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सत्संग का बल
शैल
मनन पूर्णिमा के दिन चाँद पूर्ण होता है और सागर जल धरती की गुरुत्व के विरुद्ध चाँद की ओर ऊपर उठता है। यहां यह साबित हो जाता है कि प्रकृति के नियमों से भी ऊपर उठा जा सकता है, जब चित्त रूपी आकाश में गुरु रूपी चंद्रमा हो। क्या यह बल केवल सागर जल पर ही लागू होती है? क्या नदियों का पानी और अन्य जल स्रोतों के पानी पर यह बल कार्य नहीं करता? जैसा कि हम सभी का अनुभव होगा, कार्य अवश्य करता है, यहां तक कि चित्त पर भी! किन्तु इतना सूक्ष्म होता है कि इसका प्रभाव दृष्टि में नहीं आता। साथ ही अज्ञान के बंधन में व्यक्ति बंधा होता है, जिस कारण इस ऊर्जा के प्रभाव में नहीं आ पाता। सागर अथाह गहराई लिए जल कणों का विशाल समूह है, जहाँ यह ऊपर उठती ऊर्जा प्रभावी हो पाती है। अर्थात सघनता का प्रभाव दिखाई पड़ता है। इसी प्रकार संध में शक्ति है, ऐसा बुद्ध ने कहा है। संघम शरणं गच्छामि! सत्संग इसी शुद्ध ऊर्जा का संघ है जिसमें गुरु की शक्ति और संकल्प डले होने के कारण कई-कई गुणा प्रभावी हो जाता है। इस अवसर पर इस ऊर्जा का उपयोग अध्यात्मिक प्रगति के लिए कर लें तो इस अद्भुत प्राकृतिक अवसर का लाभ हर साधक तक निश्चित पहुंचेगा। चंद्रमा के पूर्णतः प्रकाशित होने का एक और अर्थ कि ज्ञान की पूर्णता को प्राप्त चंद्रमा रूपी गुरु के प्रकाश में अज्ञान का सघन अंधेरा प्रकाशित हो जाता है। और संभावना होती है, कि फिर से उसी पतन के चक्र में दोबारा गिरने के बजाए उससे बाहर हो जाए। फिर सत्य प्रकाशित हो जाएगा। जैसे चंद्रमा हमेशा पूर्ण ही होता है। वह कभी घटता नहीं, इसलिए बढ़ता भी नहीं। घटने बढ़ने का भ्रम मात्र है। अज्ञान से उत्पन्न इस भ्रम को दूर कर जीवन में आनन्द का प्रकाश भरने के लिए कोटि आभार गुरुवर ! आपकी करुणा और कृपा से सभी प्रगति पथ पर बढ़ते रहें!!
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