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ज्ञानगीत: मैं शुद्ध हूँ... मैं बुद्ध हूँ...।
सत्यम
मैं निसंग हूं, निरंजन हूं। मैं शुद्ध हूं, मैं बुद्ध हूं। मैं नित्य हूं, तभी तो सत्य हूं। मैं विरक्त हूं, तभी तो मुक्त हूं। मैं निसंग हूं, निरंजन हूं। मैं शुद्ध हूं, मैं बुद्ध हूं। मैं अजर हूं, अमर हूं। निर्लिप्त हूं, तभी तो मुक्त हूं। मैं पूर्ण हूं, संपूर्ण हूं। अनादि हूं, अनंत हूं। मैं निसंग हूं, निरंजन हूं। मैं शुद्ध हूं, मैं बुद्ध हूं। मैं ना सुख हूं, ना दुख हूं। मैं ही तो आनंद हूं, परमानंद हूं। मैं निसंग हूं, निरंजन हूं। मैं शुद्ध हूं, मैं बुद्ध हूं। मैं निसंग हूं, निरंजन हूं। मैं शुद्ध हूं, मैं बुद्ध हूं। "तुम नहीं हो, हे भोले मैं(अहम)...! जो भी है बस मैं(सत्य) हूं। जागो, जानो हे राही(साधक), राह तो कभी थी ही नहीं। तुम(साधक) भूले थे इस धुएं(अज्ञान) से, धुएं में भी तुम, मैं(अनुभवकर्ता) ही हो।" मैं निसंग हूं, निरंजन हूं। मैं शुद्ध हूं, मैं बुद्ध हूं। संकेत: यह गीत आत्मज्ञान में अनुभवकर्ता होकर, गाया गया गीत है। जिसमें अनुभवकर्ता अपना निर्गुण स्वभाव व्यक्त करता है। और अंतिम भाग में ऐसा वर्णित किया गया है कि अनुभवकर्ता स्वयं ही, साधक या बुद्धि को आवाज देकर उसका अज्ञान उसके सामने प्रकट करता है। जोकि काव्य के लिए तो ठीक है परन्तु ज्ञान की दृष्टि से अनुभवकर्ता शून्य है, निर्गुण है, उसमें कोई इच्छा नहीं, कोई ज्ञान नहीं, कोई भावना नहीं, और न ही कोई स्मृति ही है। वह केवल और केवल सर्वव्याप्त अचल दृष्टा है। (इस 'ज्ञानगीत' में प्रयोग किए गए शब्दों का सरल हिंदी में अर्थ है। इन शब्दों का अर्थ किसी और जगह कुछ और हो सकता है परन्तु गीत के लेखक ने नीचे दी गई परिभाषा के अनुसार इस गीत को लिखा है:- **निसंग** : इसका अर्थ है 'अकेला' या 'संग-रहित'। जो किसी के भी साथ बंधा हुआ नहीं है, जो पूर्णतः स्वतंत्र है। **निरंजन** : इसका अर्थ है 'दाग-रहित' या 'निर्मल'। जिसमें माया या संसार का कोई भी मैल या कलंक नहीं है। **शुद्ध** : इसका अर्थ है 'पवित्र'। जो अपनी मौलिक अवस्था में है, जिसमें कोई विकार नहीं है। **बुद्ध** : इसका अर्थ है जिसको सभी अनुभवों का ज्ञान हो रहा है। जिसके द्वारा सबकुछ जाना जा रहा है। जो सबका दृष्टा है। **नित्य** : जो सदा रहने वाला है, जिसका कभी नाश नहीं होता (शाश्वत)। **सत्य** : जो यथार्थ है, जो समय और स्थान के साथ बदलता नहीं है। **विरक्त** : जिसे संसार के विषयों से कोई मोह या लगाव नहीं रह गया है। **मुक्त** : जो जन्म-मरण, कर्ता कर्म आदि सभी नियमों और संबंधों के बंधनों से पूरी तरह आज़ाद है। **अजर** : जिसका कभी क्षय नहीं होता। जिसमें समय के साथ कभी कोई टूट फूट, घिसाव आदि नहीं होता। जो कभी बूढ़ा नहीं होता। क्योंकि वह कोई जीवित या निर्जीव वस्तु नहीं है। **अमर** : जिसकी कभी मृत्यु नहीं होती। **निर्लिप्त** : जो संसार में रहते हुए भी उसमें लिप्त नहीं है, जैसे पानी में कमल का पत्ता। **पूर्ण** : जो अपने आप में पूरा है, जिसे किसी और चीज़ की कमी नहीं है। जिसको कुछ और नहीं चाहिए। **अनादि** : जिसका कोई आरंभ या शुरुआत नहीं है। **अनंत** : जिसका कोई अंत नहीं है। **परमानंद** : जो शांत है/आनंद है, जो बाहरी सुख-दुख से परे है।) धन्यवाद।
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