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अद्वैत में द्वैत की भूमिका
जितेन्द्र गिरी
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प्रणाम गुरुक्षेत्र सभी साधकों को प्रणाम। आज का मनन : तार्किक दृष्टि से केवल अनुभवक्रिया है, फिर द्वैत की शिक्षा क्यों दी जाती है? गुरुजनों के सामने एक बड़ी ही विकट समस्या है, वे एक ऐसे विषय के बारे में बताने निकले हैं, जिसके बारे में कुछ भी बताना संभव नहीं है, अनुभवक्रिया के बारे में जो भी कहा जाएगा, वह अधूरा ही रहेगा, क्योंकि उसे शब्दों के माध्यम से पूरी तरह समझाया नहीं जा सकता, शब्दों में किसी बात को व्यक्त करने के लिए उसका कोई आधार, कोई भेद या कोई संबंध चाहिए, लेकिन जहाँ अनुभव और अनुभवकर्ता को अलग-अलग नहीं किया जा सकता, वहाँ बुद्धि उसे समझेगी कैसे? किसी विषय को समझने की प्रक्रिया में बुद्धि भेद, तुलना और संबंधों का सहारा लेती है, वह एक को दूसरे के संदर्भ में समझती है, प्रकाश को अंधकार के संदर्भ में, सुख को दुःख के संदर्भ में और ज्ञाता को ज्ञेय के संदर्भ में समझना आसान होता है, यदि अस्तित्व में केवल प्रकाश ही प्रकाश होता, अनंत उजाला होता, तो क्या बुद्धि प्रकाश को इस प्रकार समझ पाती, जैसे वह आज समझती है? इसी तरह, यदि केवल अंधकार ही अंधकार होता, तो क्या बुद्धि अंधकार को समझ पाती? बुद्धि किसी चीज को समझने के लिए प्रायः उसके विपरीत या उससे भिन्न किसी दूसरी चीज का सहारा लेती है। लेकिन जब बात अनुभवक्रिया की आती है, जहाँ अनुभव और अनुभवकर्ता को अलग-अलग नहीं किया जा सकता, तब बुद्धि के सामने समस्या खड़ी हो जाती है, बुद्धि को समझने के लिए भेद चाहिए, जबकि यहाँ जिस वास्तविकता की ओर संकेत किया जा रहा है, उसमें ऐसा कोई स्वतंत्र भेद स्थापित नहीं किया जा सकता। यहीं पर द्वैत की शिक्षा उपयोगी हो जाती है। गुरुजन अस्तित्व को प्रकट और अप्रकट, अनुभव और अनुभवकर्ता के रूप में समझाते हैं, इसका अर्थ यह नहीं कि अस्तित्व में वास्तव में दो स्वतंत्र तत्त्व मौजूद हैं, यह विभाजन बुद्धि को समझने के लिए एक आधार प्रदान कर सकता है, पहले अनुभव और अनुभवकर्ता के बीच विवेक कराया जाता है, ताकि साधक यह देख सके कि जो कुछ अनुभव में जाना जा रहा है, वह स्वयं अनुभवकर्ता नहीं हो सकता। जब गुरुजी कहते हैं कि तुम अनुभवकर्ता हो, तो इसका अर्थ यह नहीं कि उस क्षण से तुम अनुभवकर्ता बन गए, तुम पहले भी वही थे, जिसे समझाने के लिए अनुभवकर्ता का संकेत दिया जा रहा है, यह शिक्षा साधक की किसी नई पहचान को जन्म देने के लिए नहीं, बल्कि उसकी पुरानी मान्यताओं पर प्रश्न खड़ा करने के लिए है। साधक सामान्यतः स्वयं को शरीर, विचारों, भावनाओं या अपनी मानसिक गतिविधियों के साथ जोड़कर देखता है, जब उसे अनुभवकर्ता की ओर संकेत किया जाता है, तो वह पहली बार अपने अनुभवों और उन्हें जानने वाले के बीच भेद की जाँच करना शुरू करता है, इस प्रकार द्वैत का मॉडल उसकी समझ को एक दिशा देता है। लेकिन यह मॉडल अपने आप में अंतिम सत्य नहीं है, यह केवल जाँच का आधार भर है। जब साधक अनुभव और अनुभवकर्ता के बीच भेद को समझने लगता है, तब अगला प्रश्न उठता है कि क्या अनुभवकर्ता वास्तव में अनुभव से अलग कोई स्वतंत्र सत्ता है? क्या दोनों को वास्तव में अलग-अलग स्थापित किया जा सकता है? यदि नहीं, तो अनुभव और अनुभवकर्ता का विभाजन केवल समझने का एक माध्यम रह जाता है, अस्तित्व की अंतिम वास्तविकता नहीं। यहाँ एक सूक्ष्म बात समझने योग्य है, द्वैत की मान्यता का खंडन कर देना और अद्वैत को जान लेना, दोनों एक बात नहीं हैं। यदि पहले हम यह मानते थे कि दो तत्त्व हैं और अब यह मानने लगे कि केवल एक तत्त्व है, तो हमारी मान्यता अवश्य बदल गई, लेकिन क्या वास्तविकता का बोध भी हो गया? आवश्यक नहीं। द्वैत की शिक्षा साधक को भेद समझने में सहायता देती है और वही भेद आगे चलकर अपनी सीमाओं की जाँच का आधार बनता है, पहले अनुभव और अनुभवकर्ता का विवेक, फिर दोनों के बीच वास्तविक विभाजन की जाँच, इस प्रक्रिया में द्वैत का मॉडल अपनी शिक्षण संबंधी भूमिका पूरी करता है। वास्तविक प्रश्न यह नहीं है कि द्वैत को छोड़कर अद्वैत को मान लिया जाए, बल्कि यह है कि अनुभव और अनुभवकर्ता के बीच जिस भेद को हम सत्य मानते हैं, उसकी वास्तविकता की जाँच की जाए। क्योंकि किसी मान्यता को छोड़ देना ज्ञान नहीं है। मान्यता के आधार को देखना और उसकी वास्तविकता को जाँचना ही हमें उस दिशा में ले जा सकता है, जहाँ धारणाओं से परे देखने की संभावना खुलती है।