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ज्ञानतरंग: "अज्ञेयता"
जानकी
<br><br><div class='ui image'><img width='1200px' src='images/89426796-Tarun Taranga.png'></div><br><br> "ज्ञानतरंग" श्रृखला में सद्गुरूदेव श्री तरुण प्रधान जी द्वारा विभिन्न सत्संग, प्रवचन और लेखों में व्यक्त किए गए विचारों में से कुछ प्रमुख ज्ञानतरंगों को महावाणी के रूप में इकट्ठा करके प्रकाशित करने का प्रयास कर रही हूँ। इस लेख में अज्ञेयता से संबंधित कुछ ज्ञानतरंगों को प्रश्तुत किया गया है। यह श्रृखला के रुपमें इससे आगे भी क्रमश: प्रकाशित होता रहेगा। **अज्ञेयता** १। जान कर भी न जानना अज्ञेयवाद है। २। अज्ञेयता का अर्थ अज्ञान नहीं है, सम्पूर्ण ज्ञान है; अज्ञान का नाश ही ज्ञान है। यहाँ पर प्रश्न समाप्त और समर्पण शुरु होता हैं। अज्ञान पूरी तरह से निकलकर व्यक्ति ख़ाली हो जाता है। यहाँ पर व्यक्ति ज्ञान भी नहीं चाहता; क्योंकि ज्ञान भी अज्ञान का प्रतिबिंब है। ३। सारा ज्ञान नकारात्मक है और उसका फल अज्ञेयता है। ४। अज्ञान शोर है, ज्ञान संगीत है, और अज्ञेयता शांति है। ५। अज्ञेयता में सारे खोज विफल हो जाते हैं; अज्ञेयता में ज्ञान भी नहीं अज्ञान भी नहीं, केवल मौन है। ६। संपूर्ण ज्ञान होने के बाद ज्ञान को ही त्याग करके सभी विचारों, अवधारणाओं, मान्यताओं, दर्शनों, परंपराओं से मुक्त और स्वतंत्र स्थिति अज्ञेयवाद है। ७। ज्ञान-अज्ञान द्वैत में है, अज्ञेयता अद्वैत है। अद्वैत को कभी नहीं जाना जा सकता, क्योंकि वहाँ जानने का कुछ नहीं है; केवल होने का है। ८। अनुभवकर्ता ज्ञान/अज्ञान पर निर्भर नहीं है। ९। अस्तित्व अज्ञेय है; कभी नहीं जाना जा सकता, क्योंकि वहाँ जानने और न जानने का कुछ नहीं है, केवल होने का है। वहाँ केवल मौन रह जाता है, मैं अस्तित्व हूँ या ब्रम्ह हूँ यह वाक्य कहने और सुनने वाला भी कोई नहीं होता। १०। भले ही अद्वैत द्वैत रुप में ही दिखेगा, उसका ज्ञान द्वैत में ही होता है; क्योंकि एक को जाना नहीं जा सकता, हुआ जा सकता है; लेकिन सत्य यह है की द्वैत नहीं है। ११। अनुभवक्रिया में कोई ज्ञान नहीं होता। अनुभवक्रिया है इतना ज्ञान संभव है; लेकिन वह क्या है यह जाना नहीं जा सकता। यहाँ ज्ञान और चित्तवृत्ति भी प्रतीति ही लगती है, भ्रम सा लगता है। किसी अवस्था या ज्ञान की चिंता नहीं होती। उस अवस्था में ज्ञान के लिए नहीं जाते; होने के लिए जाते हैं। सहज समाधि की अवस्था ही नित्य है। अन्य अवस्था इसी पृष्ठभूमि में आते/जाते हैं। १२। किसी भी बुद्धि या वृत्ति को चलाकर या रोककर अद्वैत की अवस्था नहीं आ जाएगी। वह अवस्था पहले से है, उसी की पृष्ठभूमि में सारी वृत्तियाँ चलते हैं। १३। ज्ञानाज्ञान, सत्यासत्य, तर्क/वितर्क सभी बुद्धि के अंतर्गत है। अज्ञेयता बुद्धि से ऊपर है। १४। अज्ञेयता में कोई प्रश्न या मान्यता नहीं बचता। १५। जहाँ मौन है, वहाँ अज्ञेयता है। अज्ञेयता में जानने की रुचि बहुत है, लेकिन जब भी जाना जाता है यही जाना जाता है कि कुछ भी जानने योग्य नहीं है। १६। मौन अंतिम ज्ञान है, मौन ही आनंद है। भाषा, शब्द और ज्ञान मौन तक पहुँचने की सीढ़ी है। १७। शून्य में प्रश्न भी है उत्तर भी है, अर्थ भी है अनर्थ भी है। सारा अर्थ-अनर्थ चित्त निर्मित है और चित्त ही शून्य से आया है। शून्य का अर्थ अभाव नहीं है। १८। नाव नदी पार करने के लिए चाहिए; नदी पार करके नाव को लेकर घुमना नही है; छोड़ देना चाहिए। इसी तरह से ज्ञान भी है; स्वयं को जानने के वाद शब्दों का कोई काम नहीं है। शब्द वह नाव है जो अज्ञान के नदी के पार जाने के लिए काम आता है। दूसरे किनारे पहुँच कर उसको छोड़ देना चाहिए, अब उसका कोई उपयोगिता नहीं है। शब्दों का संकेत कहाँ हो रहा है वह जानना ज़रूरी है। १९। ज्ञान का अंत मौन में होता है, शब्दों में नहीं। २०। ज्ञानमार्ग में ज्ञान नहीं होता, ये मार्ग अज्ञेयता के ओर ले जाता है और यही ज्ञानी का लक्ष्य है, जानकर भी न जानना; होना महत्वपूर्ण है। जानना बुद्धि की स्तर की बात है। २१। अज्ञान भी एक तरह का ज्ञान है जिसको मान्यता कहते हैं। अज्ञानी इसी को ज्ञान मानता है और ज्ञानी अपना ज्ञान को ज्ञान मानता है। दोनों के कथनी में कोई अंतर नहीं है। अज्ञेयबादी दोनों का मिथ्या जानता है। अस्तित्व में दोनों नहीं है। सब जानने के बाद भी कुछ जानने का है नहीं; जो है सो है। २२। अज्ञेयता में जो जानने योग्य है वह जान लिया गया है अब जानने के लिए कुछ नहीं है, यहाँ संतुष्टि है, संतुष्टि ही आनंद रुप में दिखेगी। २३। अज्ञेयता संघर्ष का अंत है लेकिन कुछ न जानने की निराशाजनक स्थिति नहीं है। हार मान लेना अज्ञेयता नहीं है; अज्ञेयता जीत है। इसलिए अज्ञेयता में आनंद है। २४। अज्ञेयता में सभी अज्ञान, प्रश्न और वाद-विवाद समाप्त हो जाते हैं। २५। अज्ञेयता में सब कुछ जान कर ज्ञान के सारे अध्याय ही बन्द कर दिये जाते हैं, पवित्रता, निश्छलता और मौन शेष रहता है। व्यक्ति शांत, निश्चिंत और मौन हो जाता है। स्वतंत्रता उसका स्वभाव बन जाता है। २६। अज्ञेयवाद (रहस्यवाद) अन्य सभी स्थितियों से श्रेष्ठ है, ज्ञान के सीमाओं से परे है; इसके आगे जानने के लिए कुछ भी नहीं होता। यहाँ शुद्धता, शून्यता और पूर्णता है। २७। वेद का अर्थ होता है-जानना। वेद/ज्ञान का पहुँच केवल द्वैत तक ही है। अद्वैत के स्तर पर अज्ञेयता है। यहाँ से आगे बुद्धिका कोई उपयोग नहीं है, सारे वेद/ज्ञान का अंत हो जाता है; इसलिए अद्वैत वेदांत कहा गया है। २८। जैसे ही कुछ आसक्ति और परतंत्रता आती है, व्यक्ति सीमित हो जाता है। अज्ञेयवादी असीमित है। असीमित होने के लिए सब का त्याग आवश्यक है। २९। अज्ञान का नाश होते ही ज्ञान का भी नाश होता है, इसलिए ज्ञानी कोई नहीं है, अज्ञेय है। ३०। ज्ञान रोटी का चित्र है, अज्ञेयता रोटी स्वयं है। रोटी का चित्र देखकर भूख नहीं मिटती। अस्तित्व का ज्ञान नहीं होता, होना पड़ता है, जो मैं पहले से हूँ। ३१। अज्ञेयवादी कुछ जानने का प्रयास नहीं करता; क्योंकि वह जानता है कि जानने के लिए कुछ नहीं है और ना वह अज्ञान में है; साक्षीभाव में रहता है। ३२। अज्ञेयवादी को सीधा ज्ञान होता है। ज्ञान का अर्थ शुद्धता और ख़ालीपन है। जो भी जाना गया है उस पर प्रश्न चिन्ह लगाते ही अज्ञेयता प्रकट होती है। ३३। अज्ञेयवादी उपदेश नहीं देता। तर्क वितर्क नहीं करता। वह मुक्त और वैरागी होता है। बुद्धिमान और शुद्ध बुद्धि वाला हो जाता है। ३४। अज्ञेयवादी ज्ञान का दास नहीं है, वह स्वतंत्र है, मुक्त है। ३५। जो अज्ञेय है वहाँ कोई ज्ञान/अज्ञान नहीं कुछ सत्य/असत्य नहीं। अज्ञेय के आगे या ऊपर कुछ भी नहीं है। अज्ञेय होना बुद्ध होना है, जो बुद्धि के ऊपर है। बुद्ध सब कुछ जानकर भी कुछ नहीं जानता। ३६। बुद्धि ही वह चाकु है जो अज्ञान को काटने में प्रयोग होता है। बुद्धि का उपयोग करके बुद्धि से उपर जाना ही बुद्ध होना है। ३७। व्यक्ति की ज्ञान के स्तर अनुसार एक ही प्रश्न के अलग-अलग उत्तर होते हैं। ज्ञानी लिए कोई उत्तर नहीं होता; क्योंकि वह अज्ञेयता के स्तर पर पहुँच चुका है; जहाँ केवल समर्पण है। समर्पण भाव में प्रश्न नहीं रहता। ३८। ज्ञान का अंतिम पड़ाव समर्पण है। ज्ञान के बाद समर्पण आता है। यदि नहीं आया तो ज्ञान नहीं हुआ। जो नियंत्रण का मार्ग है वह भी समर्पण में ही ले जाता है। ३९। सत्यासत्य के परे, ज्ञानाज्ञान के परे जो अज्ञेय है मैं वह चैतन्य हूँ। ४०। मौन ज्ञान का सार है। क्रमश:
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