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अस्तित्व शून्य है! अर्थात क्या?
आदित्य मिश्रा
"अस्तित्व शून्य है"! यह कथन सुनते ही मानव बुद्धि इसे अस्वीकार करने लगती है। अस्तित्व शून्य है कहने वाले को नास्तिक समझा जाने लगता है किंतु अस्तित्व शून्य है कहना, 'नहीं है' कहना नहीं है। 'नहीं है' कथन से भी 'कुछ है' ही सिद्ध होता है, इसीलिए गुरुजनों ने इसमें जोडा, किंतु- "अनंत संभावनाएं हैं" फिर भी किसी- किसी की बुद्धि शांत नहीं होती, वह जान ही लेना चाहती है जो कि संभव नहीं है। तो! "अस्तित्व शून्य है" ऐसा क्यों कहा गया है? क्योंकि पूर्णता है! पूर्णता को शब्दों में व्यक्त करना हो तो केवल शून्य ही उचित शब्द हो सकता है क्योंकि शून्य में ही कुछ जोडा और घटाया नहीं जा सकता। शून्य शब्द से ही आरंभ और अंत का न होना व्यक्त होता है, शून्य से ही अनंतता व्यक्त होती है। क्योंकि अद्वैत है! अद्वैत अर्थात भेद का अभाव, दो नहीं। यहां पर मनीषी सीधे "एक है" न कह कर "दो नहीं" कह रहे हैं। वे नकारात्मक संकेत क्यों कर रहे हैं? तो! वे कह रहे हैं कि अस्तित्व में न सत्य है और न मिथ्या है। अब प्रश्न उपस्थित होगा, कि फिर क्या है? तो वे कहते हैं, अनिर्वचनीय! अर्थात जो शब्दों से नहीं कहा जा सकता। अब जो शब्दों से नहीं कहा जा सकता, उसी को शब्द से शून्य कहा जा रहा है क्योंकि जब शून्य कहा जा रहा है, तब कुछ कहा भी नहीं जा रहा है। शून्य व अनिर्वचनीय दोनो शब्द अज्ञेयता की ओर ही संकेत कर रहे हैं। क्योंकि रचयिता नहीं है! "एक है" क्यों नहीं कहा जाता? क्योंकि एक है कहते ही कोई एक प्रकट होता है। 'एक' ऐसा आभास देता है कि बुद्धि द्वारा निश्चित रूप से कुछ जान लिया गया है और यदि एक है तो उस एक से ही सब आरंभ भी हुआ होगा। अब रचना रचयिता की बात आएगी। पर ऐसा है नही, अस्तित्व का न आरंभ है न अंत, न कोई रचना है न रचयिता। अस्तित्व मूलभूत है, अस्तित्व अनियमित भी है और उसमें नियम भी हैं, सब स्वतः हो रहा है। तत्व में ही क्रियाशक्ति निहित है, मूल तत्व में निमित्त की बात ही लागू नहीं होती। क्योंकि आप शून्य हैं! "अस्तित्व शून्य है" जो इसके अस्वीकार में है, उस व्यक्ति को ही जांचते हैं। एक रोचक कहानी है कि, एक राजा ने जब एक ज्ञानी संत को व्यक्ति के आधार पर संबोधित किया, तो उस संत नें रथ की ओर इशारा करते हुए राजा से पूछा : यह क्या है? जब राजा ने 'रथ है!' कहा तो संत, क्रमशः घोडे, पहिए, धुरी आदि रथ के एक एक अंग अलग करते गए और राजा से उनके नाम पूछते गए। अंत में उन्होने राजा से पूछा : राजन आपने इसे रथ कहा था, रथ कहां है? तो! रथ कुछ वस्तुओं का जोड था, वास्तव में कोई रथ, होता ही नहीं, तो व्यक्ति भी उसी तरह एक जोड है। क्योंकि आप की इच्छा और कर्म शून्य हैं! मनोशरीर यंत्र जिस इच्छा से संचालित होता है उस इच्छा का स्रोत ढूंढने पर शून्य प्राप्त होता है। व्यक्ति जिन कर्मों का दायित्व लेता है, वे कर्म भी प्रकृति अर्थात अस्तित्व में स्वतः होते हैं, कैसे? तो! यह शरीर मिट्टी से है, इसके प्राण हवा से हैं, इसमें ऊर्जा वनस्पति से है, इसमें स्मरण शक्ति जल से है। यह शरीर जिसे मैं कहा जा रहा है वह मैं कार्य नहीं करता, शरीर प्रकृति है और प्रकृति ही कार्य करती है। क्योंकि आपका जानना शून्य है! आपकी बुद्धि अनुभवों अर्थात वस्तुओं को नहीं जानती, वह जो जानती है वह दो वस्तुओं के बीच तुलना होती है। एक वृक्ष को बुद्धि कैसे जानती है? व्यक्ति के शैशव काल में किसी आकृति को उसके माता पिता ने वृक्ष बताया। बडा होकर उसने उसी आकृति को नाम, गुण और उपयोगिता के आधार पर जाना किंतु क्या उसने वास्तव में जाना कि वह आकृति क्या है? क्यों है? कैसे है? तो बुद्धि प्रकट को भी नहीं जान सकती केवल उसकी व्याख्या कर सकती है। क्योंकि पदार्थ शून्य है! बुद्धि जो प्रकट है उसी को सत्य समझती है और तर्क देती है कि शून्यता में अनंत संभावनाएं कैसे हो सकती हैं,अनंत संभावनाएं पदार्थ में हो सकती हैं। तो! जब अस्तित्व शून्य है, यह कहा जाता है तब बात तत्व की, की जा रही होती है। पदार्थ का तत्व क्या है? विज्ञान पदार्थ को विखंडित करता है और बताता है कि पदार्थ का तत्व गति या ऊर्जा है, ऊर्जा परिवर्तन मात्र है। किसका और क्या परिवर्तन है, वो दिखाई नहीं देगा। अतः पदार्थ का तत्व शून्य है। अंततः अस्तित्व शून्य है! अस्तित्व के विषय में बुद्धि द्वारा जो भी कहा जाता है, वह आवधारणा सिद्ध होती है, इसीलिए अस्तित्व को शून्य कह दिया जाता है। इस कथन से समस्त अवधारणाओं का अंत हो जाता है। जो बुद्धि इस मर्म को नहीं समझ पाती वह उलझ जाती है, कि सब शून्य कैसे हो सकता है। अस्तित्व हो रहा है और जाना जा रहा है, जो वास्तविक जानना है उसका विश्लेषण संभव नहीं होता। विश्लेषण बुद्धि करती है जो कि वास्तविकता की कल्पना होती है न कि सत्य। मन का अस्तित्व कल्पनाओं में उलझे रहने से है तो वह इस सत्य को स्वीकार नहीं करता। वास्तव में आपको अर्थात आपके मैं को शून्यता स्वीकार नहीं है किंतु यदि आप शून्य हैं तो आप ही सब कुछ हैं।
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