Wise Words
अध्यात्म जीवन में परिवर्तन कैसे लाता है?
शैल
Like This Article
अध्यात्म अर्थात् आत्म ज्ञान के बाद स्वरुप के स्मरण साथ जीना! स्वरूप के अनुरूप व्यवहार के साथ जीवन। कर्मों की प्रकृति जिसकी दिशा तीन तीन मुख्य शक्तियां तय करती हैं, इच्छाशक्ति ज्ञान शक्ति एवं क्रिया शक्ति, धीरे-धीरे परिवर्तित होने लगती है। इस प्रकार बुद्धि शुद्ध होकर जीव को प्रवृत्ति से निवृत्ति की ओर ले जाती है। फिर प्रज्ञा का जन्म होता है। प्रज्ञा अर्थात शुद्ध बुद्धि का प्रकाश, निर्मल ज्योति! जो तत्व को प्रकाशित कर दे। फिर सभी ओढ़े गए आवरण गिर जाएंगे। इसलिए अध्यात्म में ज्ञान अर्जित करने के बजाय ज्ञान में स्थित रहने के लिए साधना का इतना महत्व है। शुरुआत इच्छाशक्ति से करें तो ज्ञान शक्ति और क्रियाशक्ति पर सीधा कार्य करना नहीं पड़ता। क्योंकि दोनों को इच्छाएँ ही चला रही होती है। कभी कभी यह कार्य क्रिया शक्ति से भी शुरू करनी होती है। उन्हें, जो कर्मों के पीछे के बल को सीधा नहीं देख सकते। एक दृष्टि में क्रिया अधिक प्रभावशाली जान पड़ती है। ओरे बलशाली भी। किंतु ज्ञान मार्गी उसके पीछे के ज्ञान की प्रकृति को पहचान लेता है और वह ज्ञान किन प्रकार की इच्छाओं से आ रही हैं यह भी देख पता है। यहां तक कि इच्छाओं के पीछे के विचारों और भावों को भी देख पाता है। और यह भी जानता है कि जब तक इनके मूल तक पहुँच कर कार्य न किया जाए कर्मों का शुद्धिकरण नहीं हो सकता। कभी कभी त्याग से विरक्ति और विरक्ति से वैराग्य का आना संभव है। किन्तु साधक के पुनः स्मृति जनित पूर्व संस्कारों में लौटने की संभावना भी बढ़ जाती है। साथ ही संकल्प के टूटने के कारण मनोबल कमजोर पड़ जाता है। और मन के और अधिक शक्तिशाली होने की संभावना भी बढ़ जाती है। इसलिए यदि शुरुआत स्थूल से कर रहे होते हैं तो उनके पीछे के विषयों के मूल तक आना ही होता है। जैसे पतंग के सहारे डोर की पहचान कर पतंग का नियंत्रण डोर के सहारे लिया जा सकता है। विषय सूक्ष्म है किन्तु स्थूल को बल वहीं से मिल रहा होता है। अतः हर कार्य अथवा क्रिया के के मूल में निहित इच्छाओं और उनके निमित्त विचारों तक पहुंचना आवश्यक होता है। इच्छाओं के अवलोकन से उनके मूल में स्थित विचारों को देखा जा सकता है। और विचारों के मूल में भावनाएं ही होती हैं। अर्थात विचार तरंगायमान भाव ही हैं, जो लहरों के रूप में सागर तल पर दिखाई पड़ती हैं। फिर सतही तल पर लहरें कार्य कार्य में लिप्त जान पड़ेंगी। । अब हम लहरों से लड़ते रहें तो ऊर्जा व्यर्थ नष्ट होगी। एक लहर मिटी नहीं कि कई कई लहरें उत्पन्न होती रहेगी। इसलिए स्थिर प्रज्ञ लहरों से लड़ता नहीं, दृष्टा बना रहता है। साक्षी भाव में! फिर इच्छाओं के पीछे की प्रबल भावनाएँ प्रकाशित हो जाती हैं। अब उन भावनाओं के के पीछे की मूल भावनाओ की प्रकृति की पहचान कर उस स्तर पर कार्य किए जाने की आवश्यकता होगी। मूल इच्छा व्यक्ति से ऊपर उठकर समष्टि केलिए हो तो विचार भी शुद्ध होंगे। और फिर उससे होने वाला ज्ञान और उस ज्ञान से होने वाले कर्मों की प्रकृति को बदलने में प्रयास नहीं लगेगा, स्वयं होंगे। इस प्रकार बुद्धि की शुद्धि से प्रवृत्ति निवृति की ओर अग्रसर होने लगती है। ऐसे में वृत्तियों का बल ही निवृति की ओर गति का कारण बन जाता है। साधक वृत्तियों को ही निवृति का मार्ग बना लेता है। अर्थात वृत्तियों का शुद्धिकरण कर लेता है। वह सभी वृत्तियों को ज्ञानवृत्ति बना लेता है। इस प्रकार ज्ञान का शुद्धिकरण और शुद्ध ज्ञान से कर्मों की शुद्धि हो जाती है।