Wise Words
कविता संग्रह - ६
अमिताभ
**१. मैं ही अनुभव, मैं ही अनुभवकर्ता** बिजली के तारों में बिजली है लेकिन दिखती तो नहीं। अग्नि के लपटों में गर्मी है लेकिन दिखती तो नहीं। हवा भी तो चलती है लेकिन वो भी दिखती तो नहीं। पाषाण के कणों में भी गति है पर वो दिखती तो नहीं। सूरज चमकता है और वो दिखता भी है, फूल खिलता है तो महकता भी है। तारों से भरा आसमां दिखता तो है, दृश्यों से सना ये जहां दिखता तो है। जो दिखता है और जो नहीं है दिखता, सभी का अनुभव स्मृति में ही है होता। सब अनुभव हैं स्मृति में, पर मैं कोई अनुभव तो नहीं। सब मेरे अपने ही तो हैं, किसे कहूं मैं गलत और किसे सही। सब मेरा ही खेल और मैं ही सब में खिलौना। कोई दूजा ही नहीं, भला! किसी से क्या कहना। **२.मैं** खुद को खुद के ही किस्से सुनाता हूँ मैं, अपनी कविता पर खुदही इतराता हूँ मैं। कोई और तो यहां पे है ही नहीं, खुद के सपनों में खुद को ही पाता हूँ मैं। किससे कहूं मैं बात है इक राज की, देखना चाहूं तो भी खुद को न देख पाता हूँ मैं। जो तुम हंसों तो खुद को ही हंसते पाता हूँ मैं, जब गिरते हो तुम तो रो रो के तुमको उठाता हूँ मैं। चोट तुमको लगे तो दर्द होता है मुझे, लेप बनके उन जख्मों को सहलाता हूँ मैं। खो से गए हो तुम, मुझको भुला है दिया, प्रेम गीत गा -गा के तुमको बुलाता हूँ मैं। मुझसे बिछड़े हो तुम और ये जानते भी नहीं, शांत होते ही तुमको ये याद दिलाता हूँ मैं। खुद को खुद के ही किस्से सुनाता हूँ मैं, अपनी कविता पर खुदही इतराता हूँ मैं। **३. विकासक्रम और ज्ञान** प्रकृति के अधीन विकास होता क्रम से, साधक विकसित हो जाता बिना श्रम के, लेकिन जब तक गुरुकृपा का न हो साथ, कोई निकल नहीं सकता माया के भ्रम से। अज्ञान के बादल जब छट जाते हैं, ज्ञान का प्रकाश जाता है फैल, आनंद पुष्प तब खिल जाता है, धुल जाता है सब मन का मैल। ज्ञान होने पर तीव्र हो जाता विकास, बस कर लें साधक थोड़ा अभ्यास, और रखें जो गुरु पर पूरा विश्वास, मुक्ति मिल जाती बिन किए प्रयास। **४. अनुभव** अनुभवों के तार जब जुड़ते हैं, वो कुछ बताते हैं। देते हैं वो सूचना या मनोरंजन बन जाते हैं। जो बने उपयोगी जीव के तो जीवन साधन हो जाते हैं। जब बने आधार तर्क और अनुभव के ज्ञान यही बताते हैं। बड़े अचरज की है बात की अनुभव सच नहीं बताते हैं। नेती नेती से हटा अनुभवों को सत्य तक पहुंच ही जाते हैं। फिर सब अनुभवों के नाता तोड़ के स्वयं सत्य हो जाते हैं। मैं ही दृश्य हूँ मैं ही दृष्टा, ब्रह्म ही ब्रह्म चहुंओर पाते हैं। **५. अनुभक्कर्ता हूँ मैं** सब रूप हैं मेरे, मैं कोई रूप नहीं। छांव भी है मेरा, सिर्फ धूप नहीं। सब लहरें हैं मेरी, मैं कोई लहर नहीं। सब बसते हैं मुझमें, मैं कोई शहर नहीं। सब कविताऐं हैं मेरी, मैं कोई कविता नहीं। मैं स्वयं प्रकाशित हूं पर मैं कोई सविता नहीं।
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