Wise Words
अज्ञान: एकमात्र बंधन
सत्यम
दीवारें जो खड़ी की हैं तुमने वर्षों से तुम्हारे मन में। अपने अज्ञान से, जिनको तुमने हररोज और ज़्यादा मजबूत बनाया है। हर दिन जिनको तुमने सींचा है। केवल उसी अज्ञान के कारण, जो आज इतनी ठोस बन गई है कि ईंट पत्थरों की दीवारें तो कागज के समान है। उनको केवल तुम्हीं तोड़ सकते हो, क्योंकि तुमने ही बनाई थी। और कोई कैसे तोड़ सकता हैं, क्योंकि उनकी ये नहीं हैं। उनको तो दिखेंगी भी नहीं। गुरु का हर शब्द तुम्हारी उसी दीवार पर एक दरार डाल रहा है। तुम्हारी सारी साधना उन्हीं पिंजरों को काटने के लिए है। उन्हीं हथकड़ियों को तोड़ने के लिए है। जो तुमने अज्ञान के कारण पहन ली है। और तुम्हे पता भी नहीं है कि तुम कौनसी कैद में हो। तुम कैद में हो इसीलिए तो आनंदमय नहीं हो, इसी लिए तो शांतिपूर्ण नहीं हो। कुछ है जो तुमको, वो जो तुम होना चाहते हो, उसे होने से रोकता है। वही जो तुमको रोकता है वही बंधन है, उसी को अज्ञान कहते हैं। बस जैसे ही अज्ञान को जाना जाता है, वैसे ही, तभी, उसी क्षण वह अज्ञान नष्ट हो जाता हैं। यानि कि एक बार अज्ञान को अज्ञान रूप में (उसके वास्तविक रूप में) जान लेने पर अज्ञान अपने आप ही नष्ट हो जाता हैं। जैसे: जब एक बार तुमने जाना कि नदी के पानी को माचिस की तीली से जलाया नहीं जा सकता। क्या तुमने कभी प्रयास किया कि नदी में माचिस की एक तीली इस उद्देश्य से डाली हो कि ये सारी नदी जलकर भस्म हो जाएगी। ये कैसी अज्ञानभरी बात है? हां यही तो कहना चाहता हूं कि जैसे ही तुमको पता चलता है कि यह अज्ञान है, फालतू की बात है जिसे मैं ज्ञान मानता फिर रहा था/ रही थी। उसी क्षण तुम उसका त्याग कर देते हो। क्योंकि इससे बड़ी मूर्खता क्या ही होगी, कि तुम्हे पता है कि वह अज्ञान हैं और तुम फिर भी उसका विचार करते हो, उसका चिंतन करते हो, उसको अपनाते हो। कोई नहीं अपनाता। बस एक बार जान लो कि अज्ञान क्या है। जिस क्षण तुमने संपूर्ण अज्ञान को जान लिया। उसी क्षण वह नष्ट हो जाएगा । और जिस क्षण संपूर्ण अज्ञान नष्ट हुआ, उसी क्षण तुम मुक्त हुए। अज्ञान एकमात्र बंधन है। अज्ञान के संपूर्ण नाश के पश्चात जो होता है वो ज्ञान है। और केवल वही ज्ञान है। यह ज्ञान की तरफ एक इशारा मात्र है, उसको मुंह से बोला नहीं जा सकता, उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। ज्ञान में बस हुआ जा सकता हैं। और अंततः तुम पाते हो कि बंधन कभी था ही नहीं। कभी हुआ ही नहीं। उसका कभी किसी भी काल में कोई अस्तित्व नहीं है। बस तुमने माना था कि बंधन है, और जैसे ही तुमने माना कि तुम बंधक हो। तुम बंधन में बंध गए। और जैसे ही तुमने जाना कि बंधन कभी था ही नहीं, उसी क्षण तुम मुक्त हो गए। बस इतना ही सरल है। इससे सरल कुछ नहीं। प्रणाम।
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