ज्ञानाक्षर
माया छाया है
प्रविन
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<br><br><div class='ui image'><img width='1200px' src='images/56466024-5f766be8-fa78-48ae-a591-bb6fa47862f2.png'></div><br><br> माया छाया के समान है। छाया का अपना कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं होता। वह दिखाई तो देती है, परंतु स्थायी नहीं होती। वह परिस्थितियों, प्रकाश और दृष्टिकोण के अनुसार बदलती रहती है। इसलिए छाया अनित्य है न वह सदा थी, न सदा रहेगी। जैसे दर्पण में दिखाई देने वाले प्रतिबिंब निरंतर बदलते रहते हैं, परंतु दर्पण स्वयं नहीं बदलता; उसी प्रकार जीवन में भी सुख-दुःख, लाभ-हानि, मिलन-वियोग, यश-अपयश, संबंध, धन-संपत्ति, सौंदर्य और भौतिक वस्तुएँ निरंतर परिवर्तनशील हैं। ये सब उस दर्पण में दिखाई देने वाले प्रतिबिंबों की भाँति हैं। समय, परिस्थिति और देश-काल के अनुसार ये आते हैं, बदलते हैं और अंततः विलीन हो जाते हैं। दुःख का मूल कारण परिवर्तन नहीं है, बल्कि परिवर्तनशील वस्तुओं के प्रति हमारी आसक्ति है। जब हम किसी छाया को स्थायी सत्य मान लेते हैं, तब उसके बदलने या समाप्त होने पर पीड़ा का अनुभव करते हैं। हम रोते हैं, चिल्लाते हैं, व्याकुल होते हैं, क्योंकि हमने अस्थायी को स्थायी समझ लिया है और छाया को ही सत्य मान बैठे हैं। किन्तु यदि विवेक जागृत हो जाए और हम छाया को छाया की तरह देख सकें, तो दृष्टि बदल जाती है। तब यह स्पष्ट होने लगता है कि जो आता-जाता है, वह सत्य नहीं हो सकता। जो आज है और कल नहीं रहेगा, उस पर अपना अस्तित्व आधारित नहीं किया जा सकता। जब यह समझ गहराती है, तब मनुष्य जीवन की घटनाओं से भागता नहीं, बल्कि उन्हें साक्षीभाव से देखता है। तब दर्पण के भीतर चाहे कितने ही दृश्य बदलते रहें, दर्पण अप्रभावित रहता है। उसी प्रकार जागरूक व्यक्ति भी जीवन के उतार-चढ़ावों के बीच अपनी आंतरिक शांति को बनाए रखता है। इसलिए मनुष्य के लिए सबसे महत्वपूर्ण खोज यह नहीं है कि संसार में क्या-क्या प्राप्त किया जाए, बल्कि यह है कि **वह क्या है जो छाया नहीं है? वह क्या है जिसके कारण यह सम्पूर्ण छाया-जगत दिखाई देता है? वह कौन है जो सुख-दुःख, लाभ-हानि और जन्म-मृत्यु के सभी परिवर्तनों का साक्षी है? और वह कौन है जो वास्तव में माया से मुक्त है?** यही प्रश्न अध्यात्म की शुरुआत हैं। जब तक मनुष्य केवल छायाओं में उलझा रहता है, तब तक उसका जीवन बाहरी घटनाओं के साथ डगमगाता रहता है। परंतु जैसे ही उसकी दृष्टि छाया से हटकर उसके आधार की ओर मुड़ती है, एक नई यात्रा प्रारम्भ होती है **स्व की खोज की यात्रा।** स्वयं को जानने से बड़ा कोई ज्ञान नहीं, और स्वयं को भूल जाने से बड़ा कोई अज्ञान नहीं। इसलिए प्रत्येक मनुष्य को समय निकालकर यह पूछना चाहिए **मैं कौन हूँ? क्या मैं बदलते हुए विचार हूँ? क्या मैं शरीर हूँ, जो निरंतर बदल रहा है? क्या मैं संबंध, पद, प्रतिष्ठा और पहचान हूँ? या फिर मैं वह साक्षी हूँ जो इन सब परिवर्तनों को देख रहा है?** जब यह खोज गंभीरता से आरम्भ होती है, तब धीरे-धीरे माया की पकड़ ढीली पड़ने लगती है। छायाएँ अपना खेल खेलती रहती हैं, परंतु साधक जान जाता है कि वह छाया नहीं, बल्कि वह चेतना है जिसके कारण सब कुछ प्रकाशित है। और यही स्व-ज्ञान का आरम्भ है।यही विवेक है। यही मुक्ति की दिशा में पहला कदम है। क्योंकि जो स्वयं को जान लेता है, उसके लिए माया केवल एक खेल रह जाती है, बंधन नहीं।