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अस्तित्व एवं अनुभवक्रिया में भेद कैसे है?
सत्यम
"अनुभवक्रिया" अनुभवक्रिया की परिभाषा: अनुभवक्रिया शब्द का प्रयोग, ज्ञानदीक्षा कार्यक्रम में "अनुभव एवं अनुभवकर्ता के **विलय**" को बताने के लिए किया जाता है। अनुभव और अनुभवकर्ता कभी दो अलग अलग नहीं है, यह दोनों एक ही है जिसको चित्त द्वारा, केवल जानने के लिए, दो भागों में विभाजित किया गया था। और यह सारी विभाजन की प्रक्रिया भी चित्त में ही चल रही थी। परंतु अनुभव एवं अनुभवकर्ता कभी दो नहीं है। जोकि कार्यक्रम में दिए गए तर्कों से स्पष्ट होता है। जिसे हम अनुभव या अनुभवकर्ता कह रहे हैं वह वास्तव में एक ही वस्तु है जिसको दो दृष्टिकोण से देखा जा रहा है। जब हम "साक्षी के दृष्टिकोण" से देखते हैं तो हम कहते हैं कि **अनुभवकर्ता** है। और जब "साक्ष्य के दृष्टिकोण" से देखते है तो कहते है कि **अनुभव** है। यह "शब्द अनुभवक्रिया", विलय को दर्शाता है। विलय का अर्थ है "एक दूसरे में मिल जाना"। परंतु क्या वे कभी भी दो वस्तुएं थी जिनका विलय हो जाएगा? वे "**सदा से एक**" ही है। जिनको हमने द्वैत के स्तर पर, अलग अलग करके समझने की कोशिश की। जोकि आपको अद्वैत के ज्ञान / ब्रह्मज्ञान तक पहुंचाने के लिए आवश्यक था। "अस्तित्व" अनुभवक्रिया शब्द विलय को दर्शाता है जो कभी हुआ ही नहीं, इसीलिए "अस्तित्व शब्द" का प्रयोग किया जाता है। जोकि संपूर्णता/एकता/अखंडता/ समग्रता का पर्यायवाची है। अनुभवक्रिया शब्द का प्रयोग केवल ब्रह्मज्ञान के शुरुआती समय में ही किया जाता है, साधक को यह प्रमाणित हो कि सदा से विलय ही है। इसके बाद अनुभवक्रिया शब्द का प्रयोग ज्यादा नहीं किया जाता, क्योंकि "विलय की घटना" कभी घटी ही नहीं। यह सदा से एक ही है। सदा से एक/अखंड/अद्वैत/सम्पूर्ण अस्तित्व ही है, और कुछ नहीं। अब आप समझ सकते हैं कि क्यों अस्तित्व और अनुभवक्रिया को पर्यायवाची शब्दों की तरह प्रयोग किया जाता हैं। क्योंकि दोनों शब्द एक ही बात की ओर इशारा करते हैं कि "अस्तित्व एक है"। परंतु ज्यादा सटीक और तार्किक शब्द अस्तित्व है जिसका प्रयोग किया जाना चाहिए। क्या "अनुभवक्रिया या अस्तित्व का ज्ञान" संभव है? "अनुभव क्रिया का अनुभव" उस "एक" का अनुभव कैसे संभव है? अस्तित्व/अद्वैत/अनुभवक्रिया का अनुभव कैसे संभव है? जो अनुभव कर रहा है और जो अनुभव हो रहा है वो दोनों एक ही है। अब इस एकता का अनुभव कौन कर पाएगा? अनुभवक्रिया अज्ञेय है। जिसको जाना नहीं जा सकता, वही अज्ञेय है। जब अस्तित्व का अनुभव संभव नहीं, तो उसका ज्ञान भी संभव नहीं। नकारात्मक ज्ञान ही संभव है कि "दो नहीं है।" इसीलिए कहा गया है कि "अद्वैत है।" जब अंत में आप अनुभव और अनुभवकर्ता में भेद कर रही चित्त भेदवृत्ति को भी हटा देते हैं या त्याग देते है, तब वह चित्त की स्थिति ही ब्रह्मज्ञान है। इसके विषय में कुछ बोला नहीं जा सकता। बताने के लिए बस इतना कहा जाता है कि "होना मात्र है।" अंततः मौन एकमात्र विकल्प बचता है। धन्यवाद।
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