Wise Words
एक चर्चा - आत्म ज्ञान पर
रमाकांत शर्मा
एक साधक, एक जिज्ञासु से आत्म-ज्ञान के विषय में कहता है... आप समस्त वस्तुओं के साक्षी हैं वस्तुएँ नहीं। आप समस्त जगत के साक्षी हैं, जगत नहीं। आप वाह्य शरीर के साक्षी हैं शरीर नहीं। आप अंतरिक शरीर (सम्वेदनाओं) के साक्षी हैं, संवेदनाएँ नहीं हैं। आप भावनाओं के साक्षी हैं, भावनाऐं नहीं। आप विचारों के साक्षी हैं, विचार नहीं। आप इच्छाओं के साक्षी अथवा दृष्टा हैं इच्छाएं नहीं। आप स्मृति के साक्षी/दृष्टा हैं स्मृति नहीं। आप मात्र साक्षी अथवा दृष्टा हैं, साक्ष्य अथवा दृश्य नहीं। आप ऊपर लिखित कुछ नहीं हैं। इन सबको हटाकर जो शेष बचता है वो आप हो। शेष तो कुछ बचता नहीं। तो क्या आप हो ही नहीं? नहीं। आप हैं, मात्र हैं, आप अनुभव करने वाले हैं या सारे अनुभव आपको हो रहे हैं। आप साक्षी हैं। आप दृष्टा हैं। आप अनुभव नहीं हैं। आपको कोई राडार पकड़ नहीं सकता। आप /आपका तत्व निराकार है। आपका कोई रंग, रूप, आकार नहीं है। आप स्त्री-पुरुष कोई नहीं हैं। आप हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई नहीं हैं। आप निर्गुण हैं। गुणातीत हैं। आप अनुभवकर्ता हैं। आप जन्म मृत्यु से परे हैं। अविनाशी हैं। आपका प्रारंभ और अंत नहीं है। आप कालातीत हैं। आप की कोई सीमा नहीं दिखती। असीम हैं। समस्त देश, स्थान आपमें हैं। आपसे सारे अनुभव प्रकाशित हैं। आप प्रकाशमान हैं। आपको समस्त अनुभवों की चेतना है अतः आप चैतन्य हैं। आप सत्य हैं, नित्य हैं। आप सुख दुख से परे आनंद हैं। आप सच्चिदानंद हैं। सारे रूपों से एक ही साक्षी अनुभव ले रहा है। या एक साक्षी के सारे रूप हैं। यहाँ सब रूपों में विशुद्ध प्रेम प्रकट है। साक्षी/आप प्रेम स्वरूप हैं। यही आपका तत्व है। यही अस्तित्व का तत्व है।
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