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गुरुः निराकार ब्रम्ह धरा रूप काया (कविता)
जानकी
गुरुः निराकार ब्रम्ह धरा रूप काया <br><br> <div class="ui image"> <img width="500px" src="https://i.pinimg.com/236x/6d/87/07/6d8707b219289deab0845cc8cc7bf974.jpg" alt="Any Width"> </div> <br><br> गुरू ज्ञान गंगा, परम् ज्योति पूंज। मुझे ज्ञान का जो मिलें हैं निकुंज॥ गुरु ध्यान, साक्षी गुरु है समाधि। उन्हीं से ख़ुशी के मिले अर्थ भाँति॥ किए क्या चुरे मन् हरे दुःख पीड़ा। उठाए जगत् मुक्ति, उद्धार बीड़ा॥ हटाए अंधेरा भरा था टनाटन। मिटाए स्वयं को दिखाए सनातन॥ न थी आसपास, न सम्बन्ध नाता। लिए गोंद दाता बनें वो विधाता॥ विगत् में सुकर्म अवश्य हुआ है। तभी आप का जो नज़र नें छुआ है॥ कला तो मुझे भी सिखाए यथेष्ट। न अज्ञान छोड़ी न छोड़ी कुचेष्टा॥ यहीं लुप्त थी लिप्त, आसक्त, भोग्य। करूँ क्या बनूँ आप के पात्र योग्य?? अभी एक प्रश्न पुछूं मैं ज़रा सा। कहाँ से हमारे लिए भेष धरा था?? अभी का जगत् है भरा जाल झेल। किए त्याग् समेटे दया, प्रेम, मेल॥ मिलाए सुजन को बसे हैं दिलों में। बने प्रेम, पूज्य नज़र के क़िलों में॥ छुटाए दुनियाँ जुटाए सु-संघ। सभी मन्त्रमुग्ध सभी में उमंग॥ हमारे लिए क्यूँ स्वयं को लुटाए ? दिखाए उज्याला, अशांति छुड़ाए॥ परम ज्योति बिम्ब बड़ा लक्ष्य लाया। निराकार ब्रम्ह धरा रूप काया॥ धन्यवाद
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