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कविता संग्रह - १
अमिताभ
**दृष्टा** दृष्टा हूँ मैं, ना कि कोई दृश्य। वर्तमान का मैं बजता संगीत, न ही मैं भूत, न ही भविष्य। फूलों की खुश्बू में सूंघ लो तुम मुझे, कोयल की गूंज में सुन लो तुम मुझे। अग्नि की ज्वाला में तुम देखो मुझे। पानी की शीतलता में तुम पा लो मुझे। पहाड़ों की सर्द हवाओं में हूँ मैं, समंदर की लहरों में तुम ढूंढो मुझे। न कर्ता हूँ मैं, ना ही कोई कृत्य। दृष्टा हूँ मैं, ना कि कोई दृश्य। **तत्व** दृश्य भी मैं, दृष्टा भी हूं, हां मैं दृष्टि हूं। न सृजन मैं, न सृष्टा हूं, पर मैं सृष्टि हूं। तत्व मैं ही सभी नाम रुपों में, घड़े से जो हट न सके, मैं वो मिट्टी हूं। **गुरु , गुरुक्षेत्र, गुरुज्ञान** मुझे वो ना मिला जो मैं चाहता था। मुझे, मैं मिल गया, जो मुझे चाहिए था। कहाँ कहाँ भटका मैं ज्ञान की तलाश में, गुरु जो मिले तो अज्ञान ही छीन लिया। भटकता रहा मैं, लगी थी सत्य की प्यास, गुरुक्षेत्र ने मुझे पूरा दरिया ही दे दिया। थी आस मुझे कि सच के प्रकाश में, जीवन ये बदल जाएगा, गुरु ज्ञान के मिठास में, जीवन का फिक्र ही खो गया। चला था ढूंढने की मैं कौन हूँ। जो मैं, मैं से मिला तो मैं ही खो गया। ****
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