ज्ञानाक्षर
मन के पार है जाना सखी री
स्वप्रकाश
लेख पसंद करें
जीव/मनोशरीर यंत्र स्वयं के सत्य स्वरुप (अनुभवकर्ता/आत्मन/साक्षी/दृष्टा) की खोज में दर दर कई जन्मों से भटक रहा है. उस जीव की विरह पीड़ा को इस ज्ञान गीत के माध्यम से प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है। यहाँ पर ***जीव*** को एक विरह में व्याकुल स्त्री के रूप में एवं ***अनुभवकर्ता*** को उसके पिया के नाम से संबोधित किया गया है। मन के पार है जाना सखी री, मन के पार है जाना । मन के पार ही पिया मिलेंगे। आत्मबोध से पिया को है पाना। मन के पार है जाना सखी री, मन के पार है जाना । मैं थी पागल बावरी ढूंढू जगत में मोरे सैयां, वो तो मन के पार है बैठा, जन्मों से थाम के मोरी बैयां। १ मैं जित जाऊं, पिया को पाऊं चुपके से देखे मोरे सैयां। मैं चाहे जागूं मैं चाहे सौऊं, मोहे निहारे मोरे सैयां।। २ मन के पार है जाना सखी री, मन के पार है जाना । पिया से एसी प्रीत लगी, कहीं चैन न पाए चित मोरा। चाहे दिन हो, चाहे रैना विरह में भींगे मोरे नैना।। ३ जन्मों से है मोरी पिया मिलन की प्यास। फिर भी न जाती, मोरे प्रीतम के दरस की आस।। ४ मन के पार है जाना सखी री, मन के पार है जाना । घर आंगन गलियारे ढूंढें देश विदेश। जड़ चेतन सभी में ढूंढा, कहीं न पाए मोरे पिया ।। ५ पिया से मिलन की विरह में, मैं तड़पू जैसे जल बिन मीन। कितने जनम और लूं पिया, मिलन की प्यास बढ़े दिन रैन।। ६ मन के पार है जाना सखी री, मन के पार है जाना । इक दिन गुरु ने करुणा दिखाई, मोरे पर ज्ञान की वृष्टि कराई। आत्मबोध को पाकर के, मन के पार मैं पिया को पाई।। ७ अब तो पिया में ही मैं रम जाऊं, पिया में ही मैं मोरे राम को पाऊं। पिया के रंग में मैं चुनरी रंग के। मन के पार मैं भी चली जाऊं।। ८ मन के पार है जाना सखी री, मन के पार है जाना । मन के पार ही पिया मिलेंगे। आत्मबोध से पिया को है पाना। मन के पार है जाना सखी री, मन के पार है जाना । <font color="green">**सभी सुखी हों, सभी समृद्ध हों, सभी ज्ञानवान हों, सभी सत्य जानें ........**</font> <font color="green">**श्री गुरुवे नमः ....ॐ शांति शांति शांति .....**</font> <font color="blue">**आभार: मैं परम श्रद्धेय गुरुदेव श्री तरुण प्रधान जी एवं गुरुक्षेत्र का उनकी शिक्षाओं एवं मार्गदर्शन के लिए आभारी हूँ।**</font> संपर्क सूत्र.. साधक की कलम से : स्वप्रकाश....... ईमेल: swaprakash.gyan@gmail.com