार का सीमा लागू नहीं हो सकती; समय, स्थान, रूप, गुण, कारण, प्रभाव, मात्रा, परिमाण आदि हर सीमाओं से परे है। ६२। अनुभवकर्ता पर अंदर बाहर के धारणा लागू नहीं होती; न शरीर पर है, न सर पर है; न किसी स्थान पर है। ६३। अनुभवकर्ता बहुत रहस्यमयी है; कुछ भी करने से अनुभवकर्ता का अनुभव नहीं हो सकता। ६४। अनुभवकर्ता कोई वस्तु नहीं है जिसको देखा जा सके, सुना जा सके, समझा जा सके या जाना भी जा सके। ६५। अनुभवकर्ता स्मृति का भी साक्षी है, उसी के प्रकाश में स्मृति प्रकाशित है; आत्मज्ञान स्मृति में है; आत्मन स्मृतिका द्रष्टा है। ६६। अनुभवकर्ता ज्ञान का भी साक्षी है; इसलिए अज्ञेय है। ६७। अनुभवकर्ता को होकर जाना जाता है। ६८। द्रष्टा को शब्द में बताया नहीं जा सकता; शब्दों से संकेत मात्र हो सकता है; जानने के लिए शब्दों के परे, बुद्धि के परे जाना पड़ता है। ६९। दिन है या रात जानने के लिए किसी से पुछना नहीं पड़ता; केवल देखने से ही पता चलता है। ७०। जो मैं नहीं हूँ वह होने में प्रयास लगता है, जो मैं हूँ वह होने में कोई प्रयास नहीं लगता। ७१। आग से हाथ जलता है यह जानने के लिए एक ही बार छूना पड़ता है; बार-बार नहीं। ७२। जिस प्रकार बादलों के आने-जाने से आकाश में कोई प्रभाव नहीं पड़ता उसी प्रकार कोई भी अनुभव आने-जाने से अनुभवकर्ता प्रभावित नहीं होता। ७३। आईना स्वयं का छवि नहीं दिखा सकता, आग स्वयं को नहीं जला सकता, पानी स्वयं को गीला नहीं कर सकती, और सूर्य स्वयं को प्रकाशित नहीं कर सकता; प्रकाश ही सूर्य है। ७४। जो हर अनुभव को प्रकाशित कर सके उसको भी प्रकाशित करने वाला होना असंभव है; वह आधार स्वयं है जो स्वयं प्रकाशित है। ७५। स्वयं प्रकाशित है इसका किसी ने अनुभव करके नहीं देखा है; यह केवल निष्कर्ष निकाला गया है; क्योंकि हमें आधार वही मिलता है। ७६। अनुभव के कारण ही अनुभवकर्ता का ज्ञान होता है। जो प्रकट है उसी को देख कर बताया जा सकता है कि किस के समक्ष प्रकट है। ७७। अंधेरे में रस्सी साँप जैसे दिखाई देने से रस्सी साँप में परिवर्तित नहीं हो जाती। रस्सी में साँप दिखना केवल चित्त का प्रक्षेपण है, भ्रम है। ७८। एक बार मिट्टी का घड़ा टूट गया तो उसके अंदर का आकाश बाहर का आकाश से अलग नहीं किया जा सकता; पानी एक ही है चाहे वह ग्लास में हो या बोतल में। ७९। मेरी कोई अवस्था नहीं एक ही अवस्था है सत्चितानंद/समाधि; यह कोई अवस्था नहीं है, होना मात्र है; चित्त परिवर्तनशील है अवस्थाओं से जाता है; मैं नहीं। ८०। अनुभवकर्ता को ही सभी अनुभव हो रहा है; जो कोई एक मनोशरीर के माध्यम से हो रहा है वह भी और जो अन्य सभी मनोशरीर के माध्यम से हो रहा है वह भी। ८१। यदि मैं का तादात्म्य मनोशरीर से है तो सीमित अनुभव ही होगा। ८२। निर्गुण ब्रम्ह में सगुण में प्रकट होने की इच्छा है, हर प्रकार का अनुभव प्रकट करने की संभावना है और वही सगुण रुप में प्रकट हो रहा है। ८३। अस्तित्व में कोई भी अनुभव प्रकट होने की संभावना है लेकिन निर्गुण सगुण में और सगुण निर्गुण में बदलने की संभावना कभी नहीं है। ८४। जैसे पुरुष को पुरुष होने में और स्त्री को स्त्री होने में कोई प्रयास नहीं लगता वैसे ही मुझे मेरे होने में कोई प्रयास नहीं लगता। ८५। आत्मनको किसी भी इंद्रियों से या इंद्रियों के बिना किसी भी तरह से अनुभव नहीं किया जा सकता। ८६। बुद्धि की पहुँच इंद्रियों द्वारा प्राप्त मिथ्या तक ही है; गुण रहित, तंमात्रा रहित ज्ञानाज्ञान रहित को कैसे जाने? ८७। मिथ्या को मिथ्या दिखे तो ब्रम्हन को जाना जा सकता है, बुद्धि से परे है लेकिन पूरी तरह से अज्ञात नहीं है। ८८। अनुभवकर्ता वह है जो वस्तुओं को होने का होना पन देता है; कुछ भी होना तब कह सकते हैं जब उसको होने का होना पन मिले। ८९। सभी अनुभव अनुभवकर्ता को ही होते हैं, जीव जो अपना अनुभव मान लेता है वह चित्त की प्रतिक्रिया है। ९०। "मैं प्रमाण सहित जानता हूँ कि मैं क्या हूँ" यह ज्ञान है; किसी ने कहा है "मैं यह हूँ" यह अंधविश्वास है। ९१। अनुभवकर्ता किसी रूप में नहीं मिलता, रुप का तो अनुभव हो जाता है, सभी रूप को देखने वाला जो है वही द्रष्टा है। ९२। अनुभवकर्ता को केवल होने से जाना जाता है, अनुभव करने से नहीं; यह वह नहीं जो जाना जाता है; यह जानने वाला है। ९३। मैं कभी पैदा नहीं हुआ, कभी नहीं मरूँगा, मेरा कभी पुनर्जन्म नहीं होगा; जो बार-बार जन्म ले रहा है, वह मैं नहीं हूँ। ९४। तत्व होने और तत्व ज्ञान होने में ज़मीन आसमान का भिन्नता है। ९५। हीरा अपनी क़ीमत नहीं जानता, ज़ोहरी जानता है; अनुभवकर्ता स्वयं को नहीं जानता। ९६। मैं जहाँ हूँ वहीं हूँ, मैं कहीं जाता नहीं, मैंने कभी घर छोड़ा नहीं; यात्रा में भड़क जाना अज्ञान है। ९७। मैं ही प्रार्थना हूँ, प्रार्थना करने वाला हूँ, मैं ही प्रार्थना सुनने वाला हूँ, मैं ही याचक हूँ, मैं ही दाता हूँ। ९८। अनुभवकर्ता दर्पण की तरह है; जो भी सामने आता है वह दिखाता है। ९९। अनुभवकर्ता ज्ञान-अज्ञान रहित है; आत्मन/ब्रम्हन को ज्ञान-अज्ञान से कोई लेना देना नहीं है। १००। आत्मन ही ब्रम्हन है; मेरा ना होना ही सबकुछ होना है।
Share This Article
Like This Article
© Gyanmarg 2024
V 1.2
Privacy Policy
Cookie Policy
Disclaimer
Terms & Conditions