Wise Words
ज्ञानहीन जीवन
अखंडिता
**तुलना करने की आदत : स्वयं को श्रेष्ठ या हीन समझना** जब तक ज्ञान में स्थिति नहीं होती है तब तक जीव भाव प्रगाढ़ होता है। जीव भाव की सबसे शक्तिशाली वृत्ति है उत्तरजीविता और उसमें सबसे बड़ी सहायक है अहम वृत्ति। तुलना करना असल में कुछ और नहीं अहम भाव को और सशक्त और तुष्ट करने की एक प्रक्रिया है जिसमें **अहम, बुद्धि-विवेक के ऊपर हावी हो जाता है और निरंतर मैं- मेरा करके तुलना करता है।** क्योंकि जब तुलना करेगा तभी न अहम बलवती होगा ! अगर सब समरूप हो गए , समदर्शिता में स्थिति बन गई, दिखने लग गया कि कोई अलगाव नहीं है, विलीनता ही है , सब एक ही हैं तो अहम बचा कहाँ ? वो तो नष्ट हो जाएगा। अहम का कोई अस्तित्व ही नहीं रह जाएगा। पर क्या अहम को यह बात मंजूर होगी ? बिल्कुल नहीं। अहम फिर जोर लगाता है और निरंतर जीव को भ्रमित करता है कि देखो तुम्हारे पास घर तो है पर जो 'दूसरा' है (अलगाव किया यहां पर), जो 'दूसरा' है न उसके पास तुमसे बड़ा घर है , तुम्हारे पास खाने को तो है पर देखो जो 'दूसरा' है वह रोज पकवान मिठाई खाता है आदि। इस तरीके के ऊलजुलूल मनगढ़ंत तुलनात्मक विश्लेषण से मनुष्य के अंदर स्थायी हीन भावना घर कर जाती है। अब २४ घंटे अगर बुद्धि केवल इसी तुलनात्मक अध्ययन में लगी रहेगी तो किसी न किसी को अपने से ऊपर खोज ही लेगी और तुलना का काम चालू कर देगी। फिर सतत् अभ्यास के कारण तुलना करना एक वृत्ति बन जाती है जो लगातार विचारों के रूप में घूमती रहती है और दिनचर्या का हिस्सा बन प्रवृत्ति या स्वभाव का रूप ले लेती है। अहम यहां पर यह चालाकी करता है कि अपने से नीचे वाले के साथ तुलनात्मक अध्ययन नहीं करता क्योंकि उसको वहां आवश्यकता ही नहीं लगती। अहम वृत्ति बोलती है कि इनको रहने, खाने, पीने आदि की व्यवस्था है नहीं और यह तो निकृष्ट हैं , बुद्धि-विवेक हीन है और आपस में बस लड़ते रहते हैं। 'मैं' तो इनसे कहीं ऊपर, पढ़ा-लिखा, बुद्धिजीवी वर्ग का "व्यक्ति हूं" जो कि सही गलत का निर्णय बहुत आराम से करता है। अब यहां पर **"मैं अनुभकर्ता इन सभी अनुभवों का निर्लिप्त दृष्टा हूँ" , ऐसी कोई स्थिति बन ही नहीं पाती क्योंकि यहां पर जीव पूरी तरीके से व्यक्ति बना हुआ है। बस यही तो अहम चाहता है।** ठीक है ! विश्लेषण तो जो हो रहा है सो हो रहा है ; होता क्या है फिर यहां पर जो हीन भावना वाला प्रेषित अहम है, जो दबा कुचला अहम है, यहां पर अपने आप को बहुत बलवान पाता है और अपने इस शक्ति का या इस सोची हुई सर्वश्रेष्ठता का प्रदर्शन करना चाहता है और जो भी उनसे किसी भी मामले में थोड़ा सा कमतर हैं , उनसे खराब व्यवहार कर अपने को ऊंचा साबित करना चाहता है। उनको बात-बात पर नीचा दिखाएगा और उनको दबाना चाहेगा। यहां और कुछ भी नहीं , वही दबा हुआ अहम है जो फूल रहा है। जैसे भरा हुआ गुब्बारा होता है न ! भरे गुब्बारे को अगर एक ओर से थोड़ा दबाया तो दूसरी ओर थोड़ा ज्यादा फूल जाता है। बस वही है और उसको ज्यादा दबा दो तो फूट ही जाता है। **अहम वही फूली हुई हवा है जो अपने को उस गुब्बारे के रूप में आकार देकर पहचान देना चाहती है।** यह भी सारा का सारा सोच अर्थात चित्त वृत्ति पर ही निर्भर है। **मनुष्य की सोच ही उस भरे गुब्बारे को खुद ही सोच-सोच के एक ओर से दबाती है तो दूसरी ओर जाकर वह फूलता है क्योंकि उसका सुख उसकी अभिव्यक्ति में ही है।** अहम अपने आप को जताना चाहता है, वह दिखाना चाहता है कि **"मैं हूं" और मुझे पहचान कर मुझ "मैं" को मान्यता दी जाए।** अहम का यह खेल तो समझ में आ जाता है पर अब प्रश्न यह उठता है इस तुलनात्मकता से बचें कैसे ? इसका उपाय क्या है ? तो **बहुत ही साधारण सा उपाय है - समता में रहना।** समता में रहना, कोई भेद नहीं रखना, कोई अपना - पराया नहीं सोचना, सभी रूप मेरे ही हैं यह देख पाना। जो भी प्रकट है वह वस्तुतः नाद रचनाएं मात्र हैं। जैसे कि आपका शरीर, आपके आसपास के शरीर , आकृतियां, संरचनाएं , वनस्पति, जीव-जंतु आदि जो भी कुछ दिख रहा है ; सब केवल और केवल नाद रचनाएं ही हैं और उसको वैसे का वैसा ही देख पाना ही असल साधना और ज्ञान में स्थिति है। जिस मोबाइल पर आप यह पढ़ रहे हैं , इसमें और जो पढ़ने वाला है उसमें भी कोई भेद नहीं है। सब एक ही है एकत्व मात्र है। अखंड अस्तित्व। **तो किसकी तुलना और किससे तुलना ? ना कोई व्यक्ति है ना कोई दूसरा है....** प्रणाम 25/09/2025
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