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सर्ब स्वीकार
अनंता
गुरुदेव को कोटि कोटि नमन गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानी ।। यह स्तुति शंकराचार्य द्वारा की गई है ।जो हमारे बोधि वार्ता के गीत समूह में शामिल है । जब पहली वार इसे सुना तो प्रश्न आया कि जो माया है,है ही नहीं,प्रतीति है,उसकी स्तुति क्यों । इतने समय से तो मिथ्या सिद्ध कर रहे हैं और अब स्तुति???? तब पता चला कि ज्ञानमार्ग में हम माया को स्वीकार करते है ।मिथ्या को जानते हुए मिथ्या में जीते हैं ।मिथ्या को माँ की तरह प्रेम करते हैं ।क्युकी माँ से सुंदर और पूर्ण कुछ नहीं है ।और सोचिए क्या इससे सुंदर रचना हो सकती है ।इतना सुंदर स्वप्न रचा है,द्वैत ,आकर्षण विकर्षण,दोहराव, स्वतः सब हो रहा है,बन और मिट रहा ह,(प्रतीत हो रहा हैं) किंतु कुछ ज्ञानी जन इसे स्वीकार नहीं करते ,क्यों ???? पहले हम माया को सत्य मान कर उसमे डूबे थे और अब मिथ्या जानकर उसका त्याग करते हैं ।वास्तव में ऐसा करके हमएक तरफ़ हो जाते है ।किंतु साधक तो हाथ में साक्षी भाव का डंडा लेकर नट की तरह रस्सी पर चलता है, सर्व स्वीकार करता है । ना भोग और ना त्याग,क्योंकि कर्ता और भोक्ता नहीं है ।साक्षी भाव में देखना मात्र है । फिर प्रश्न आया है कि यदि माया में उतरे तो क्या पुनः माया अपनी ओर नहीं खीच लेगी,क्या ये ज्ञान विस्मृत हो जाएगा जी नहीं,ऐसा नहीं होगा क्युकी सत्संग,गुरु कृपा और साक्षी भाव का डंडा(जो नट लेकर चलता ह) ऐसा होने नहीं देगा ! अब जीवन लीला की तरह होगा ।और मैं लीलाधर , दृष्टा । अब जो हो ,सो हो ।मुझे सब स्वीकार हैं । ये व्यक्तिगत द्रष्टि कोण है अन्यथा ना ले ।और अज्ञानतावश कुछ त्रुटि हो तो क्षमा करें ।
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