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ज्ञान मार्ग अनुसार योग के आठ अंग
વિશાલ પટેલ
# यम:- - मैं ब्रह्म हूं ऐसा विचार करना और जो कुछ भी दिख रहा है वह मेरा ही स्वरुप है ऐसा समझना यम कहा जाता है - यह ज्ञान रखते हुए कि सब कुछ ब्रह्म है, इन्द्रियों के समुच्चय को विषयों में जाने से रोकना और इसका प्रतिदिन अभ्यास करना यम कहलाता है। - यम द्वारा इंद्रियों के संयम से नहीं है। उनके लिए मन के ज्ञान पर आधारित संयम (सम्+यम) ही सच्चा "यम" है। - स्वरूप को समझकर, आँखें केवल मुझे ही देखेंगी, कान मेरा गुणगान सुनेंगे। जिह्वा मेरे गुणों का गान करेगी, चरण मेरी परिक्रमा करेंगे। मन स्वर्ग, देवताओं और वैकुंठ को छोड़कर समाधिस्थ होकर मुझे ही पाएगा। # नियम:- - आत्मा का विचार यानी कि सत्य का विचार और अनात्मा का विचार यानी कि नाम रूप दृश्य प्रपंच का विचार. - मेरे शुद्ध स्वरूप में चित्त जैसी कोई चीज नहीं और चित्त नहीं तो भेद नहीं और भेद नहीं तो दृश्य प्रपंच नहीं. - जो अशुद्ध मन ही नाबूद हो जाए, तो मात्र शुद्ध मन ही रह जाता है और शुद्ध मन और चैतन्य ब्रह्म अलग नहीं है. - ऐसे शुद्ध मन को जहां-जा जाना है वहां जाने दो उसे कोई नियम या संयम की जरूरत नहीं है. वह जहां भी जाएगा वहां ब्रह्म ही होगा. - मैं सदैव मुक्त हूं. बंधन तो चित्त का ख्याल मात्र है. # आसन:- - कोई भी तरीके से बेठ के ब्रह्म का सुख रूप, निरंतर चिंतन किया जाए उसे आसन की समझना चाहिए. # प्राणायाम:- - चित्त में तमाम दृश्य पदार्थो में ब्रह्म भावना रखने से सर्व वृत्तियों का निरोध होता है उसे प्राणायाम कहते हैं. - रेचक प्राणायाम= संसार का मिथ्यापन स्वीकारना, मिथ्या जगत को इनकार करना और प्रपंच को मन से बाहर निकाल देना वह रेचक प्राणायाम है. - पूरक प्राणायाम= में ब्रह्म हूं ऐसी जो वृति है वह पूरक प्राणायाम है. - कुंभक प्राणायाम= में ब्रह्म हूं ऐसी वृत्ति में दृढ़ता होना वह कुंभक प्राणायाम है. - प्रपंचों का निषेध= पांच विषयों, पांच ज्ञानेंद्रिय, पांच कर्मेंद्रियां, पंचमहाभूत, पांच प्राण, पंच तन्मात्रा का निषेध करना. # प्रत्याहार:- - प्रत्याहार यानी की भेदद्दर्शी चित्त को डूबा के अभेद दर्शन करना और स्व-स्वरूप का ज्ञान होना प्रत्याहार कहा जाता है. # धारणा:- - जहां-जहां मन जाए वहां वह ब्रह्म है ऐसा जानकर मन में जो स्थिरता आती है. वही धारणा श्रेष्ठ धारणा मानी जाती है. - वस्तु, देश और काल है ही नहीं. वह तो प्रतीति मात्र है. मैं यह तीनों से मुक्त हूं. यह सापेक्ष है और मैं निरपेक्ष हूं. यह भाव को स्थिर करना वही निदिध्यासन है. # ध्यान:- - ब्रह्म ही सत्य है ऐसी वृत्ति रख के और में ब्रह्म हूं ऐसी सदवृत्ति रख के जो स्थिति दिखती है वही परम आनंद देने वाली स्थित है और इस स्थिति को ध्यान कहते हैं. - जिसका श्रवण हुआ हो उसका ही मनन होता है और जिसका मनन हुआ हो उसका ही निदिध्यासन हो सकता है. - सब कुछ मैं ही हूं तो फिर ध्यान किसका करूं? ## समाधि:- - ब्रह्म यानी की वृत्ति शून्यता. - ब्रह्म का चिंतन करते-करते ब्रह्म हो जाने से वृत्ति का ही निरोध हो जाना ऐसा ज्ञान ही समाधि है. - क्षणे-क्षणे जागृति ही समाधि है. - अपरोक्ष अनुभूति यानी की स्वंयं द्वारा, स्वंयं को होने वाला, स्वयं का अनुभव.
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