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वैराग्य
प्रविन
अक्सर हम वैराग्य का अर्थ गलत समझ लेते हैं। हमें लगता है कि घर-परिवार छोड़ देना, समाज से अलग हो जाना, भौतिक सुख-सुविधाओं का त्याग कर आरण्यक या आश्रम में चले जाना ही वैराग्य है। समाज भी ऐसे व्यक्ति को देखकर कह देता है कि वह वैरागी हो गया, क्योंकि उसने सब कुछ छोड़ दिया है। किन्तु प्रश्न यह है कि यदि छोड़ने वाला अभी भी अपने भीतर "मैंने छोड़ा है" की भावना लिए बैठा है, **तो वास्तव में क्या छूटा? जहाँ त्याग का अहंकार शेष है, वहाँ वैराग्य अभी अधूरा है। वास्तविक वैराग्य का अर्थ है जो जैसा है, उसे वैसा ही देख लेना।** यही सम्यक दृष्टि है, और यही वैराग्य है। जब मन किसी वस्तु को पाने की आकांक्षा से मुक्त हो जाता है और किसी वस्तु के खो जाने की चिंता से भी परे हो जाता है, तब वैराग्य प्रकट होता है। मिले तो ठीक, न मिले तो भी ठीक। सोने का महल मिले तो भी स्वीकार, झोपड़ी मिले तो भी स्वीकार। जहाँ पाने की लालसा नहीं और खोने का भय नहीं, वहीं वैराग्य का जन्म होता है। इसका अर्थ यह नहीं कि वैराग्यवान व्यक्ति कर्म करना छोड़ देता है। जीवन के निर्वाह के लिए कर्म तो आवश्यक है; बिना कर्म के जीवन संभव नहीं। अंतर केवल इतना है कि वह कर्म तो करता है, परन्तु कर्मफल की अपेक्षा नहीं रखता। फल अनुकूल मिले तो भी प्रसन्नता, प्रतिकूल मिले तो भी कोई शिकायत नहीं। प्रकृति जो कुछ दे, जितना दे, जैसे दे सब स्वीकार है। वैराग्य किसी अभ्यास या प्रयास से ओढ़ा नहीं जा सकता। यह कोई बाहरी आवरण नहीं है जिसे धारण कर लिया जाए। वैराग्य तो स्वतः प्रकट होने वाली अवस्था है। इसके लिए स्वरूप-ज्ञान आवश्यक है। जब तक मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप को नहीं जानता, तब तक उसका वैराग्य केवल अभिनय या बनावट हो सकता है। और बनावटी वैराग्य में कोई शक्ति नहीं होती। स्वरूप-ज्ञान के प्रकाश में ही वैराग्य का पुष्प खिलता है। जब व्यक्ति अपने सत्य स्वरूप को पहचान लेता है, तब संसार के आकर्षण और विकर्षण स्वतः ही अपना प्रभाव खो देते हैं। वैराग्य की चरम अभिव्यक्ति यदि किसी में दिखाई देती है, तो वह शिव हैं। शिव कोई देवता नहीं, बल्कि चेतना की वह परम अवस्था हैं जहाँ पूर्ण स्वीकार, पूर्ण स्वतंत्रता और पूर्ण विरक्ति एक साथ विद्यमान हैं। वे श्मशान में भी उतने ही सहज हैं जितने कैलाश पर; विष को भी स्वीकार करते हैं और अमृत की भी इच्छा नहीं रखते। इसलिए शिव वैराग्य की पराकाष्ठा हैं। और जब साधक अपने भीतर स्थित उसी शिव-तत्त्व को पहचान लेता है, तब वैराग्य कोई साधना नहीं रह जाता, बल्कि उसका स्वभाव बन जाता है। वहाँ न त्याग है, न ग्रहण; न मोह है, न विरोध। केवल सहजता, शांति और पूर्ण स्वीकार है। **यही सच्चा वैराग्य है।** न संसार से भागना, न संसार में उलझना; बल्कि संसार के बीच रहकर भी उससे अप्रभावित रहना। न कुछ पाने की लालसा, न कुछ खोने का भय। केवल अपने स्वरूप में स्थित होना। यही वैराग्य है, यही मुक्ति का द्वार है।
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