ज्ञानाक्षर
उत्तरायण
निशिगंधा क्षीरसागर
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प्रकाश दिशा उत्तर की उत्तर समाधान पाने की जो है मार्ग उत्तरायण अधम दिशा अंधेरे की ज्ञान प्रकाश अभाव की शंका संशय विनाश की तामस गुण से तमस मार्ग जो है मार्ग दक्षिणायन उत्तरायण हो चाहे दक्षिणायन शुल्क कहो चाहे कृष्ण मार्ग दो लक्ष्य एक जिसकी जैसी हो कामना वैसा मार्ग उसे पाना क्यू की.... अस्तित्व है अनंत संभावना कारण एक प्रभाव अनेक अहं विकार अविवेक अनेक जितने अंत:करण उतने जीव अज्ञान के आवरण अनेक जीव अनेक आत्मा एक जीवरुपी सरिता मार्ग अनेक ज्ञान सागर निश्चल एक त्यागकर रूप रंग मार्ग अनादी अज्ञान के आकार नदी सागर में जाकर समुन्दर बन जाये अपार जैसे जीव ब्रह्म एकता .....!!! शुल्क है शुद्ध प्रकाश कृष्ण है रात्री अप्रकाश शुक्ल और कृष्ण दो पक्ष दो मार्ग तमस प्रकाश दो द्वार प्रवेश निकास सधना है एकही लक्ष्य राहे लगती भिन्न भिन्न भिन्न दिखते... है अभेद जो दिखता होता नहीं अद्वैतही अस्तित्व की पृष्ठभूमी जैसा जिसका है अंत:करण वैसा मार्ग वैसी राह सबके लिये बने रास्ते सारे मार्ग है सनातन सबकी प्रगती सबकी उन्नती राह दिखती अलग अलग.....!!! सदियों पुराना अज्ञान लिये भटकता रहा दस चौराहे जनम जनम पुराना जीव लिये पुराने संस्कार स्मृती घूम आया लख चौरासी हर जनम एकेक योनी प्रगती करकर मनुष्य बना एक जनम एक सपना सपनेमें सारा भ्रम देखता निंदसे जब उठकर जागता जगनेपर वह सपना पाता स्वप्न मिथ्या द्रष्टा खरा जीवन भी एक सपना जीवन खोटा मै खरा जो सत्य नित्य ब्रह्म उसीमें अज्ञान सपना घटा दृष्टीके है पहलू दो एक शुक्ल एक कृष्ण प्रकाश अंधियारा दृष्टी दो सिक्के के भी पहलू दो दो द्वार हमेशा सामने ऊर्ध्व अधो उपर नीचे सबकी अपनी अपनी दृष्टी जैसी दृष्टी वैसी सृष्टी एक जागृती एक बेहोशी जैसा चाहो पाओ परिवर्तन शुक्ल कृष्ण उत्तरायण दक्षिणायन.....!!! अविद्या बेहोशी कारण बना ब्रह्म अज्ञानी जीव बना आत्मासे विंन्मुख मायामें फसा अज्ञानवश असत हि सत माना देहबुद्धी से जनम मरण हुवा बारबार आना जाना हुवा बेहोश होकर आना हुवा वही दुःख का कारण बना देखनेवाले पर दृष्टिकी स्थिरता होशपूर्ण देखते हि पूर्णता साक्षीभाव जीवन साधना बना इसमे दृढता जीवन की सार्थकता अब प्रकाशका मार्ग खुला गन्तव्यद्वार अब आरोहण बना उन्नत शुक्लमार्ग जागरण उत्तरायण स्वरूप अवस्था में स्थित होना जो है सो हो जाना अब नहि वापस लौटना पुनरावर्तन अब न दोबारा.....!!!! जो रखता यह स्मरण उसका नहीं है पुनरागमन विस्मरण स्वरूपका कारण बना अज्ञान से मल में फसा तत्वसे जानकर ज्ञानपूर्ण होश होशमें जो स्वरूप देखता वही होशको प्राप्त होता तत्वको जानकर वही हो जाता ब्रह्मविद ब्रह्म हो जाता....!!! ब्रह्मविद ब्रह्म हो जाता....!!! ll श्रीकृष्णार्पणमस्तु ll