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जागृत सु्षुप्ती स्वपन -- बादल बारिश गनन
निशिगंधा क्षीरसागर
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जागृती है अवस्था अस्तित्व में नित्य बदलती रात्री नींद में कभी जागृत कभी स्वप्न में और कभी कभी सुषप्ती में एक कें बाद एक आवर्त में चलित तत्व गतिमान सृष्टी में घटना वस्तू पदार्थ परिवर्तन में दृष्य दिखते अज्ञान भ्रम सें दृष्यमात्र सारी अवस्थाए मुझ में द्रष्टा साक्षी नित्य सदा सें मात्र मेरा होनापन द्रष्टाभाव में मैं सदा सें अचलता में..... l l मैं सदा सें अचलता में अचलता जैसे गनन में बादल आते बादल जाते रूप रंग आकार लाते इंद्रधनू कें रंग बिखरते रूप रंग आकार भासते वास्तविक अलग गनन सें गनन निरंतर निर्विकार सब सें नित्य स्थित परदा जैसे सपने सें जागा जीवन में जागा हुआ जगत जीव में मात्र आभास कल्पित मन सें सारी सृष्टी दिखती प्रतिती सें जग जैसा कुछ होता नहीं मन नही तो जगत भी नही आचार्य समझाते सृष्टी हुई नही जीव आलात जगत है आवर्त आलात चक्र है जीव का जगत गती सें भासता होता नही चित्र है भासमान विद्यमान नही मैं सदा सें अचलता ही चलना गती बदलाव मुझ में नही.... l l गती मुझ में है हि नही गती सें जीवन स्वप्न बना स्वप्न में सृष्टी जीव जगत बना वास्तव में कुछ बना नही स्वप्न द्रष्टा मैं सदा सें यही जीवन का केंद्र बना मैं हि निश्चल नित्य निर्विकार चैतन्य अविचल अनुभवता खुद को अनुभवता रहता देह में खुद को खेल प्रतिती अनुभव है जीवन बस्स है आभास सपना जीवन सपना बादल होते ही नही बारिश बरसे गनन भीगें नही मात्र कुछ क्षण चमके बिजली काले घने बादल बरसे बारिश न चमक न बारिश न बादल सत्य विवेक दृष्टी बुद्धी है बताती बादलो सें उठ जा उपर आकार रूप रंग सें परे तेजोमय है गनन मेरा सदन गननरूपी पटल जिस पे उभरे चित्र सारे कृपणभाव छोड बन जा ब्रह्म अकृपण हो जा उन्नत बन जा गनन .... l l बादल आकार स्वप्न जागृत साकार इन सब में क्या है नित्यता?? घटना अवस्था बदले, ऋतू बदलता दिन और रात चक्र बदलता बदलती इस दुनिया को देखता मैं अछूता कभी न बदलता विलग होकर सब को देखता मुझ में कोई बदलाव न दिखता मैं बस्स होनामात्र नित्य हूं सदा गगन बादल दृश्य नजारे यश अपयश कें लौकिक किनारे ज्ञान कीं नैय्या चप्पू साधना कें दूर हटी अब सारी अज्ञानी मान्यताए सुखदुःख भावना आवेग सारे सगे संबंधी मित्र सखा आते जाते होते हि नही केवल दिखते जैसे बादल आकार आते जाते आकार रंग रूप में क्यूँ खोजता दृष्य का भ्रम क्यूँ न समझता... ?? दृष्य नही तो दर्शन किस का...?? आइने में खुद को देखता.... l l गनन सदा सें अनछूता सब सें घटना परिस्थिती जीवन दृष्टी बदले रंग रूप दृश्य बादल सारे गनन सा उन्नत न्यारा सब सें मैं अछुता विरला सब सें अनुभव सारे बदलाव आने जाने साक्षी तटस्थ जीव न्यारा उनसें द्वैत कें भ्रम ढह गये सारे इच्छा अपेक्षा कामनाओ कें गुब्बारे हर क्षण नूतन उठते मिटते ज्ञान कीं सुई गुरु सहारे टुटे अज्ञान किचड कें बुलबुले अज्ञानबीज भस्म हुवा ज्ञान सें अज्ञान कीं नींद सें जागे ज्ञान सूर्य चमका गनन में कमल खिला ज्ञान कीं दिशा में जीवन में जागते होश सें सहारे कैसा बंधन अब होना बचा रे अब होना पन केवल बचा रे अब होना मात्र होना बचा रे.... l l