Wise Words
वर्तमान, ज्ञान और अस्तित्व
सत्यम
एक छोटा सा प्रयोग है जो आपके काम आ सकता है ऐसे जीवन जीना शुरू कीजिए जैसे अभी आपका जन्म हुआ है।और यदि अभी आपका जन्म हुआ है तो इस जगत को एक अबोध की तरह अभी देखना शुरू कीजिए। हर वस्तु को ऐसे देखिए कि उसको पहले आपने देखा ही नहीं। हर ध्वनि, हर शब्द को ऐसे सुनिए कि पहले कभी सुना ही नहीं। हर रस, हर संवेदना को ऐसे अनुभव कीजिए कि यह पहली बार हो रही है। फिर आप जान पाएंगे कि स्मृति ने कितना बड़ा भ्रम पैदा कर रखा था। यहां हर पल एक नया अनुभव है। जो स्मृति में पड़ा है वह केवल पहले हुए अनुभवों के संस्कार एवं उनसे संबंधित ज्ञान या अज्ञान है स्वयं अनुभव नहीं। परन्तु अनुभव हर क्षण में नया है। सभी अनुभव अभी ही होते हैं। क्योंकि वर्तमान के अलावा दूसरा कोई काल नहीं है। वैसे तो यह काल (वर्तमान)भी नहीं है। वर्तमान भी बस एक नाम है जो आरोपित है। वास्तव में जिसे वर्तमान कहा जाता है वहां पर आपको बस अस्तित्व ही मिलता है। अनुभवकर्ता जब अनुभवों का अनुभव कर रहा होता है तब कह दिया जाता है कि अभी वर्तमान है। वर्तमान का कोई रूप नहीं है वह बस एक धारणा है। वास्तव में वर्तमान में भी आपको अनुभव और अनुभवकर्ता ही मिलेंगे। तो इससे आशय स्पष्ट है कि वर्तमान अस्तित्व की ओर ही एक संकेत है और कुछ नहीं। इसीलिए ज्ञानदीक्षा कार्यक्रम के पाठ "ज्ञान के साधन" में इस बात पर जोर दिया गया है कि "आपका अभी वर्तमान में जो अनुभव है वहीं आपको ज्ञान मिलेगा, जो अनुभव हो चुके हैं (भूतकाल के अनुभव जो स्मृति मात्र है) उनमें नहीं। इसीलिए विभिन्न गुरुओं को कहते हुए सुना जाता है कि "अभी में रहो" या "पावर ऑफ़ नाउ"। (हमारे गुरु तरुण प्रधान जी भी कहते हैं "अभी के अलावा आप कहीं रह भी नहीं सकते। कोई और विकल्प है ही नहीं।" और यह पूरी तरह तार्किक भी है।)। क्योंकि लोग ध्यान नहीं दे पाते है। उनका ध्यान इतना कमजोर है कि या तो वे अपनी स्मृतियों (भूतकाल) में खोए हुए रहते हैं और या भविष्य की कल्पनाओं में। "वो" जो अभी उनके समक्ष है उसपर उनका ध्यान ही नहीं। सत्य और माया दोनों अभी उपस्थित है परन्तु इनपर कोई ध्यान नहीं दिया जाता। परन्तु जब उनका ध्यान विकसित होता है तब वे कुछ क्षणों के लिए अभी में आ पाते हैं और तभी उसी समय वे आश्चर्य से भरकर मूलभूत प्रश्न उठाते हैं "यह जगत क्या है? मैं कौन हूँ? यह सब कैसे आया? इसका कारण क्या है? क्या इसका कोई अंत है" आदि आदि। तभी वह व्यक्ति साधक बनता है और गुरु की शरण में जाकर ज्ञान प्राप्त करता है। तो यह "वर्तमान में रहो, अभी में रहो" आदि आदि गुरुओं का बस संकेत है उनके लिए जिनमें संभावना है परन्तु मूर्छा में जी रहे हैं। अभी अपने प्रयोग पर वापिस लौटते हैं। जब आप ऐसे देखना शुरू करते हैं जैसे आप पहली बार उस वस्तु को देख रहे हैं। तब जो स्मृति में कोरा अज्ञान एवं अंधविश्वास है वह साफ दिखाई देने लगता है जो ज्यादातर मत आरोपण ही होता है। जिसको अबोधता के कारण बिना तर्क लगाए अपना लिया गया था क्योंकि तब बुद्धि इतनी विकसित नहीं थी। और "जब अज्ञान को अज्ञान रूप में जान लिया जाता है तभी अज्ञान का नाश हो जाता है"। और इस प्रकार धीरे धीरे आप बुद्धि का प्रयोग करना सीखते हैं। आपको आश्चर्य होता है कि क्या मैं इसे सत्य मान कर जीवन जी रहा था। और ऐसे ही अज्ञान का नाश करते करते आप अज्ञान से पूरी तरह मुक्त हो जाते हैं। अंत में हमें मिलता है कि इस पूरी चर्चा का निष्कर्ष ज्ञान के सर्वमान्य साधन "अपरोक्ष अनुभव" और "तर्क" ही आता है जिसमे कुछ नया नहीं है। परन्तु यह विश्लेषण अपरोक्ष अनुभव और तर्क को ज्ञान के साधन के रूप में और अधिक दृढ़ता एवं बल प्रदान करता है। धन्यवाद।
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