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मैं कौन हूँ
तरुण प्रधान
# मैं कौन हूँ हिंदी अनुवाद तरुण प्रधान और जेमिनी द्वारा <br><br><br><br> ## अनुवादक टिप्पणी यहाँ पुस्तक **"Who Am I" (मैं कौन हूँ)** का हिंदी अनुवाद प्रस्तुत है। स्पष्ट करना चाहता हूँ कि इसी नाम से भगवान श्री रमण महर्षि की शिक्षा पर आधारित एक प्रसिद्ध पुस्तक है , परन्तु यहाँ अनुवादित पुस्तक भिन्न है और श्री भगवत् द्वारा रचित है । मूल विचारों को स्पष्ट करने तथा आध्यात्मिक शब्दावली को समझाने के लिए ज्ञानदीक्षा कार्यक्रम के आधार पर स्थान-स्थान पर **ज्ञानदीक्षा टिप्पणी** का समावेश किया गया है। अनुवाद में जेमिनी यंत्र सहायक रहा है। --- <br><br><br><br> # मैं कौन हूँ (Who Am I) **लेखक:** श्री भगवत् **प्रकाशक:** प्रवागम पब्लिकेशंस, सेलम (तमिलनाडु) **प्रथम संस्करण:** सितंबर २०१४ --- ## पुस्तक विवरण एवं प्रकाशकीय पृष्ठ **मैं कौन हूँ** श्री भगवत् **प्रकाशक:** श्रीमती टी. गोमती, प्रवागम पब्लिकेशंस, सेलम - ६३६००३, तमिलनाडु, भारत। **मुद्रक:** स्नेहा प्रिंट्स, सातूर। > **कॉपीराइट चेतावनी:** > इस पुस्तक का कोई भी भाग प्रवागम पब्लिकेशंस, सेलम से लिखित अनुमति के बिना किसी भी रूप (इलेक्ट्रॉनिक, यांत्रिक, फोटोकॉपी या रिकॉर्डिंग) में पुनरुत्पादित या प्रेषित नहीं किया जाएगा। --- <br><br><br><br> # मैं कौन हूँ आध्यात्मिक जगत् में **"मैं कौन हूँ"** सर्वाधिक लोकप्रिय एवं महत्त्वपूर्ण प्रश्न है। विचारकों और साधकों ने इस महत्त्वपूर्ण प्रश्न को भिन्न-भिन्न दृष्टिकोणों से समझने का प्रयास किया है। यद्यपि विभिन्न व्यक्तियों के दृष्टिकोण भिन्न हैं, परंतु मूल सत्य एक ही रहता है। लोग प्रायः इन विविध सिद्धांतों को सुनते समय उनका गलत अर्थ निकाल लेते हैं। जब मैं विद्यार्थी था, तब एक बार ऊटी अध्ययन-यात्रा पर गया था। किसी पर्वतीय स्थल (हिल स्टेशन) की वह मेरी पहली यात्रा थी। मैं बाज़ार से कुछ वस्तुएँ खरीदने गया। उन दिनों नारियल तेल के पाउच नहीं मिलते थे, इसलिए मैं हाथ में एक बोतल लेकर तेल खरीदने निकला। मैंने दुकानदार को बोतल दी और नारियल तेल भरने को कहा। परंतु वह हँस पड़ा और उसने बोतल मुझे वापस लौटा दी। मैं चकित हुआ और उससे पूछा कि क्या उसके पास तेल का भंडार समाप्त हो गया है? चेहरे पर मुस्कान लाकर उसने कहा कि तेल उसके पास पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है। उसकी प्रतिक्रिया से मैं भ्रमित हो गया। तब उसने केले के पत्ते का एक छोटा टुकड़ा निकाला, जिस पर जम चुका नारियल तेल पेस्ट (लेप) के रूप में रखा हुआ था। तब मुझे समझ आया कि पर्वतीय स्थलों पर निरंतर बनी रहने वाली शीतलता के कारण नारियल तेल जम जाता है और लेप का रूप ले लेता है। मैंने नारियल तेल ही माँगा था और उसने भी मुझे वही दिया जो मैंने माँगा था। परंतु हम दोनों एक ही वस्तु का संदर्भ लेते हुए भी एक धरातल पर नहीं थे। यह घटना यह दर्शाती है कि यदि हमें किसी विषय को सही रूप में समझना है, तो हमें उसे सही दृष्टिकोण से देखना होगा। > ### ज्ञानदीक्षा टिप्पणी : दृष्टिकोण और सम्यक् साधन > ज्ञान प्राप्त करने के दो ही मान्य साधन हैं - **अपरोक्ष अनुभव** और **तर्क**। जब तक साधक किसी सत्य को अपने प्रत्यक्ष अनुभव और शुद्ध तर्क के धरातल पर नहीं परखता, तब तक शब्दों का अर्थ भिन्न और भ्रमित करने वाला प्रतीत हो सकता है। पर्वतीय स्थान पर तेल का ठोस रूप धारण करना परिस्थिति-सापेक्ष अनुभव है; इसी प्रकार चेतन तत्व एक होते हुए भी मन-बुद्धि के आवरणों के कारण भिन्न-भिन्न प्रतीत होता है। --- वैज्ञानिक **"योग्यतम की उत्तरजीविता"** की बात करते हैं। इसके अनुसार केवल समर्थ या शक्तिशाली ही जीवित रहेगा और दुर्बल नष्ट हो जाएगा। "दुर्बल का विनाश और सबल का अस्तित्व" एक सामान्य सिद्धांत है जो जीवन के अनेक पक्षों पर लागू होता है। मान लीजिए कि हमारे पास वितरित करने के लिए कुछ वस्तुएँ हैं। उन वस्तुओं की आवश्यकता रखने वाले लोगों की संख्या उपलब्ध वस्तुओं की तुलना में दस गुनी अधिक है। ऐसी स्थिति में लोग उन वस्तुओं को पाने के लिए आपस में प्रतिस्पर्धा करने लगते हैं। शक्तिशाली लोग अपने प्रयास में सफल हो जाते हैं और दुर्बल निष्फल रह जाते हैं। बुद्धि और ज्ञान भी शक्ति का ही एक माप हैं। लोग दूसरों पर विजय प्राप्त करने के लिए इस शक्ति का उपयोग करते हैं। प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं में भी यही होता है। मान लीजिए केवल १०० पद उपलब्ध हैं, परंतु हजारों परीक्षार्थी परीक्षा में बैठते हैं। लोग अपने ज्ञान और बुद्धि के बल पर सफलता पाते हैं। "योग्यतम की उत्तरजीविता" का नियम सर्वत्र दिखाई देता है। परंतु परिवार के भीतर स्थिति पूर्णतः भिन्न होती है। पति, पत्नी और बच्चों के परिवार में सबसे शक्तिशाली कौन है? निश्चित रूप से माता-पिता; वे शारीरिक और मानसिक दोनों रूपों में अधिक बलवान होते हैं। बच्चे हर दृष्टि से दुर्बल होते हैं। अब विचार कीजिए, किसी विशेष सुविधा या वस्तु का उपभोग करने के लिए प्राथमिकता किसे दी जाती है? निश्चित ही बच्चों को। यहाँ "योग्यतम की उत्तरजीविता" का नियम लागू नहीं होता। समाज में लोग केवल अपने, अपनी सुविधा और अपनी प्राथमिकताओं के विषय में सोचते हैं। इसके विपरीत, घर में लोग दूसरों के लिए जीते हैं और अपनों के लिए अपने सुख का त्याग करते हैं। यहाँ 'अहं-मैं' अपना महत्त्व खो देता है और स्वयं को गौण कर लेता है। यह **'अहं-मैं'** ही वास्तविक समस्या है और यही समस्त क्लेशों की मूल जड़ है। समाज के हर कोने में समस्याएँ विद्यमान प्रतीत होती हैं। चारों ओर प्रतिरोध और हिंसा का वातावरण है; संपूर्ण संसार एक युद्धभूमि की भांति दिखाई देता है और इस सब का मूल कारण यही अहंकारी 'मैं' है। लोग यह सोचने लगते हैं कि वे स्वयं पूर्ण हैं और अन्य लोग दोषपूर्ण हैं; वे दूसरों पर अपने विचारों को थोपने का प्रयास करते हैं। यही मौलिक समस्या है। यह अहं-मैं हमारी समस्त गतिविधियों का मुख्य चालक है, जो हमारे आचरण और क्रियाओं को नियंत्रित करता है। > ### ज्ञानदीक्षा टिप्पणी : अहं-वृत्ति और अज्ञान > "अहम्" या "मैं" चित्त की एक वृत्ति है जो अनुभवों को अपना मान लेती है। जब तक व्यक्ति स्वयं को केवल मनोशरीर-यंत्र मानता है, तब तक स्वार्थ, भय और संघर्ष उत्पन्न होता है। परिवार में त्याग के समय अहम्-वृत्ति क्षण भर के लिए शिथिल हो जाती है, जिससे शांति का अनुभव होता है। ज्ञानमार्ग का उद्देश्य इस अहं-वृत्ति के मिथ्यात्व को समझकर इसका समूल नाश करना है। --- इसलिए इन प्रश्नों का उत्तर खोजना अत्यंत आवश्यक है: * यह **'मैं'** क्या है? * इस **अहं-मैं** का आधार क्या है? * यह समस्याकारक क्यों है? * यह हमारे समस्त कर्मों का प्रधान चालक क्यों बना हुआ है? समस्त ऋषियों और गुरुओं ने किसी न किसी रूप में इस 'मैं' का स्पर्श किया है। **"मैं कौन हूँ"** रमण महर्षि का केंद्रीय दर्शन है और उन्होंने इसे ही अपनी शिक्षण-विधि बनाया। यह शब्द संपूर्ण विश्व में विख्यात हो गया। इस प्रश्न ने न केवल उन्हें अपितु उनके निवास स्थान (तिरुवन्नमलई) को भी प्रसिद्धि दिलाई। रमण महर्षि के देहावसान के पश्चात भी यह प्रश्न लोगों के मन में जीवित है और उन्हें रमण आश्रम की ओर आकर्षित करता है। जे. कृष्णमूर्ति ने भी इस विषय को अपने अनूठे ढंग से प्रस्तुत किया। उन्होंने इसे एक भिन्न दृष्टिकोण से देखा और कहा **"दृष्टा ही दृश्य है" ।** हमारे वेदों में भी 'मैं' के विषय में अनेक सूत्र अंकित हैं; उनमें से एक प्रमुख सूत्र है **"अहं ब्रह्मास्मि"** (अर्थात: मैं ही ब्रह्म हूँ, मैं ही सब कुछ हूँ)। हमारे समस्त आध्यात्मिक शास्त्र यह कहते हैं कि अपनी मूल, शुद्ध अवस्था में हम 'आत्मा' हैं। 'मैं' कोई शरीर या मन नहीं है; 'मैं' शुद्ध, अमर आत्मा है। यहाँ दो विरोधाभासी सिद्धांत प्रतीत होते हैं: 1. **क्या 'मैं' आत्मा, ब्रह्म या ईश्वर है?** *अथवा* 2. **क्या यह केवल एक अहं-केंद्रित अवस्था (अहंकार) है? क्या यह माया है और यही हमारी समस्त समस्याओं का कारण है?** ये दोनों विचार एक-दूसरे के विरोधी प्रतीत होते हैं, जिससे साधक भ्रमित हो जाता है कि किसे सत्य माना जाए। इसे एक दृष्टांत से समझते हैं। मान लीजिए हम स्वप्न देख रहे हैं। स्वप्न में हम तिरुवन्नमलई जाते हैं, रमण आश्रम के दर्शन करते हैं, गिरिवलम (परिक्रमा) करते हैं, पहाड़ियों और मंदिरों में जाते हैं। परंतु यह सब वास्तविक नहीं होता। स्वप्न हमें यह विश्वास दिलाता है कि यह सब हमारे सामने घटित हो रहा है। जब तक हम जाग नहीं जाते, तब तक हम उस स्वप्न को पूर्णतः सत्य मानते रहते हैं और उसमें भाग भी लेते हैं। > ### ज्ञानदीक्षा टिप्पणी : दृश्य-दृष्टा विवेक और अद्वैत > "दृश्य-दृष्टा विवेक" अद्वैत का मूलभूत नियम है। जो दिखाई देता है (दृश्य/अनुभव), वह देखने वाला (दृष्टा/अनुभवकर्ता) नहीं हो सकता। रमण महर्षि का "मैं कौन हूँ" वास्तव में दृश्य से ध्यान हटाकर दृष्टा (अनुभवकर्ता) में स्थित होने की प्रक्रिया है। कृष्णमूर्ति का "दृष्टा ही दृश्य है" इस बात को रेखांकित करता है कि मन के धरातल पर दृष्टा और दृश्य दोनों ही विचारों (तन्मात्राओं) से निर्मित हैं। --- स्वप्न में हम जिन लोगों से मिलते हैं और जिन स्थानों पर जाते हैं, वे सब हमारे अपने ही विचारों से निर्मित होते हैं। स्वप्न का एकमात्र कारण हमारे अपने विचार हैं। निद्रा के समय उभरने वाले विचारों को ही 'स्वप्न' कहा जाता है। जाग्रत अवस्था में चलने वाली विचार-प्रक्रिया को हम 'विचार' कहते हैं और निद्रा की अवस्था में चलने वाली विचार-प्रक्रिया को 'स्वप्न' कहते हैं। स्वप्न की समस्त घटनाएँ विचार-प्रक्रिया में ही घटित होती हैं। हम स्वप्न में अपनी उपस्थिति पहचानते हैं और विविध गतिविधियों में संलग्न होते हैं। हम स्वयं को देखने वाले (दृष्टा/साक्षी) के रूप में देखते हैं और सामने दृश्यों (चीजों, लोगों, स्थानों) को देखते हैं। वहाँ अहं-मैं भी उपस्थित रहता है और उसके कर्म भी। परंतु यह सब विचारों से ही बना है। दृष्टा और दृश्यदोनों हमारे अपने विचारों के दो भिन्न रूप हैं। जब तक स्वप्न समाप्त नहीं होता, हम उस कहानी में पूर्ण भूमिका निभाते हैं। किसी क्षण हम आश्रम जाने वाले यात्री होते हैं, तो किसी क्षण मंदिर जाने वाले या मित्रों से बात करने वाले व्यक्ति। परंतु जब तक हम जाग नहीं जाते, हम स्वयं को स्वप्नदृष्टा के रूप में नहीं देख पाते। वास्तविकता यह है कि हम स्वप्न देखने वाले व्यक्ति हैं। जागने पर ही हमें अपनी वास्तविक अवस्था का बोध होता है। स्वप्न के भीतर हम केवल एक पात्र (किरदार) बनकर रह जाते हैं, उस दृष्टा को नहीं देख पाते जो उस संपूर्ण स्वप्न-संसार का रचयिता है। स्वप्न के सभी पात्र, स्थान और वस्तुएँ उस स्वप्नदृष्टा का ही प्रतिनिधित्व करती हैं। वह दृष्टा उन सब के पीछे छिपा हुआ है। > ### ज्ञानदीक्षा टिप्पणी : अनुभवकर्ता और चित्तनिर्मित माया > अनुभवकर्ता (साक्षी) अद्वैत का वह आयामहीन पर्दा है जिस पर सभी अनुभव प्रकट होते हैं। जैसे स्वप्नदृष्टा अपने ही विचारों से स्वप्न का संसार रचता है और स्वयं को उसका एक छोटा पात्र मान लेता है, वैसे ही जाग्रत अवस्था में मनुष्य चित्तनिर्मित माया को सत्य मानकर उसमें लिप्त हो जाता है। --- आइए विद्यालय के दिनों का एक उदाहरण लें। परीक्षा के पश्चात हमें अंक मिलते हैंजैसे अंग्रेजी में ७०, गणित में ८० और विज्ञान में ९०। यद्यपि हम केवल ७०, ८० या ९० कहते हैं, परंतु इसके पीछे एक अंतर्निहित तथ्य होता है: ७० अंक का अर्थ है १०० में से ७० अंक। यह १०० का कुल अंक पीछे अप्रत्यक्ष रूप से विद्यमान रहता है। इसी प्रकार, जब हम अपनी माता को देखते हैं, तो हमारे भीतर अप्रत्यक्ष रूप से यह बोध उभरता है कि "मैं इनका पुत्र हूँ"। हम स्वयं को सीधे केवल पुत्र के रूप में नहीं देखते, बल्कि माता को देखते ही पुत्र की भूमिका स्वतः निर्मित हो जाती है। जब हम पत्नी को देखते हैं, तो हम पति की भूमिका में आ जाते हैं। जैसे ६० अंक के पीछे १०० का पूर्णांक छिपा होता है, वैसे ही हम जिस दृश्य को देखते हैं, हमारे भीतर तदनुरूप दृष्टा निर्मित हो जाता है। **दृश्य वस्तु या व्यक्ति हमारे भीतर एक प्रासंगिक दृष्टा को जन्म देता है।** इसलिए परिस्थिति के अनुसार यह दृष्टा भिन्न-भिन्न भूमिकाएँ लेता रहता है। दृश्य वस्तु हर क्षण बदलती रहती है, इसलिए दृष्टा (भूमिका) भी बदलता रहता है। अनुभव निरंतर बदलते रहते हैं, अतः अनुभव करने वाला मैं भी प्रतिपल बदलता रहता है। स्वप्न में यद्यपि स्वप्न-दृष्टा ही मुख्य कारण है, परंतु वह प्रकट रूप से सामने नहीं आता। इसी प्रकार, जाग्रत अवस्था में यद्यपि साक्षी ही समस्त घटनाओं का आधार है, परंतु वह प्रत्यक्ष रूप से प्रकट नहीं होता। इसे चलचित्र के पर्दे से समझा जा सकता है। पर्दे पर अनेक चित्र दिखाई देते हैं, परंतु यदि पर्दे को हटा दिया जाए, तो कोई चित्र नहीं दिख सकता। केवल पर्दा ही वास्तविक (अचल) है; उस पर दिखने वाले चित्र केवल छाया-मात्र हैं। फिर भी हमारी दृष्टि केवल चित्रों पर टिकती है, उस आधारभूत पर्दे पर नहीं। हम केवल क्षणिक घटनाओं पर ध्यान देते हैं। यदि हम इन अस्थाई घटनाओं को ही पर्दा (सत्य) मान लें, तो यह भूल होगी। सिनेमा और पर्दा भिन्न हैं। पर्दे को कोई समस्या नहीं होती; संघर्ष केवल चलचित्र के पात्रों (नायक और खलनायक) के बीच होता है। चलचित्र के चलने से पर्दे पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। > ### ज्ञानदीक्षा टिप्पणी : अपरिवर्तनीय अनुभवकर्ता (तत्त्व) > जो बदल जाता है, वह असत्य (मिथ्या) है; जो कभी नहीं बदलता, वह तत्त्व (सत्य) है। चलचित्र के चित्र "अनुभव" हैं जो निरंतर बदलते हैं, और सिनेमा का पर्दा "अनुभवकर्ता" है जो सदा निर्लिप्त, अचल और शांत रहता है। समस्या मन (चित्रों) में होती है, अनुभवकर्ता (पर्दे) में नहीं। --- मन ही वह दृश्य है जो हम सभी को स्पष्ट रूप से दिखाई देता है और समस्त समस्याएँ इसी मन में स्थित हैं। साक्षी (आत्मा) इस मन का आधार है। सामान्यतः यह माना जाता है कि यदि हम यह अनुभव कर लें कि हम 'आत्मा' हैं, तो हम समस्त दुखों से मुक्त हो जाएँगे। जिस प्रकार पर्दा चलचित्र से अप्रभावित रहता है, उसी प्रकार आत्मा मन की हलचलों से निर्लिप्त रहती है। यद्यपि आत्मा का बोध (आत्मज्ञान) ही सच्चा समाधान प्रतीत होता है, परंतु व्यावहारिक रूप से "आत्मा का साक्षात्/दर्शन" करने का प्रयास निष्फल सिद्ध होता है। हमने ऐसा कोई व्यक्ति नहीं देखा जिसने ऐसा करके अपनी समस्याओं का स्थायी अंत कर लिया हो। कोई भी दावे के साथ यह नहीं कह सकता कि उसने आत्मा को 'देख' लिया है और वह सर्वथा निष्क्लेश हो गया है। जो ऐसा दावा करते हैं, वे भी बाद में विरोधाभासी बातें करने लगते हैं, जिससे साधकों में भ्रम उत्पन्न होता है। रमण महर्षि कहते हैं: **"हमें विचार करके यह जानना चाहिए कि हम आत्मा हैं। जब हम आत्मा का स्वरूप जान लेते हैं, तब समस्त प्रश्न और भ्रम समाप्त हो जाते हैं।"** जब किसी ने उनसे पूछा कि "आत्म-दर्शन" का वास्तविक अर्थ क्या है, तो उन्होंने स्पष्ट किया: **"वास्तविकता में 'आत्म-दर्शन' या 'आत्म-साक्षात्कार' जैसी कोई दृश्य घटना नहीं होती। ये केवल अवधारणा को समझाने के लिए प्रयोग किए गए शब्द हैं। अज्ञान के विनाश को ही आत्म-दर्शन या आत्म-साक्षात्कार कहा जाता है। हम आत्मा को आँख से देख नहीं सकते या इसकी कल्पना भी नहीं कर सकते।"** > ### ज्ञानदीक्षा टिप्पणी : अज्ञेयता और अज्ञान का नाश > आत्मा कोई दृश्य वस्तु नहीं है जिसका प्रत्यक्ष अनुभव (इंद्रियों द्वारा) किया जा सके। आत्मा स्वयं अनुभवकर्ता है। ज्ञान का अर्थ कुछ नया पाना या देखना नहीं है, बल्कि "अज्ञान का नाश" है। जब यह भ्रम मिट जाता है कि "मैं शरीर या मन हूँ", तो जो शेष बचता है वही आत्म-स्वरूप है। इसे ही अज्ञेयवाद या अज्ञान-निवृत्ति कहते हैं। --- आत्मा की भौतिक रूप से कल्पना करना एक असंभव कार्य है। यदि कोई कहे कि वह सूर्य पर जाकर रहेगा और वापस आ जाएगा, तो क्या आप विश्वास करेंगे? उसी प्रकार आत्मा को किसी वस्तु की भांति देखना भी असंभव है। केवल यह समझ लेना पर्याप्त है कि **मनोशरीर एक क्षणिक परिघटना है और विचार स्वतः उत्पन्न होकर स्वयं ही विलीन हो जाते हैं।** इसी बोध को 'आत्म-साक्षात्कार' कहते हैं। समस्त समस्याओं के समाधान की आवश्यकता केवल मन को होती है, क्योंकि दुख और क्लेश केवल मन के धरातल पर हैं। आत्मा को सीधे देखने का प्रयास मरीचिका के पीछे भागने के समान है। यदि कोई व्यक्ति आकाश के संपर्क में आने के लिए कई मंजिलें ऊपर चढ़ता है, तो यह उसकी अज्ञानता है। हम भूमि पर रहते हुए भी आकाश के ही भीतर हैं। हमें आकाश का अनुभव करने के लिए कहीं जाने की आवश्यकता नहीं है। यद्यपि सब कुछ आत्मा का ही रूप है, परंतु हमें प्रत्यक्ष रूप से केवल मन दिखाई देता है। अब प्रश्न यह है कि मन की समस्याओं का समाधान कैसे हो? अपने युवावस्था के दिनों में मैं जे. कृष्णमूर्ति के व्याख्यान सुना करता था। उनकी सरल शैली मुझे बहुत प्रभावित करती थी। बुद्ध के काल में बुद्ध ने पुरानी मान्यताओं को तोड़कर सरल मार्ग दिखाया था; उसी प्रकार जे. कृष्णमूर्ति ने भी एक नया दृष्टिकोण प्रदान किया। उन्होंने विश्लेषण करके कहा: **"भय ही हमारी समस्त समस्याओं की मूल जड़ है। यदि हम भय की प्रकृति को गहराई से समझ लें, तो हम दुखों से मुक्त हो सकते हैं। किसी भी अवांछित, असंतुलित भावना को गहराई से समझकर ही समाप्त किया जा सकता है।"** वे कहा करते थे: "यदि आप मेरी बात को ध्यानपूर्वक सुनेंगे और समझ लेंगे, तो आप घर लौटते-लौटते पूर्णतः मुक्त हो सकते हैं।" हम सोचते थेक्या यह इतना सरल है? हम वर्षों से संघर्ष कर रहे हैं फिर भी दुखों से मुक्त नहीं हो पाए। परंतु कृष्णमूर्ति कहते थे"यदि एक बार इसे स्पष्ट रूप से समझ लिया जाए, तो समस्याएँ सदा के लिए समाप्त हो जाएँगी।" > ### ज्ञानदीक्षा टिप्पणी : मनन की प्रक्रिया > श्रवण के पश्चात "मनन" आवश्यक है। मनन का अर्थ हैसुने गए ज्ञान का अपने अपरोक्ष अनुभव और तर्क से सत्यापन करना। जब हम भय या शोक का निष्पक्ष होकर अवलोकन करते हैं, तो ज्ञात होता है कि वे केवल क्षणिक विचार-तरंगें हैं। उनका कोई स्थायी अस्तित्व नहीं है। --- कृष्णमूर्ति दुखों के मूल कारण को चरणबद्ध रूप से समझाते थे। उनकी बातों को सुनकर क्षण भर के लिए व्यक्ति को मुक्ति का अनुभव होता था और लगता था कि समस्या समाप्त हो गई। परंतु कुछ ही दिनों में वही समस्याएँ पुनः लौट आती थीं। भय, शोक और चिंताओं का पुनरागमन होने लगता था। कृष्णमूर्ति कहते थे कि मुक्ति स्थायी होती है, परंतु व्यावहारिक जीवन में ऐसा नहीं हो रहा था। साधक सोचने लगता"क्या मेरी समझ में कोई कमी रह गई? क्या मुझे और गहराई में उतरना होगा? क्या मुझे और अधिक प्रयास करना चाहिए?" इसे एक दृष्टांत से समझिए: एक बार मैं अपने मित्र के घर गया और पीने के लिए जल माँगा। जल का गिलास लाने के स्थान पर वह मित्र कुदाल और फावड़ा लेकर आ गया और बोला"आओ, यहाँ कुआँ खोदो, और जितना जल चाहिए पी लो।" ऐसी स्थिति में कोई क्या कहेगा? कृष्णमूर्ति कहते हैं कि आत्म-बोध होने पर समस्त समस्याएँ मिट जाती हैं। परंतु क्या केवल एक गिलास जल पीने (छोटी मानसिक समस्याओं को सुलझाने) के लिए पूरा कुआँ खोदना (परम आत्म-ज्ञान पाना) व्यावहारिक है? क्या एक घंटे के व्याख्यान से कोई रातों-रात प्रबुद्ध हो सकता है? जब मुझे स्वयं आत्मज्ञान प्राप्त हुआ, तब मुझे उनकी बात की सत्यता समझ में आई। आत्मबोध वास्तव में एक अत्यंत सरल घटना है और कृष्णमूर्ति जो कहते थे, वह पूर्णतः सत्य था। परंतु समस्या उनके संदेश को संप्रेषित करने की शैली में थी, जिसके कारण लोग उसके व्यावहारिक मर्म को ग्रहण नहीं कर पाते थे। स्वयं कृष्णमूर्ति ने भी अपने अंतिम दिनों में हताशा में कहा था: **"मैं ६० वर्षों से आप लोगों से बात कर रहा हूँ, परंतु ऐसा प्रतीत होता है कि कोई भी मेरी बात के वास्तविक मर्म को नहीं समझ पाया।"** मैंने पिछले ७ वर्षों में इसी सत्य को सरल रूप में साझा किया है और ३०० से अधिक लोग इससे लाभान्वित हुए हैं। यह केवल मेरा व्यक्तिगत प्रयास नहीं, बल्कि हमारी पूरी इकाई का सामूहिक प्रयास है। इसे रिले रेस के उदाहरण से समझा जा सकता है। १५०० मीटर की रिले दौड़ में ३ धावक भाग लेते हैं। पहला धावक ५०० मीटर दौड़कर बैटन दूसरे को देता है, दूसरा ५०० मीटर दौड़कर तीसरे को देता है, और तीसरा धावक अंतिम ५०० मीटर पूरा करके विजय रेखा को पार करता है। यद्यपि अंतिम रेखा तीसरे धावक ने छुई, परंतु श्रेय तीनों को जाता है। > ### ज्ञानदीक्षा टिप्पणी : गुरु-परंपरा और संचरण > ज्ञानमार्ग एक सतत परंपरा है जहाँ एक प्रबुद्ध मनुष्य दूसरे को दिशा दिखाता है। कृष्णमूर्ति ने पुरानी मान्यताओं का खंडन किया, परंतु साधारण साधक के लिए व्यावहारिक साधना (स्मरण व साक्षीभाव) का सेतु आवश्यक था। ज्ञान किसी की निजी संपत्ति नहीं है; यह एक संयुक्त प्रयास है। --- हमारा मन सदैव **'खोज'** की मुद्रा में रहता है। यदि हम दुख में होते हैं, तो सुख की खोज करने लगते हैं; यदि समस्या में होते हैं, तो समस्या-रहित स्थिति की तलाश करने लगते हैं। यह खोजने की मानसिकता ही हमारी समस्त समस्याओं की मूल जड़ है। यदि यह 'खोज' ही समस्या है, तो क्या हमें कुछ भी नहीं खोजना चाहिए? क्या कोई लक्ष्य नहीं होना चाहिए? हमारा खोजना ही दुखों को जन्म देता है। हम दुख-रहित अवस्था, आनंद या आत्मा की स्थिति को खोजते हैं। नाम बदल जाते हैं, परंतु 'खोजने का भाव' वही रहता है। धन-संपत्ति की खोज करना और मोक्ष/ज्ञान की खोज करनादोनों में मन की संरचना एक ही रहती है। **सच्चा विवेक इसमें है कि यह समझ लिया जाए कि हमें किसी अंतिम अवस्था तक नहीं पहुँचना है।** यहाँ 'ज्ञान/आत्मबोध' का अर्थ ही यह समझना है कि पहुँचने के लिए कोई मानसिक लक्ष्य है ही नहीं। हम दूध के स्वाद को तब तक नहीं समझ सकते जब तक स्वयं उसका आस्वादन न कर लें। दूसरों का वर्णन केवल बौद्धिक होता है। हम अध्यात्म में भी इसी प्रकार के प्रत्यक्ष अनुभव की अपेक्षा करने लगते हैं। हम एक कल्पना बना लेते हैं कि हमें किसी विशेष दिव्य स्थिति में पहुँचना है और फिर उसकी खोज में निकल पड़ते हैं। परंतु जब हमें यह बोध होता है कि **पहुँचने के लिए कोई लक्ष्य नहीं है**, तब हम मन की व्यर्थ हलचलों और विचारों को उपेक्षा करना सीख जाते हैं। यह समझना कि "कोई लक्ष्य नहीं है"यह दूध चखने जैसा कोई भौतिक अनुभव नहीं है, बल्कि यह एक **विशुद्ध बौद्धिक खोज** है। यह गणित के किसी प्रश्न को बुद्धि से हल करने के समान एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण है। जब हम यह समझ लेते हैं कि करने के लिए कुछ भी शेष नहीं है, तो मुक्ति स्वतः हो जाती है और मन के बंधन ढीले पड़ जाते हैं। **इस बोध को 'ज्ञान' कहते हैं और इसके परिणाम को 'मुक्ति'।** परंतु जब हम इस 'मुक्ति' को पाने के लिए प्रयास या खोज आरंभ कर देते हैं, तो वह रुक जाती है। खोज को विराम देने पर ही दुखों का अंत होता है। हमारा प्रयास और संघर्ष ही समस्या को जीवित रखता है। जब संघर्ष छूट जाता है, तो समस्याएँ स्वयं समाप्त हो जाती हैं। > ### ज्ञानदीक्षा टिप्पणी : अज्ञेयवाद और निरभिलाषा > "ज्ञानमार्ग में कुछ मिलता नहीं, सब खो जाता है।" जब साधक यह जान लेता है कि आत्मा कोई प्राप्त की जाने वाली वस्तु नहीं है, बल्कि वह स्वयं उसका स्वभाव है, तो भविष्य की समस्त आध्यात्मिक खोज समाप्त हो जाती है। यही अज्ञेयवाद और पूर्ण विश्रांति की अवस्था है। --- इसे एक वाद्य यंत्र**पियानो** के उदाहरण से समझते हैं। पियानो में अनेक कुंजियाँ होती हैं। जब हम किसी कुंजी को दबाते हैं, तो एक ध्वनि उत्पन्न होती है। वह ध्वनि कितने समय तक रहती है? केवल एक क्षण के लिए, और फिर वह स्वयं समाप्त हो जाती है। परंतु यदि हम उस ध्वनि को बंद करने के लिए उस कुंजी को बार-बार दबाएँ, तो क्या होगा? वह ध्वनि बंद होने के स्थान पर बार-बार बजेगी। हमारे मन की भावनाएँ और समस्याएँ भी इसी प्रकार कार्य करती हैं। परिस्थितियों के अनुसार विचार और भावनाएँ स्वतः उत्पन्न होती हैं और उनका जीवन केवल **एक क्षण** का होता है। परंतु उन्हें भगाने या ठीक करने के प्रयास में, हम उस 'कुंजी' को बार-बार दबाते हैं, जिससे हम उन विचारों को नया जीवन दे देते हैं और उन्हें लंबे समय तक टिकाए रखते हैं। यदि हम उन्हें भगाने का कोई प्रयास न करें, तो वे विचार एक क्षण में स्वयं समाप्त हो जाएँगे। हम किसी विचार या भावना को तभी जान पाते हैं जब वह बाहर जाने के मार्ग पर होती है (अर्थात जब वह नष्ट हो रही होती है)। जिस क्षण हमें किसी विचार का बोध होता है, वह वास्तव में मर चुका होता है। परंतु हम भ्रमवश यह मान लेते हैं कि वह विचार हमारे भीतर स्थायी रूप से बैठ गया है और हम उसे भगाने का निष्फल प्रयास करने लगते हैं। यह वैसा ही है जैसे संगणक (Computer) के 'ट्रैश बिन' (Trash Bin/कचरा पात्र) में पड़े ईमेल को वापस इनबॉक्स में लाकर उस पर कार्यवाही करने का प्रयास करना। > ### ज्ञानदीक्षा टिप्पणी : विचारों की अनित्यता > सभी मनःस्थिति और विचार परिवर्तनशील हैं। विचार का उत्पन्न होना और नष्ट होना स्वाभाविक है। साधक को नष्ट होते हुए विचारों से युद्ध नहीं करना है, बल्कि केवल साक्षी होकर उन्हें देखना है। --- वर्षारोग में कड़कने वाली बिजली और गड़गड़ाहट का उदाहरण लीजिए। अधिकांश लोग बिजली की कड़क सुनकर भयभीत हो जाते हैं कि वह उन पर गिर जाएगी। परंतु यहाँ एक वैज्ञानिक सत्य समझने योग्य है: **जो गड़गड़ाहट आप सुन रहे हैं, वह आप पर कभी नहीं गिर सकती।** प्रकाश की गति ध्वनि की गति से तीव्र होती है। बिजली पहले ही चमक (गिर) चुकी होती है, उसके कुछ सेकंड पश्चात ध्वनि हमारे कानों तक पहुँचती है। यदि बिजली को आप पर गिरना होता, तो वह चमकते समय ही गिर चुकी होती। जब आप गड़गड़ाहट सुनते हैं, तब तक घटना पूर्णतः समाप्त हो चुकी होती है। इसी प्रकार, स्वप्न में जब हम किसी भयानक स्थिति में फँस जाते हैं, तो हमारी आँख खुल जाती है। जागने के पश्चात भी कुछ मिनटों तक हृदय की धड़कन तीव्र रहती है। क्या हमें उस स्वप्न की भयानक स्थिति को सुलझाने के लिए वापस स्वप्न में जाने की आवश्यकता है? नहीं, क्योंकि स्वप्न समाप्त हो चुका है। इसी प्रकार, हमें अपने विचारों और दुखों का बोध भी तब होता है जब वे **अतीत** बन चुके होते हैं। वे विचार पहले ही समाप्त हो चुके हैं। हम अपनी प्रतिक्रिया और प्रयास द्वारा उन मृत विचारों में पुनः प्राण फूँक देते हैं। हमारा यही संघर्ष समस्त समस्याओं का कारण है। हम यहाँ 'अहं-मैं' की प्रकृति का विश्लेषण कर रहे हैं। निद्रा में 'मैं' का बोध नहीं होता, केवल जाग्रत और स्वप्न अवस्था में 'मैं' का बोध होता है। स्वप्न में भी द्वैत (देखने वाला और देखा जाने वाला) विद्यमान रहता है। हमारे विचारों में **दृष्टा** और **दृश्य** दोनों का बोध एक साथ होता है। ऐसा कोई विचार या भावना नहीं है जिसमें यह द्वैत उपस्थित न हो। यह द्वैत मन का स्वाभाविक गुण है। लोग एक ऐसी स्थिति में पहुँचना चाहते हैं जहाँ 'मैं' पूरी तरह अनुपस्थित हो जाएअर्थात बिना दृष्टा के केवल दृश्य रहे। परंतु यह प्रकृति के नियमों के विरुद्ध और असंभव है। जब तक विचार हैं, तब तक **"दृष्टा-दृश्य"** और **"अनुभवकर्ता-अनुभव"** का द्वैत बना रहेगा। इसे हटाया नहीं जा सकता। > ### ज्ञानदीक्षा टिप्पणी : अद्वैत और द्वैत का सहज स्वीकार > द्वैत (दृष्टा-दृश्य) स्वाभाविक है। जब तक शरीर और मन हैं, तब तक यह प्रतीत होगा। अद्वैत का अर्थ द्वैत को नष्ट करना नहीं, बल्कि यह समझना है कि दृष्टा और दृश्य दोनों एक ही अनुभवक्रिया के दो पहलू हैं। --- द्वैत का स्थायी रूप से बने रहना भी वास्तव में कोई समस्या नहीं है। तो फिर समस्या क्या है? समस्या तब उत्पन्न होती है जब हम **किसी विशेष अनुभव को बनाए रखने (पकड़ने) का प्रयास करते हैं या किसी अप्रिय अनुभव को भगाने का प्रयास करते हैं।** हम सुख को रोककर रखना चाहते हैं और दुख को भगाना चाहते हैं। संपूर्ण जीवन हम इसी संघर्ष में व्यतीत कर देते हैं। इस संघर्ष की उत्तरदायित्व कौन ले रहा है? यह **अहं-मैं** ही इस संघर्ष का दायित्व लेता है। अनुभव करने वाला स्वयं को इसका कर्ता मान लेता है। इस प्रयास से अहं-मैं और अधिक शक्तिशाली हो जाता है। दृष्टा और मजबूत हो जाता है। इसके परिणामस्वरूप दृष्टा और दृश्य के बीच एक निरंतर युद्ध छिड़ जाता है। दृष्टा दृश्य को अपने नियंत्रण में लाने का प्रयास करता है। जैसे किसी परिवार में माता-पिता और बच्चे होते हैं। जब तक वे एक-दूसरे के लिए समर्पण करते हैं, शांति रहती है। परंतु यदि हर सदस्य केवल अपनी व्यक्तिगत इच्छाओं को सर्वोपरि रखने लगे, तो एकता नष्ट हो जाती है और कलह उत्पन्न होता है। उसी प्रकार, जब हम अपने अनुभवों को सुधारने का प्रयास करते हैं, तो दृष्टा और दृश्य के बीच दूरी बढ़ जाती है। यही संघर्ष अहंकार को पोषण देता है। जब हम यह समझ लेते हैं कि **मानसिक धरातल पर सुधारने या पाने के लिए कुछ भी नहीं है**, तो दृष्टा और दृश्य के बीच एक समरसता स्थापित हो जाती है। अनुभवकर्ता और अनुभव एक-दूसरे में घुल जाते हैं। वास्तविकता में दोनों पहले से ही समरसता में हैंजैसे माता और उसका शिशु। दोनों का पृथक अस्तित्व केवल एक भ्रांति है। > ### ज्ञानदीक्षा टिप्पणी : साक्षीभाव और कर्ताभाव का त्याग > साक्षीभाव का अर्थ है केवल देखना, हस्तक्षेप न करना। जब व्यक्ति अपने विचारों को बदलने या नियंत्रित करने का प्रयास बंद कर देता है, तो कर्ताभाव गिर जाता है। कर्ताभाव के गिरते ही अहं-मैं क्षीण हो जाता है और परम शांति (समरसता) स्वतः प्रकट होती है। --- जब हम कोई मनोवैज्ञानिक लक्ष्य बना लेते हैं, तब दृष्टा और दृश्य एक-दूसरे के विरोधी बनकर खड़े हो जाते हैं। विचारों और भावनाओं को पूरी तरह नियंत्रित करना व्यावहारिक रूप से असंभव है। यह संघर्ष अंतहीन है। जब कोई मनोवैज्ञानिक लक्ष्य नहीं रहता, तो समस्त विचार और भावनाएँ अपना बल खो देती हैं। कोई भी विचार एक क्षण से अधिक नहीं टिकता। विचार स्वतः उत्पन्न होता है और स्वयं मर जाता है। विचार के साथ-साथ उसका अनुभव करने वाला 'मैं' भी क्षणिक हो जाता है। जब अनुभवों का महत्त्व समाप्त हो जाता है, तो 'अनुभव करने वाले मैं' का महत्त्व भी समाप्त हो जाता है। सब कुछ नदी के जल की भांति सहज प्रवाह में बहने लगता है। वहाँ कोई स्थायी रूप से जमने वाली अवस्था नहीं बचती। जब हमारा संपूर्ण तंत्र इस मुक्त प्रवाह में आ जाता है, तो वह **वैश्विक चेतना** के साथ एकरूप हो जाता है। किसी भावना को पकड़कर रखने की चेष्टा वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी अनुचित है। हमारी जिह्वा पर छह प्रकार के स्वाद होते हैंमधुर, लवण, अम्ल, कटु, कषाय, तिक्त। जिह्वा की स्वाद-कलिकाएँ भोजन के अनुसार स्वाद का अनुभव कराती हैं। यदि कोई स्वाद जिह्वा पर स्थायी रूप से ठहर जाए (जैसे केवल मिठास या केवल कड़वाहट बनी रहे), तो इसका क्या अर्थ होगा? इसका अर्थ होगा कि हमारी जिह्वा रोगी हो चुकी है। जिह्वा का स्वाभाविक कार्य केवल स्वाद को प्रतिबिंबित करना है, स्वयं किसी स्वाद को पकड़ना नहीं। इसी प्रकार, हमारी बुद्धि स्वाभाविक रूप से शुद्ध और निर्दोष है। यह एक निष्पक्ष धरातल है जहाँ अनुभव आते हैं और चले जाते हैं। जब हम अनुभवों को बदलने के संघर्ष में उतरते हैं, तो हम मन की सतह पर चिपक जाते हैं। यह समुद्र की लहरों से लड़ने के समान है। लहरें कितनी भी विशाल क्यों न हों, यदि हम झुक जाएँ (समर्पण कर दें), तो लहर ऊपर से निकल जाएगी। परंतु यदि हम उससे लड़ेंगे, तो डूब जाएँगे। > ### ज्ञानदीक्षा टिप्पणी : जिह्वा और चित्त की शुद्धता > जैसे शुद्ध जिह्वा हर स्वाद को बिना चिपके प्रकट करती है, वैसे ही शुद्ध चित्त (बुद्धि) हर विचार और अनुभव को बिना किसी आसक्ति या द्वेष के केवल प्रकाशित करता है। विचारों को रोकना नहीं है, केवल उन्हें जिह्वा के स्वाद की भांति बहने देना है। --- हमारे विचार और भावनाएँ भी समुद्र की तरंगों की भांति आते हैं और स्वयं शांत हो जाते हैं। हमें उनमें सुधार करने की कोई आवश्यकता नहीं है। **किसी लक्ष्य को पकड़कर रखना ही वास्तविक समस्या है।** यह खोज लेना कि **"पहुँचने के लिए कोई लक्ष्य नहीं है"** ही सच्चा विवेक है। यह खोज बौद्धिक स्तर पर होती है, परंतु यह बोध मन के लिए पर्याप्त है। यदि हम समझ लें कि १० + २ = १२ होता है, तो यह ज्ञान पर्याप्त है। परंतु यदि हम संदेह करने लगें कि यह ११ या १३ भी हो सकता है, तो भ्रम बना रहेगा। इसे एक अन्य उदाहरण से समझें: मैंने अपने मोबाइल में मित्र का संपर्क नंबर सहेजा था, परंतु जब उसका फोन आता, तो नाम प्रदर्शित नहीं होता था। मैं सेवा केंद्र गया। कर्मचारी ने जाँच करके बताया कि मैंने एक ही नंबर को दो भिन्न नामों से सहेज रखा था, इसीलिए फोन भ्रमित हो जाता था। जैसे ही एक नाम हटाया गया, नाम सही प्रदर्शित होने लगा। इसी प्रकार, हमारी बौद्धिक खोज में कोई दोष नहीं है, परंतु हमें उस बोध के विपरीत कोई दूसरा संदेहात्मक विचार खड़ा नहीं करना चाहिए। जब यह स्पष्ट हो जाए कि कोई लक्ष्य नहीं पाना है, तो समस्त आध्यात्मिक प्रयासों को त्याग देना चाहिए। आध्यात्मिक जगत् में **"शांत/स्थिर रहो"** शब्द का प्रयोग होता है। परंतु लोगों ने इसका गलत अर्थ निकाल लिया हैवे सोचते हैं कि इसका अर्थ कोई कार्य न करना या आलसी बनकर बैठ जाना है। 'स्थिर रहने' का अर्थ बाहरी या आंतरिक गतिविधियों को रोकना नहीं है। इसका अर्थ केवल यह है कि **मनोवैज्ञानिक रूप से हमारे लिए कोई लक्ष्य नहीं है।** स्वयं को सुधारने की मनोवैज्ञानिक स्पृहा का अंत ही वास्तविक स्थिरता है। जब हम मनोवैज्ञानिक रूप से मुक्त हो जाते हैं, तो मन एक भिन्न आयाम में कार्य करने लगता है। जो मन अब तक 'खोज' में लगा था, वह अब **'लक्ष्यहीनता'** में आ जाता है। > ### ज्ञानदीक्षा टिप्पणी : निदिध्यासन और मनोवैज्ञानिक विश्रांति > "अकर्मता" का अर्थ निष्क्रिय होना नहीं, बल्कि चित्त की उस विश्रांति से है जहाँ अहं-मैं किसी परिणाम की प्रतीक्षा नहीं करता। जब तक साधक परिणाम की खोज में रहता है, अज्ञान बना रहता है। खोज का रुकना ही निदिध्यासन है। --- एक बार मेरे एक मित्र ने, जिसने मेरी पुस्तकें पढ़ी थीं, मुझे फोन किया और कहा"आपकी पुस्तकें पढ़ते-पढ़ते मेरा मन अचानक काम करना बंद कर गया है।" मैंने उससे पूछा"यदि तुम्हारा मन बंद हो गया है, तो तुम मुझसे फोन पर बात कैसे कर रहे हो? वास्तव में तुम्हारा 'खोजने वाला मन' रुक गया है और अब वह एक उच्च आयाम में कार्य कर रहा है। इसीलिए तुम्हें लग रहा है कि मन रुक गया है। यही मन की सही और स्वाभाविक कार्यप्रणाली है।" जब खोज समाप्त होती है, तो विचार और भावनाएँ जड़ नहीं रहती। वे स्वतः प्रवाहित होते हैं और स्वयं शुद्ध होते रहती हैं। वर्षों से सताने वाली पुरानी ग्रंथियां भी स्वयं विलीन हो जाती हैं। यह मुक्त आंतरिक अवस्था हमारे बाह्य जीवन में भी अत्यंत सहायक सिद्ध होती है। यह हमें अपने व्यावहारिक कार्यों को अधिक कुशलता और सूक्ष्मता से करने में सक्षम बनाती है। मन के लिए कोई भी भावना 'अच्छी' या 'बुरी' नहीं होती। मन का मूल ढांचा पूर्णतः आवश्यक और सही है। इसे संगीत वाद्य के उदाहरण से समझें: जब कोई अनाड़ी व्यक्ति वाद्य का कोई बटन दबाता है, तो बेसुरी ध्वनि निकलती है। यदि वह सोचे कि उस बटन में कोई दोष है और उसे उखाड़ फेंके, और फिर दूसरा बटन दबाए तो पुनः बेसुरी ध्वनि निकलेगी। यदि वह एक-एक करके सारे बटन उखाड़ देगा, तो वाद्य ही नष्ट हो जाएगा। वाद्य के लिए सभी कुंजियाँ आवश्यक हैं। उसी प्रकार, **हमारे मन के लिए समस्त प्रकार की भावनाएँ और विचार आवश्यक हैं।** बाह्य जीवन के संचालन के लिए भय, क्रोध, करुणा आदि सभी भावनाओं की आवश्यकता पड़ती है। मन के स्तर पर भावनाओं में कोई नैतिक भेद (अच्छा/बुरा) नहीं होता। समस्या केवल इसमें है कि हम उन्हें कैसे संभालते हैं। जब हम भीतर से मुक्त होते हैं, तो हम हर भावना का उचित उपयोग करना सीख जाते हैं। > ### ज्ञानदीक्षा टिप्पणी : भावनाओं की उपयोगिता और स्वतंत्रता > ज्ञानमार्गी किसी भावना से घृणा नहीं करता। भय, क्रोध या शोकये सब उत्तरजीविता के लिए निर्मित प्राकृतिक साधन हैं। जब साधक भीतर से साक्षी हो जाता है, तो भावनाएँ उस पर हावी नहीं होतीं, बल्कि वह आवश्यकतानुसार उनका व्यावहारिक प्रयोग करके पुनः शांत अवस्था में लौट आता है। --- चूँकि सभी विचार और भावनाएँ स्वतः उत्पन्न होकर नष्ट होती हैं, इसलिए हमें किसी 'बुरे विचार' के दुष्प्रभावों से भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है। बौद्धिक स्तर पर हमें स्पष्ट रहता है कि किस परिस्थिति में किस भावना का उपयोग करना है। जब हम भीतर से मुक्त हो जाते हैं, तो सुलझाने के लिए कोई आंतरिक समस्या नहीं बचती। **जब मन के बंधन कट जाते हैं, तो बाह्य समस्याएँ भी अपना बल खो देती हैं।** यदि कोई प्रतिकूल परिस्थिति हमारे भीतर दुख या चिंता उत्पन्न न कर सके, तो वह परिस्थिति हमारे लिए समस्या नहीं रह जाती। इससे बाह्य व्यावहारिक समस्याओं को सुलझाना भी अत्यंत सरल हो जाता है। जब हम यह समझ लेते हैं कि पहुँचने के लिए कोई मनोवैज्ञानिक लक्ष्य नहीं है, तो हमारे समस्त अनुभव अपना महत्त्व खो देते हैं। जब अनुभव महत्त्वहीन हो जाते हैं, तो **'अनुभव से तादात्म्य करने वाला मैं' भी निष्प्रभ हो जाता है।** हमारा संपूर्ण जीवन बिना किसी अहंकार के एक नए आयाम में चलने लगती है। हमारी संपूर्ण कार्यप्रणाली उस दिव्य वैश्विक व्यवस्था का एक सहज अंग बन जाती है। --- # श्री भगवत् की अन्य प्रमुख पुस्तकों का विवरण *(मूल पुस्तक के पृष्ठ ३६ से ४० का अनुवाद)* ### १. Dont Delay Enlightenment (ज्ञानोदय में विलंब न करें) यह लघु पुस्तक आत्म-ज्ञान के मर्म को अत्यंत संक्षिप्त रूप में समेटे हुए है। प्रकृति ने इस युग की समस्याओं के समाधान हेतु इस पुस्तक की रचना की है। अनेक साधकों ने इसके अध्ययन से परम बोध प्राप्त किया है। यह पुस्तक जर्मन, इतालवी, रूसी, हिब्रू, तमिल, हिंदी आदि अनेक भाषाओं में अनुदित हो चुकी है तथा ऑडियो पुस्तक के रूप में भी उपलब्ध है। ### २. Smash Your Sorrow (दुखों का भंजन करें) दुख हमारे जीवन को नष्ट करने वाला एक मुख्य दोष है, जो स्वस्थ व्यक्ति को भी जर्जर कर देता है। यदि हम दुखों से मुक्त हो जाएँ, तो हमारा जीवन एक वरदान बन जाता है। यह पुस्तक मन का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण करके दुखों की मूल जड़ को उखाड़ फेंकने का मार्ग दर्शाती है। ### ३. Give up Meditation ! Get Enlightenment ? (ध्यान छोड़ें! ज्ञान पाएँ?) क्या हम यह नहीं मानते कि केवल ध्यान करने से परम बोध मिल जाएगा? दुर्भाग्य से केवल ध्यान से परम ज्ञान नहीं मिलता! प्रारंभिक अवस्था के लिए ध्यान उत्तम है, परंतु जब तक हम ध्यान के पार नहीं जाते, तब तक पूर्ण बोध संभव नहीं है। यह पुस्तक ध्यान से परे के सत्य को सहजता से समझाती है। ### ४. Divine You (दिव्य आप) आप अपने भीतर के दिव्य स्वरूप को खोज सकते हैं। यह 'दिव्य आप' कोई स्थिर या जड़ वस्तु नहीं है, बल्कि यह नित्य-नवीन और सतत प्रवाहमान है। यह पुस्तक श्री भगवत् के साथ साधकों के संवादों और प्रश्नों के उत्तरों का अनूठा संग्रह है। ### ५. Renounce God ! Be God ! (ईश्वर को त्यागें! ईश्वर बनें!) आत्मा या ईश्वर को एक अनसुलझी पहेली माना गया है। क्या हम ईश्वर को जान सकते हैं? शास्त्रों के अनुसार ईश्वर को मन या इंद्रियों से नहीं जाना जा सकता। फिर ईश्वर का अनुभव कैसे हो? यह पुस्तक आत्मा और ईश्वर से जुड़े समस्त विरोधाभासों को दूर कर एक व्यावहारिक मार्ग प्रस्तुत करती है। ### ६. Absolute Reality (परम सत्य) शास्त्रों ने सत्य का वर्णन करने के लिए अनेक जटिल शब्दों का प्रयोग किया है। यदि शब्दों का सही अर्थ न समझा जाए, तो स्पष्टता के स्थान पर भ्रम उत्पन्न होता है। यह पुस्तक बिना किसी भ्रम के परम सत्य को अत्यंत व्यावहारिक रूप से उजागर करती है। ### ७. Karma ? (Fate ?) (कर्म? या भाग्य?) क्या भाग्य या कर्म जैसी कोई वस्तु है? क्या ग्रह-नक्षत्र हमारे जीवन को नियंत्रित करते हैं? क्या ज्योतिष शास्त्र में सत्यता है? क्या मनुष्य के पास स्वतंत्र इच्छा (Free-will) है? पुनर्जन्म का सत्य क्या है? इन समस्त गूढ़ प्रश्नों का वैज्ञानिक और तार्किक विश्लेषण इस पुस्तक में किया गया है। ### ८. Secret of Enlightenment (ज्ञानोदय का रहस्य) इस पुस्तक में शास्त्रीय पारिभाषिक शब्दावली का प्रयोग किए बिना, पूर्णतः वैज्ञानिक दृष्टिकोण से आत्म-बोध के रहस्य को समझाया गया है। इसके प्रकाश में साधक अपने स्वयं के धर्म और आध्यात्मिक सिद्धांतों के छिपे हुए वैज्ञानिक पक्षों को गहराई से समझ सकता है। --- > ### ज्ञानदीक्षा टिप्पणी : अंतिम उपसंहार > श्री भगवत् की यह पुस्तक **"Who Am I"** साधक को किसी नए कर्मकांड या कठिन साधना में नहीं उलझाती, बल्कि अज्ञान के निरसन (नेति-नेति) द्वारा स्वयं के वास्तविक स्वरूप**अनुभवकर्ता (आत्मा)**में विश्रांति पाने का मार्ग दिखाती है। ज्ञानमार्ग का अंतिम निष्कर्ष यही है कि: > * **अस्तित्व = अनुभवकर्ता = ब्रह्म** > * करने के लिए कोई नया लक्ष्य नहीं है; जो है, वह अभी और यहीं है। जब खोजने वाला 'अहं' शांत होता है, तो सहज समाधि स्वतः सिद्ध रहती है।
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