ज्ञानाक्षर
मूल ज्ञान
जानकी
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गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु गुरुर्देवो महेश्वरः। गुरुर्साक्षात परब्रम्ह तस्मै श्री गुरवे नमः **मूल ज्ञान** मैं ना ही मन, देह, नाम, पहिचान्, नाते, जगत्, वस्तु हूँ। ना मैं जीवन, सृष्टि के जनक हूँ, ना मृत्यु के अस्तु हूँ॥ ना मेरा रुप, वासना, घर, पता, इच्छा नहीं लक्षण। पर ऐसा अनुभव नहीं जगत में मैं ना मिलूँ तत् क्षण॥ स्वयंभू, परिपूर्ण, निर्गुण, सरल शाश्वत, अपार सत्व हूँ। निराकार, असीमित, अनन्त, अविचल, नित्य मैं सार तत्व हूँ॥ कालातीत, हर क्षेत्र के अधिपति, मैं ज्योति के पुंज हूँ। अंधेरा कूप, शून्यता, विकट हूँ, आनन्द के कुंज हूँ॥ ये माया प्रतिबिंब, छद्म रचना, लीला रचाती हुईं। मेरा निर्मल भाव में उभरती संसार नचाती हुई॥ मै विश्वस्मृति, पंचभूत्, गगन हूँ जीव वस्तु मैं नाद हूँ। सारा खेल् सपना झूठा जगत का अभाव, मैं भाव हूँ॥ मेरे तेज प्रकाश के चमक है आकाश, तारा, रवि॥ मैं साकार कण-व्याप्त हूँ, प्रकट में, अस्तित्व मेरा छवि। कोई कर्म नहीं, न याचक, धृत, कर्ता न हर्ता भला। मैं दाता नहीं हूँ, न भक्त, भगवान, भोग्य न मेरा कला॥ सम्वन्ध, अलगाव, भेद्, निकटता कोई न दूरी यहाँ। मेरा ही रुप, भाग, अंग, अवतार, ब्रम्हाण्ड सारा जहां॥ मिथ्या मैं, और सत्य मैं, अनुभवी, मैं ज्ञान हूँ, भ्रम हूँ। साक्षी मैं, ठहराव, दृश्य, गति मैं, द्रष्टा मैं हूँ ब्रम्ह हूँ॥ धन्यवाद *** ज्ञान एवं शब्द साभार - सद्गुरु श्री तरुण प्रधान जी, बोधि वार्ता, ज्ञानदीक्षा कार्यक्रम।