Wise Words
कविता संग्रह ४
अनागामी
प्रणाम सभी आत्मन को, १. **गुरु शरीर** पंच प्राणों और पंच भूतों से बना शरीर ये कमाल है। सब जीव शरीरों में है जानो मानव देह बेमिसाल है। है बुद्धि और विवेक इसमें, देता जगत का ज्ञान है। इसमें है शक्ति मिटा दे जो मिथ्या रूपी अज्ञान है। जिस शरीर ने जाना स्वयं को वो तो बड़ा महान है। गुरु रूप में अवतरित हो वो चलता फिरता इंसान है। गुरु शरण हो मनोशरीर जब जाना लेता स्वयं को, आत्मज्ञान से ही मिल जाता उसे तब जो ब्रह्मज्ञान है। २ . **अनुभव हूँ मैं** खिलता हुआ कमल हूँ मैं, बहता हुआ पवन हूँ मैं। बहती हुई नदियों की धारा, निरंतर सभी परिवर्तन हूँ मैं। मृत्यु भी मैं और जनम भी मैं, आना भी मैं और गमन भी मैं। लय भी मैं और प्रलय भी मैं। संयोग भी और विलय भी मैं । अनंत भी मैं और वृत्त भी मैं। कभी ठहरा नहीं, नित्य हूँ मैं। न आदि है ना अंत है, संभावनाएं अनंत हैं। सत्य नहीं प्रतीति हूँ मैं। मिथ्या- रूपी आकृति हूँ मैं। ३ . **इंद्रियाँ और बुद्धि** सच बताती हैं इंद्रियां या भरमाती हैं? क्या जो है जैसा उसे वैसा दिखाती हैं? क्या टमाटर लाल और हरी होती हैं सब्जियां? क्यों वक्त की कभी कमी कभी अधिकता बताती है? जो इंद्रियों ने संचित किया वही जाना जाता है। जो बुद्धि ने भेद किया वही सत्य माना जाता है। हैं इंद्रियां भी मिथ्या और ऐसी ही है बुद्धि भी। मूल को दिखाती नहीं कर लें जितनी शुद्धि भी। द्वंद छोड़ इंद्रियों सहित जब बुद्धि समर्पित होती है। साधक स्वयं हो जाता ज्ञान, ज्ञान में ही स्थिति होती है। माया सहित इंद्रियों से छुटने की है युक्ति यही। सही मायने में होती है तब, कहते जिसे मुक्ति सभी। ४ . **विकास** क्या है विकास और होता है किसका? क्या है जीव और क्या होता है इसका? अज्ञान रूपी शून्य के आवरणों में, ज्ञान का शून्य ही गिरफ्तार है। जिस गति से वो तोड़े इन्हें वो, वह ज्ञानशून्य की रफ्तार है। मनुष्य के इतर सब जीवों में, माया के अधीन स्वत: विकास होता है। बुद्धि के तलवार से जब कटे अज्ञान, शून्य को वो शून्य में ही स्थित पाता है। ज्ञान से विकसित हो गुण और गुणों से ज्ञान, त्याग हो इन दोनों का भी,तो छू न पाता अज्ञान। ५ . **साक्षी हूँ मैं** साक्षी हूँ मैं, साक्षी हूँ मैं, सारे जगत का साक्षी हूँ मैं, मन के विचारों का साक्षी हूँ मैं, अच्छे बुरे भावों का साक्षी हूँ मैं, भूख, प्यास पीड़ा और दर्द, सब संवेदनाओं का साक्षी हूँ मैं। सुषुप्ति, जागृति, निद्रा और तुरीय, सभी अवस्थाओं का साक्षी हूँ मैं। ज्ञान, अज्ञान, विज्ञान, आत्मज्ञान, सभी स्थितियों का साक्षी हूँ मैं। अभाव,समभाव, प्रेमभाव, मैत्रीभाव, सब भावों का साक्षी हूँ मैं, सब परिवर्तनों, रूप नामों का, मिथ्या समय स्थान का साक्षी हूँ मैं। लोक, परलोक, मृत्युलोक, पाताललोक, सब लोकों का साक्षी हूँ मैं। इन सब का साक्षी हूँ मैं। पर इसके से कोई नहीं। सब की होती प्रतीति है, परन्तु सत्य है कोई नहीं। नहीं मैं कोई परिवर्तन रहता स्थिर सदा, सब मुझसे है पर होते हैं सब यदा कदा, ज्ञान भी मैं अज्ञान भी मैं और न ज्ञान न अज्ञान मैं। आत्म मै, अनात्म मैं सब भूतों सहित ब्रह्म भी मैं।
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