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अज्ञान से ज्ञान की ओर
स्वप्रकाश
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***श्री गुरवे नमः*** *अज्ञान जीवन में एक धीमे विष की तरह कार्य करता है.* इस लेख का मुख्य उद्देश्य अज्ञान को जानना है। मैं स्वयं भी ज्ञानमार्ग पर आने से पूर्व अज्ञान से ग्रसित था और स्वयं के अज्ञान से अनभिज्ञ था। इसके अतिरिक्त कई प्रकार के शब्द और अज्ञान ही बढ़ा रहे थे। इसलिये गुरुदेव एवं गुरुक्षेत्र की कृपा एवं मार्गदर्शन से मैंने इन्हें एक जगह संकलित करने का एक छोटा सा प्रयास किया है। इस लेख की ज्यादातर सामग्री ज्ञानदीक्षा कार्यक्रम एवं बोधिवार्ता यू-ट्यूब चैनल के विडियो से ली गयी है एवं कुछ अंतर्जाल (इन्टरनेट) पर उपलब्ध सूचना को संकलित किया गया है। इनके अतिरिक्त मैंने स्वयं के अनुभव से भी कुछ ज्ञान को यहाँ संकलित करने का प्रयास किया है। मुझे उम्मीद है कि सभी साधक इससे लाभान्वित होंगे। **अज्ञान क्या है?** ज्ञान का अभाव ही अज्ञान है। किसी विषय-वस्तु के बारे में किसी भी जानकारी को बिना प्रमाण के स्वीकार कर लेना ही अज्ञान का कारण है। चित्त में किसी विषय-वस्तु की जानकारी का अतार्किक संयोजन अज्ञान उत्पन्न करता है। ज्ञान क्या है?: अनुभवों का चित्त की स्मृति में क्रमिक एवं तार्किक (नियमबद्ध) संयोजन ही ज्ञान है। **ज्ञान के मान्य साधन:** **अपरोक्ष अनुभव:** स्वयं की इन्द्रियों से किया गया प्रत्यक्ष अनुभव ही अपरोक्ष अनुभव है। सभी अनुभव इन्द्रियों के माध्यम से होते हैं एवं अनुभवों के तार्किक संयोजन से ज्ञान होता है। यदि संयोजन अतार्किक है तो अज्ञान का कारण होता है। जैसे चीनी मीठी होती है यह यदि आपने स्वयं इसे चख लिया है तो यह आपका अपरोक्ष अनुभव है। और यदि आपने इसे कहीं पढ़ कर बिना चखे मान लिया तो यह केवल जानकारी है। **अनुमान (तर्क):** अपरोक्ष अनुभव के आधार पर किया गया अनुमान ही तर्क है। जैसे दूर स्थान पर धुआं देखकर हम अग्नि का अनुमान लगा लेते है। जैसे हम अनुमान लगाते हैं कि आम के बीज से आम का पेड़ ही उत्पन्न होगा। मानव की प्रजाति से एक मानव ही उत्पन्न होगा। ये सभी हमारे पूर्व अनुभव पर आधारित किया गया अनुमान है। इसे ही तर्क शक्ति कहते है। इस प्रकार तर्क भी मूल रूप से अपरोक्ष अनुभव पर ही आधारित होता है। >अपरोक्ष अनुभव ही ज्ञान का आधार है। अपरोक्ष अनुभव के बिना जो कुछ भी माना जाता है वह अज्ञान है। तार्किक संयोजन को हम निम्न उदाहरण से समझ सकते हैं। **तार्किक अर्थात नियमबद्ध संयोजन:** यदि किसी घटना की पुनरावृत्ति/दोहराव होता है अर्थात वह एक नियम बद्ध तरीके से कार्य कर रही है। जैसे एक बीज से सर्वप्रथम जड़ बनती है फिर उसके बाद प्ररोह (Shoot) बनता है फिर पत्तियां, शाखाएँ, फूल, फिर फल एवं फिर फल के पकने पर उसमें परिपक्व बीज निर्मित होते हैं और यह प्रक्रिया बार बार इसकी क्रम में नियमानुसार होती है। इस अनुभव का हमारी स्मृति में संयोजन ही ज्ञान है। **इस प्रक्रिया का अतार्किक अनुभव:** जैसे कभी पहले प्ररोह बन जाए, या बिना फूल के फल बन जाए तो आप यहाँ देख सकते हैं कि घटनाएँ नियमबद्ध न होकर यादृच्छिक (randomly) रूप से होती हैं तो हमारी बुद्धि उसका निष्कर्ष नही निकाल पाती इस कारण उसका संयोंजन नहीं कर पाती और वह अज्ञान कहलाता है जैसा कि स्वप्नों में होता है. वहां कोई भी वस्तु किसी से भी अतार्किक रूप से निर्मित हो जाती है। **अज्ञान क्यों है?** अज्ञान को न जानना ही अज्ञान का मूल कारण है। यदि किसी व्यक्ति विशेष की बात करें तो कम बुद्धि एवं तर्क शक्ति का अभाव अज्ञान का कारण होता है। अज्ञान को आरोपित करने में हमारे समाज एवं परिवार का मुख्य योगदान होता है। समाज से हमें मान्यताएं, धारणाएँ, अन्धविश्वास प्राप्त होते हैं, क्योंकि हमारे परिजन एवं समाज स्वयं अज्ञान से भरे हैं इसलिये वे कभी इन मान्यताओं एवं धारणाओं पर प्रश्न करने एवं उन्हें प्रमाणित करने का मार्ग ही नही बताते। एक बुद्धिमान एवं शिक्षित व्यक्ति इन मान्यताओं एवं अंधविश्वासों को सत्यापित कर सकता है, किन्तु कम बुद्धिमान अशिक्षित व्यक्ति जिसमें तर्कशक्ति का भी अभाव होता है वह अज्ञान को बिना विचार किये ही स्वीकार कर लेता है। यहाँ मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि एक बुद्धिमान एवं शिक्षित व्यक्ति अज्ञानी नहीं हो सकता। वह कोई भी, जो अज्ञान को नहीं जानता उसमें अज्ञान अवश्य होता है। और यदि सम्पूर्ण चित्त अर्थात अस्तित्व की बात करें तो इसमें अज्ञान का कोई कारण नहीं है। अज्ञान एवं ज्ञान बस है। अज्ञान से ज्ञान होना प्रगति को दर्शाता है। और ज्ञान से अज्ञान होना पतन को दर्शाता है। फिर प्रगति एवं पतन भी एक अवधारणा मात्र है। अस्तित्व बस है। क्यों है कैसे है इसका कोई कारण एवं प्रक्रिया नहीं है। **अज्ञान कैसे है?** अज्ञान हमारे चित्त में विषय-वस्तुओं एवं घटनाओं के अतार्किक (अनियमित) संयोजन से है। क्योंकि यहाँ संयोजन अनियमित होता है इसलिये अज्ञान के होने की कोई प्रक्रिया है यह कहना उपयुक्त नहीं है। समाज से प्राप्त विभिन्न प्रकार की मान्यताएं, धारणाएँ, अन्धविश्वास एवं कल्पनाएँ अज्ञान का कारण हैं। **अज्ञान कितने/कितना है?** अज्ञान कि मात्रा को जाना नहीं जा सकता उसे केवल तुलनात्मक रूप से बताया जा सकता है। अक्सर एक अनपढ़ व्यक्ति में एक पढ़े लिखे व्यक्ति कि तुलना में अधिक अज्ञान होता है। अस्तित्व में ज्ञान एवं अज्ञान दोनों के बराबर प्रमाण में होने ही सम्भावना मात्र है। **अज्ञान कब से है?** एक व्यक्ति अबोध (जिसमें ज्ञान एवं अज्ञान दोनों का अभाव हो) पैदा होता है। व्यक्ति के जन्म लेते ही परिवार एवं समाज से अज्ञान प्राप्त होना शुरू हो जाता है। यदि हम अस्तित्व के स्तर पर बात करें तो कह सकते हैं कि ज्ञान एवं अज्ञान अस्तित्व में दोनों के होने की बराबर सम्भावना है। समय की अवधारणा अस्तित्व पर लागू नही होती है इसी प्रकार अस्तित्व में अज्ञान एवं ज्ञान बस है इनके होने का कोई समय एवं कारण नहीं है। समय एवं कारण केवल चित्त निर्मित अवधारणा मात्र है। **अज्ञान की सत्यता** अज्ञान एवं ज्ञान दोनों ही परिवर्तनशील अनुभव हैं इसलिये ज्ञानमार्ग में दोनों ही असत्य हैं। **अज्ञान के प्रकार** यहाँ पर अज्ञान के कुछ प्रचलित प्रकार बताए गए हैं। इनके अतिरिक्त और भी हो सकते हैं। **<font color="blue">१.मिथ्या प्रत्यक्षण/ मिथ्याभास (Misperception):</font>** संवेदी अंगों से प्राप्त त्रुटिपूर्ण सूचना के कारण अनुभव की गलत व्याख्या करना जिससे गलत दृष्टिकोण बनता है। यह त्रुटिपूर्ण अनुभव के कारण होता है। यह संवेदनों के ग्रहण करने की प्रक्रिया में त्रुटी के कारण होता है जिसकी वजह से हम वास्तविकता को उसके सही रूप में अनुभव नही कर पाते। यह अक्सर क्षणिक होता है और साधारणतया दृष्टि भ्रम होता है। उदाहरण: अंधरे में एक रस्सी को सर्प मान लेना या फिर रेगिस्तान में दिखने वाली मृग मरीचिका। मिथ्याभास निम्न दो प्रकार के हो सकते है। **<font color="green">(अ)भ्रम (illusion):</font>** संवेगी अंगों से त्रुटिपूर्ण/ मिथ्या अनुभव होना। यहाँ कोई व्यक्ति किसी उद्दीपक अर्थात विषय-वस्तु को गलत तरीके से समझता है। इसका कारण हमारे संवेगी अंगों में त्रुटी या फिर हमारे मस्तिष्क की गलत कार्यप्रणाली के कारण होता है। अक्सर, भ्रम व्यक्ति के पूर्वाग्रह, अस्पष्ट संवेदना, विषय के वातावरण, व्यक्ति की मनःस्थिति, संस्कार, ज्ञान का स्तर आदि पर निर्भर करते हैं। **<font color="green">(ब) मति-भ्रम (Hellucination):</font>** किसी उद्दीपक अर्थात विषय-वस्तु के अभाव में संवेगी अंगों से त्रुटिपूर्ण/ मिथ्या अनुभव होना। इसका कारण व्यक्ति के तंत्रिका तंत्र अर्थात संवेगी अंगों में त्रुटी या फिर मस्तिष्क की त्रुटिपूर्ण कार्यप्रणाली के कारण होता है। व्यक्ति का शारीरक एवं मानसिक रोग जैसे अवसाद, साइकोसिस (Psychosis), नशीली दवाओं का सेवन, अपर्याप्त नींद आदि इसके कारण हो सकते हैं। जैसे जुकाम होने पर वस्तुओं की यथार्थ गंध न आना (Phantosmia). अकेले में किसी के होने का भ्रम होना, किसी विषय-वस्तु के होने की आवाज आना (फुसफुसाने की, घंटियों की आवाज़), शरीर में चींटियों के चलने की अनुभूति होना (formication) आदि। यह व्यक्ति की मनःस्थिति, संस्कार, ज्ञान का स्तर आदि पर निर्भर करते हैं। **<font color="blue">२. मिथ्या धारणा (Misconception):</font>** एक गलत तरीके से समझा गया विचार, धारणा या सिद्धांत। धार्मिक/सामाजिक/ पारिवारिक मान्यताएं, गलत निष्कर्ष या समझ, कम बुद्धि या अधूरा ज्ञान इसके मुख्य कारण है। यह संज्ञानात्मक त्रुटी है। उचित शिक्षा एवं प्रमाण के आधार पर इसे दूर किया जा सकता है। जैसे विज्ञान एवं गणित के नियमों या सिद्धांतों की मिथ्या धारणा होना। उदाहरण: विज्ञान के प्रमाण के पूर्व यह मिथ्या धारणा थी कि पृथ्वी चपटी है और सभी ग्रह एवं सूर्य पृथ्वी के चारों ओर चक्कर लगाते हैं। >मिथ्या धारणा (Misconception) एवं मिथ्या प्रत्यक्षण/ मिथ्याभास (Misperception) एक दूसरे को प्रभावित कर सकते हैं। यदि आपको किसी के बारे में मिथ्या धारणा है तो आपको मिथ्याभास हो सकता है। >प्रत्यक्षण (Perception): संवेदी अंगों के माध्यम से किसी विषय-वस्तु की अनुभूति होना। **<font color="blue">३.धारणा (Assumption):</font>** अस्थायी और वर्तमान स्थिति एवं अपूर्ण तथ्यों पर आधारित एक अल्पकालिक अनुमान जिसे कुछ समय के लिये सत्य मान लिया गया है। धारणा नए तथ्य एवं प्रमाण द्वारा जल्द ही नष्ट हो जाती है। यह अक्सर जान-बुझ कर किया जाने वाला अधूरा अनुमान होता है। इसके निम्न प्रकार हो सकते हैं. **<font color="green">वैज्ञानिक धारणाएं (Scientific Assumptions):</font>** साधारणतया विज्ञान के क्षेत्र में प्रयोगों को सिद्ध करने के लिये सर्वप्रथम धारणाएँ बनाई जाती हैं। और यदि प्रयोग उस धारणा को सत्यापित करता है तो उस धारणा को सत्य एवं सिद्धांत के रूप में स्थापित कर दिया जाता है। **<font color="green">व्यावहारिक धारणा (मान लेना) (Assuming):</font>** बिना किसी ठोस प्रमाण के कोरी कल्पना या अनुमान के आधार पर किसी परिस्थिति में तुरंत किसी बात को मन में बैठा लेना या गढ़ लेना या मान लेना या किसी विषय-वस्तु के बारे में धारणा बना लेना। धारणाएं हमारे दिमाग के शॉर्टकट हैं जो रोज़मर्रा के छोटे-मोटे फैसले लेने में मदद करते हैं ताकि दिमाग पर ज़्यादा ज़ोर न पड़े। उदाहरण: मैंने अपने पिता से पिकनिक पर जाने के लिये पूछा तो उन्होंने माना कर दिया। मैंने उनसे मना करने का कारण जाने बिना ही यह मान लिया कि मेरे पिता कंजूस हैं वे मुझे पैसों की वजह से नहीं जाने दे रहे। आप सुबह ऑफिस दे से पहुंचे उसके तुरंत बाद बॉस ने केबिन में बुलाया। आपने धारणा बना ली कि बॉस आज मैं देरी से आया तो बॉस गुस्से में होंगे। लेकिन जब आप केबिन में पहुंचे तो बॉस मुस्कुराकर बात करते हैं, तो आपकी यह धारणा तुरंत खत्म हो जाती है। >विश्वास (Trust): यह किसी व्यक्ति या विषय पर हमारे पूर्व अनुभव/प्रमाण एवं तर्क पर आधारित होता है। जैसे हमें विज्ञान में विश्वास होता है। उदाहरण: हवाई जहाज में बैठने से पूर्व हम अपने पूर्व अनुभव के आधार पर विश्वास करते हैं और उसमें यात्रा करते हैं। क्योंकि हम हर रोज अन्य लोगों को हवाई जहाज में यात्रा करते हुए देखते हैं। **<font color="green">४.श्रद्धा (faith):</font>** अध्यात्म एवं व्यवहार के अनुसार यह दो प्रकार की हो सकती है। **<font color="green">ज्ञानमार्ग में श्रद्धा (जीवंत श्रद्धा):</font>** गुरु या किसी व्यक्ति या विषय-वस्तु के प्रति समर्पण या विश्वास है यह वास्तव में तर्कसंगत आधार या स्वयं के अनुभव पर आधारित होती है। उदाहरण के लिए, एक साधक अपने गुरु के प्रति तभी श्रद्धा एवं समर्पण रख पाता है जब वह गुरु के वचनों को स्वयं के अपरोक्ष अनुभव एवं तर्क के आधार पर प्रमाणित कर लेता है। यदि साधक गुरु के किसी संकेत को प्रमाणित नही कर पाता तो वह यहाँ पर गुरु पर फिर भी श्रद्धा रखता है क्योंकि उसे विश्वास होता है कि गुरु के वचन पूर्व में सत्य सिद्ध हुए हैं हो सकता है कि उसकी मनन की विधि में कोई त्रुटी हो या फिर उसकी इतनी प्रगति नहीं हो पायी है कि वह संकेतों को प्रमाणित कर सके। कभी-कभी संकेतों को प्रमाणित करने के मार्ग में चित्त की अशुद्धियाँ विघ्न उत्पन्न कर सकती है। आम जानता अज्ञानवश अंधश्रद्धा को ही श्रद्धा कहती है। **<font color="green">भक्ति मार्ग में श्रद्धा:</font>** साधक अपने गुरु एवं इष्ट के प्रति बिना किसी प्रमाण के समर्पित होता है। भक्तिमार्ग में बिना शर्त और प्रमाण के सम्पूर्ण समर्पण ही श्रद्धा है। यहाँ पर यदि साधक किसी पाखंडी गुरु पर श्रद्धा रखकर सम्पूर्ण समर्पण कर देता है तो उसका समय नष्ट होता है और उसकी प्रगति भी नहीं होती है। इसके अतिरिक्त व्यवहारिक रूप से लोग उनके धर्म, इष्ट एवं प्रतिष्ठित व्यक्तियों के प्रति बिना प्रमाण एवं सत्यापन के ही श्रद्धा रखते है। **<font color="blue">५.अंध श्रद्धा/ अंध विश्वास/अंध भक्ति/(Superstition/blind faith):</font>** बिना किसी तर्क एवं बिना किसी प्रमाण के किसी व्यक्ति एवं विषय-वस्तु के प्रति पूर्ण समर्पण एवं स्वीकारभाव। यहाँ समर्पण भावनाओं के आधार पर होता है और उस व्यक्ति से प्राप्त जानकारी को सत्य मान लिया जाता है। जब श्रद्धा प्रमाण पर आधारित है तो यह अंध श्रद्धा नही रह जाती। उदाहरण: काली बिल्ली का रास्ता काटने को अपशगुन मानना, नींबू-मिर्ची टांगना, या शकुन-अपशकुन को मानना, किसी देवी-देवता/ धर्म/ संप्रदाय/ प्रतिष्ठित व्यक्ति में अन्धविश्वास/ अंध श्रद्धा करना आदि। **<font color="blue">६.आशुविश्वासी (Credulous/Gullible):</font>** एक सीधा-साधा व्यक्ति जो किसी की भी बात पर जल्दी से बिना प्रमाण एवं तर्क-वितर्क के विश्वास कर लेता है। उदाहरण: ज्यादातर कम पढ़े लिखे गाँव के व्यक्ति जल्दी से झूठी ठगी के शिकार (साइबर अपराध) हो जाते हैं। इसे लोग जल्दी ही स्वार्थी राजनैतिक दलों के झांसो में आकार उनके मतारोपण एवं भ्रामक विज्ञापनों का शिकार होते हैं। **<font color="blue">७.आस्था (Faith):</font>** यह साधारणतया धर्म से सम्बंधित होती है। जैसे हम सभी को हमारे धर्म एवं भगवान में आस्था होती है। कोई व्यक्ति भगवान के प्रत्यक्ष प्रमाण के बिना भी उनमें आस्था रख सकता है। आस्था साधारणतया हमें अपने परिवार एवं समाज के द्वारा आरोपित होती है। हम इसे बिना किसी प्रमाण के स्वीकार करते है। आस्था अक्सर एक भावनात्मक जुड़ाव के साथ होती है। आस्था शब्द मुख्य रूप से ईश्वर, धर्म, गुरु या सिद्धांतों के प्रति समर्पण के लिए उपयोग किया जाता है। श्रद्धा एवं आस्था एक ही हैं दोनों में बिना प्रमाण के किसी विषय-वस्तु अथवा व्यक्ति के प्रति विश्वास एवं समर्पण कर दिया जाता है। जीवंत आस्था: यदि आस्था स्वयं के अपरोक्ष अनुभव एवं तर्क के आधार पर होती है तो ज्ञान मार्ग में इसे जीवंत आस्था कहा जाता है। >ज्ञानमार्ग एक गुरु के प्रति प्रारंभिक समर्पण श्रद्धा से शुरू होता है और वह जीवंत श्रद्धा एवं जीवंत आस्था के साथ और भी दृढ होता चला जाता है। ज्ञानमार्ग जीवंत आस्था एवं जीवंत श्रद्धा की अनुशंसा करता है। **<font color="blue">८.मान्यताएं (Beliefs):</font>** मिथ्या विश्वास जिसे बिना किसी प्रमाण के (taken for granted) सत्य मान कर स्वीकार लिया गया है। मान्यता स्थायी और अक्सर अस्तित्व, जगत एवं जीवन के मूल्यों के बारे में एक व्यक्ति का दृढ विश्वास होता है। मान्यता लम्बी अवधि तक चलने वाली होती है। यह व्यक्ति के परिवार, संस्कृति, धर्म एवं जीवन के अतार्किक अनुभवों के कारण बनती है। इन्हें उचित प्रमाण देने के बाद भी ये जल्दी से नष्ट नही होती है। मान्यता व्यक्ति के अवचेतन मन (Unconscious mind) का हिस्सा होती है और व्यक्ति इसे कोई विकल्प नहीं, बल्कि 'परम सत्य' मानता है। मान्यताएं हमारे चरित्र और व्यक्तित्व का निर्माण करती हैं। अक्सर हमारी मान्यताएं हमारे कर्मों एवं निर्णयों के लिये जिम्मेदार होती हैं और अक्सर गलत ही होती हैं। इसलिये हमें कर्म करने से पूर्व एवं निर्णय लेने से पूर्व विचार करना चाहिए कि ये कहीं मेरी मान्यताओं से तो प्रेरित नहीं है।, उदारहण: स्वयं को एक शरीर मानना और जगत को सत्य मानना एक सबसे बड़ी मान्यता है। जैसे लोगों में यह मान्यता होती है कि उनका धर्म ही सर्वोत्तम है। समाज में यह एक साधारण मान्यता है कि ऊँचा एवं प्रतिष्ठित पद जैसे नेता, राजनेता, धनी व्यक्ति वाली जीवन शैली ही उत्कृष्ट है इसलिये वे उनका अनुसरण अधिक करते हैं जबकि ज्ञानी एवं वैज्ञानिक एवं दार्शनिकों का बहुत काम जान अनुसरण करते हैं। **<font color="blue">९.जानकारी/सूचना (Information):</font>** वह सभी सूचना या जानकारी जिसे हमने बिना किसी प्रमाण के और तर्क के स्वीकार कर लिया है। उदारहण: चीनी मीठी होती है। यदि आपने इसे चख लिया तो यह आपका अनुभव आधारित प्रमाण है और यदि आपने इसे बिना चखे स्वीकार कर लिया तो यह केवल जानकारी/ सूचना मात्र है। **<font color="blue">१०.मतारोपण (Indoctrination):</font>** किसी व्यक्ति या समूह पर उसकी अशिक्षा या काम बुद्धि के कारण, बिना उनकी सोच-समझ या सहमति के स्वयं के विचार, विश्वास या सिद्धांत थोपना। इसे सरल शब्दों में 'मत प्रतिपादन' या 'दिमाग में किसी खास विचारधारा को भरना' कहा जाता है। इसमें बिना सवाल पूछे, बिना तर्क (Rational Thinking) किये एवं बिना प्रमाणों की जाँच किए अंध-स्वीकृति होती है। उदाहरण **<font color="green">धार्मिक मतारोपण:</font>** यदि किसी बच्चे को यह सिखाया जाए कि अमुक विशेष धर्म, कर्मकांड या मान्यता ही एकमात्र सत्य है और अन्य सभी दृष्टिकोण गलत हैं, तथा उसे उस पर कोई भी सवाल करने से रोका जाए। **<font color="green">राजनीतिक/वैचारिक मतारोपण:</font>** किसी राजनीतिक दल या संगठन द्वारा अपने कार्यकर्ताओं को बिना किसी तर्क एवं सवाल के केवल अपनी पार्टी की विचारधारा को सही मानने और विरोधी दल की हर बात को गलत मानने के लिए बार-बार एक ही बात सिखाना। **<font color="blue">११.पूर्वाग्रह (Prejudice):</font>** किसी व्यक्ति या समूह के बारे में बिना किसी तथ्य या अनुभव के पहले से ही एक नकारात्मक राय बना लेना। पूर्वाग्रह एक प्रकार का अनुचित और पक्षपाती रवैया है, जो अक्सर रूढ़िवादिता (Stereotypes) से पैदा होता है। यह भावनाओं (Emotion) से जुड़े होते हैं। ये साधारणतया नकारात्मक होते हैं। उदाहरण: किसी जाति या धर्म या समाज के व्यक्ति के बारे में नकारात्मक दृष्टिकोण/भावना रखना। किसी इंटरव्यू में किसी व्यक्ति के पारिवारिक पृष्ठभूमि (बैकग्राउंड) को देखकर ही उसे अपने मन में नापसंद करने लगना। **<font color="blue">१२.रूढ़िवादिता (Stereotypes):</font>** यह किसी विशेष समूह के लोगों के बारे में एक पक्की और सामान्यीकृत (overgeneralized) धारणा होती है। इसमें व्यक्ति बिना प्रमाण एवं तथ्यों के किसी एक व्यक्ति के अनुभव/व्यवहार के आधार पर पूरे समूह को एक ही तराजू में तौल लेते हैं। यह सोच (Cognitive) से जुड़ी होती है। उदाहरण: लड़कियां गणित में कमजोर होती हैं। किसी एक विशेष धर्म या समुदाय के लोग बुद्धिमान होते हैं। **<font color="blue">१३.कोरी कल्पना (Wishful thinking):</font>** एक ऐसा विचार, सपना या योजना है जिसका वास्तविकता या सच्चाई से कोई संबंध नहीं होता और जिसके पूरा होने की कोई संभावना नहीं होती। इसे मनगढ़ंत ख्याल/ हवाई किले/ खयाली पुलाव भी कहा जाता है। कोरी कल्पना में व्यक्ति केवल सुखद लगने वाली इच्छाओं एवं भावनाओं के आधार पर विश्वासों का निर्माण करता है जिसका प्रमाण, तर्कसंगतता या वास्तविकता से कोई लेना देना नहीं होता है। यह एक संज्ञानात्मक पूर्वाग्रह है। कई बार व्यक्ति इसके आधार पर भी निर्णय लेते हैं और असफल होते है। इससे कोई ठोस या व्यावहारिक परिणाम नहीं निकलता है। उदाहरण: एक बच्चा कोरी कल्पना कर रहा है कि वह सुपरमैन की तरह हवा में उड़ सकता है। **<font color="blue">१४.भ्रांति (Delusion):</font>** किसी विषय-वस्तु का झूठा एवं गहरा विश्वास। इस प्रकार की भ्रान्ति कुछ मानसिक अस्वास्थ्य की स्थितियों जैसे सिज़ोफ्रेनिया या बाइपोलर डिसऑर्डर या फिर मादक पदार्थो के दुरुपयोग (substance abuse) के आम लक्षण हैं । उदाहरण: उत्पीड़न का भ्रम: यह मानना कि कोई व्यक्ति या कोई एजेंसी सक्रिय रूप से मुझे नुकसान पहुंचाने, जासूसी करने या धोखा देने की कोशिश कर रही है। महानता का भ्रम (Delusions of grandeur):** यह मानना कि मेरे पास विशेष शक्तियां, सर्वाधिक धन-संपदा है मैं सबसे महत्पूर्ण हूँ या मेरी एक अनूठी पहचान है (जैसे कि एक प्रसिद्ध ऐतिहासिक व्यक्ति या सेलिब्रिटी होना)। **<font color="blue">१५.मिथक (Myth)</font>** पौराणिक एवं परंपरागत काल्पनिक कथाएँ जो कि देवी-देवताओं, अलौकिक शक्तियों, मनुष्य, प्रकृति एवं ब्रह्मांड की उत्पत्ति, जन्म-मृत्यु एवं पुनर्जन्म, स्वर्ग-नरक, जीवन से जुड़े सामाजिक मूल्यों जैसे नैतिक व्यवहार, पाप-पुण्य, धर्म-अधर्म से जुड़े प्रश्नों से सम्बंधित होती हैं। यह पीढ़ियों से मौखिक रूप से चली आ रही प्राचीन कहानियां होती हैं इनका आधार वैज्ञानिक या ऐतिहासिक तथ्य न होकर लोक-विश्वास, परिकल्पना एवं मान्यताएं होते हैं। धार्मिक मिथकों का मूल उद्देश्य स्वर्ग तथा नरक का लोभ, भय दिखाकर लोगों को विसंगतियों से दूर रखना एवं सामाजिक व्यवस्था को मजबूत करना था। साहित्य और संस्कृति में यह गहरे प्रतीकात्मक अर्थ रखते हैं। मनोवैज्ञानिक कार्ल युंग (Carl Jung) के अनुसार, मिथक का जन्म व्यक्ति में नहीं, बल्कि एक सभ्यता/संस्कृति के समूह के अचेतन मन में होता है। मिथक विश्व कि सभी सभ्यताओं में पाए जाते हैं। आज के समय में लोगों ने मिथकों के पीछे के मूल उद्देश्य को भुला दिया है और स्वार्थ हेतु अन्धविश्वास फ़ैलाने के लिए इनका उपयोग किया जाता है। >**माया/मिथ्या (Illusion/Maya)** ज्ञानमार्ग में सत्य और असत्य का निर्धारण अपरिवर्तनशीलता के मानदंड के आधार पर किया जाता है। जो कुछ भी परिवर्तनशील है वह असत्य है। इसलिये जो कुछ भी प्रतीत होता है। सभी अनुभव, ये परिवर्तनशील जगत, यह व्यक्ति रूपी शरीर एवं मन सब कुछ असत्य है। असत्य ही माया है क्योंकि असत्य परिवर्तनशील है। सत्य सदा ही अपरिवर्तनशील होता है। जो एक से ज्यादा है वह असत्य है। सत्य सदा ही एक होता है। ज्ञान एवं अज्ञान दोनों ही माया हैं। परिवर्तनशील होने के कारण माया को मिथ्या भी कहा जाता है। ज्ञानमार्ग में ज्ञान एवं अज्ञान दोनों ही माया है मिथ्या है। >**मूल अज्ञान क्या है?** ज्ञानमार्ग के अनुसार मूल अज्ञान निम्न है। १.स्वयं के तत्व (सत्य) का अज्ञान। २.माया का अज्ञान। ३.स्वयं को शरीर एवं जगत को सत्य समझना। ४.सुख एवं भोग को मानव जीवन का लक्ष्य समझना। **अज्ञान के साधन:** साधन अर्थात वे माध्यम जिनके कारण अज्ञान होता है। अज्ञान के निम्न कारण हो सकते है. **परिवार/माता-पिता एवं सगे सम्बन्धी:** माता पिता एवं सगे सम्बन्धी स्वयं अज्ञानी होने के कारण अपने बच्चों पर मतारोपण करते हैं। **कुसंगति:** अज्ञानी व्यक्तियों (मित्र/पडोसी/व्यावसायिक साथी) की संगति अज्ञान बढाती है। **समाज/धर्म/संप्रदाय:** लगभग सभी धर्मों में स्वार्थ सिद्धि हेतु उनके अनुयायियों में अक्सर अज्ञान फैलाया जाता है। **शिक्षक/गुरु:** एक पाखंडी गुरु या शिक्षक के प्रति अंध श्रद्धा अज्ञान का कारण बनती है। **प्रतिष्ठित व्यक्ति:** नेता एवं राजनेता अक्सर स्वयं के स्वार्थ सिद्ध करने के लिये धार्मिकता, कट्टरता एवं भ्रामक विज्ञापनों से अज्ञान फैलाते हैं। **समाचार पत्र:** भ्रामक विज्ञापन, प्रायोजित लेख अज्ञान का कारण बनते हैं। **पुस्तकें:** कालांतर में ज्ञान से सम्बन्धी ग्रन्थ, शास्त्र एवं पुस्तकें अशुद्ध हो गयी हैं। लोगों के द्वारा स्वार्थ एवं सीमित बुद्धि के अनुसार गलत प्रकार से व्याख्या, अर्थ एवं विश्लेषण अज्ञान को बढ़ाते हैं। **शब्दों के अस्पष्ट अर्थ:** शिक्षण के दौरान शब्दों के अस्पष्ट एवं एक से अधिक अर्थ अज्ञान का कारण बनते हैं। इसलिये सटीक शब्द, एक सटीक परिभाषा एवं एक मार्ग में एक ही शब्दावली का उपयोग करना चाहिए. मार्गों एवं शब्दावलियों का मिश्रण अज्ञान बढाता है। **सोशल माध्यम:** टीवी, इन्टरनेट, यू-ट्यूब, व्हाट्सएप, एक्स, फेसबुक आदि माध्यम, आर्टिफीसियल बुद्धिमत्ता से प्राप्त सूचना को बिना सत्यापन के स्वीकार करना। **विज्ञापन:** कंपनिया अपने उत्पाद बेचने के लिये भ्रामक विज्ञापन करती हैं। **अधूरा/अतार्किक ज्ञान:** किसी विषय वस्तु का अधूरा एवं अतार्किक ज्ञान अज्ञान बढाता है। **अशिक्षा:** अशिक्षित व्यक्ति जल्द ही मान्यताओं एवं अन्धविश्वास को मान लेता है। **तर्क बुद्धि का अभाव:** विश्लेषणात्मक एवं तर्क-संगत बुद्धि का अभाव भी अज्ञान बढाता है. **अंधश्रद्धा/अंधविश्वास/अंधभक्ति:** अक्सर धर्म एवं समुदायों में व्याप्त मान्यताएं एवं अन्धविश्वास अज्ञान का कारण होते है. **शारीरिक एवं मानसिक रोग:** कभी-कभी शारीरक एवं मानसिक रोग भी भ्रम एवं मिथ्याभास का कारण होते हैं. **परम्पराएं एवं त्यौहार:** सामाजिक परम्पराएं, रीती-रिवाज एवं त्यौहार भी अन्धविश्वास को बढ़ावा देते हैं। **रुढ़िवादी:** रुढ़िवादी व्यक्ति अपनी मान्यताओं का दास होता है और उन्हें ही सत्य मानता है। **रीती-रिवाज:** अक्सर लगभग सभी धर्मों में के नाम पर अन्धविश्वास को बढ़ावा दिया जाता है। **अज्ञान के हानिकारक प्रभाव** **१. भेदभाव (Discrimination):** पूर्वाग्रह एवं रूढ़िवादिता के कारण किसी व्यक्ति या समूह के साथ उसकी जाति, धर्म, लिंग या पृष्ठभूमि के आधार पर अलग, अनुचित या असमान व्यवहार करना। भेदभाव सिर्फ एक सोच या भावना नहीं है, बल्कि यह एक प्रकार का कर्म (Action) या व्यवहार है। उदाहरण: किसी खास धर्म के व्यक्ति को नौकरी या घर किराए पर देने से मना कर देना। **२. रिश्तों में कड़वाहट एवं गलतफहमी (misunderstanding) होना:** मान्यताओ एवं धारणाओं के कारण व्यक्ति के रिश्तों में ग़लतफ़हमी उत्पन्न हो जाती है जो तनाव का कारण बनती है। **३. गलत निर्णय एवं असफलता:** अज्ञान के कारण व्यक्ति अक्सर मान्यताओं के आधार पर गलत निर्णय ले लेता है जिससे उसे जीवन में असफलता प्राप्त होती है। **४. दुखों का कारण:** अज्ञानी व्यक्ति अक्सर अपनी मान्यताओं, धारणाओं एवं मतारोपण के कारण गलत निर्णय लेता है जिससे उसके परिणाम उसके दुखों का कारण बनते हैं। **५. भेडचाल में जीवन जीते है:** अज्ञानी व्यक्ति में तर्क बुद्धि-विवेक का अभाव होता है। इसलिये वे भीड़ का अनुसरण करने वाले होते है और अक्सर बहुमत के आधार पर निर्णय लेते हैं एवं कर्म करते है। एक अज्ञानी व्यक्ति अक्सर दूसरों के वैचारिक सिद्धातों के अनुसार जीवन जीते है। उनकी अपनी कोई स्वतंत्र विचारधारा या दृष्टिकोण नहीं होता है। **६.अल्पबुद्धि:** एक अज्ञानी व्यक्ति स्वयं की बुद्धि का प्रयोग नही करता क्योंकि वही दूसरों का अनुसरण करता है जिससे उसकी तर्क बुद्धि विकसित नहीं हो पाती और वह अज्ञानी एवं मुर्ख ही बना रहता है। **७.कुसंगति**: एक अज्ञानी व्यक्ति अक्सर अज्ञानियों की संगति ही पसंद करता है। उसे कोई तर्कसंगत एवं बुद्धिमान व्यक्ति पसंद नहीं आता क्योंकि उसे अपने अज्ञान की पोल खुलने का भय रहता है। **८.आत्मविश्वास की कमी:** एक अज्ञानी व्यक्ति में आत्मविश्वास नही होता। उसे केवल उसकी मान्यताओं पर अंधविश्वास होता है। **९.दूसरों के स्वार्थ के शिकार होते है:** अज्ञानी को कोई भी अपने स्वार्थ सिद्धि के लिये आसानी से उपयोग कर सकता है। अक्सर राजनितिक लोग एवं प्रभाशाली लोग ऐसा करते हैं। **१०.पशुवत जीवन:** जिस प्रकार एक पशु का जीवन केवल उत्तरजीविता की वृत्तियों (रक्षण, भक्षण, प्रजनन) में यंत्रवत चलता है उसी प्रकार कम बुद्धि होने के कारण एक अज्ञानी व्यक्ति के जीवन भी पशुवत होता है। **११.हिंसक होते है:** अज्ञानी व्यक्ति अपनी मान्यताओं को सत्य सिद्ध करने के लिये हिंसा का सहारा लेते हैं। **१२.ज्ञानी होने का आडम्बर करते है:** अज्ञानी व्यक्ति अक्सर स्वयं को ज्ञानी मानता है और ज्ञानी की तरह व्यवहार करने का दिखावा करता है किन्तु विषम एवं विपरीत परिस्थितियों में उसका अज्ञान उजागर हो जाता है। **१३.अध्यात्मिक प्रगति धीमी हो जाती है:** एक अज्ञानी व्यक्ति वास्तविक अध्यात्म (स्वयं के सत्य स्वरुप का ज्ञान) से कोशों दूर होता है जिससे उसकी अध्यात्मिक प्रगति रुक जाती है। **१४.अशांत जीवन:** एक अज्ञानी का मन हमेशा ही इच्छाओं के पीछे भागता है अपूर्ण इच्छाएँ जीवन में अशांति का कारण बनती हैं। **१५.आसक्ति:** अज्ञानी जगत को सत्य मानता है जिसकी वजह से वह जगत, वस्तुओं एवं संबंधियों से आसक्ति रखता है। **१६.नकारात्मक वृत्तियाँ:** अज्ञानी व्यक्ति काम, क्रोध, लोभ, मोह, घृणा, राग, द्वेष, प्रतिस्पर्धा, भय, असुरक्षा की वृत्तियों से ग्रसित होते है। **१७.श्रेष्ठता का भाव:** अज्ञानी भेदभाव के कारण दूसरों से श्रेष्ठता का भाव रखते हैं। **१८.शोषण की वृत्ति:** एक अज्ञानी व्यक्ति द्वारा ही दूसरे अज्ञानी व्यक्ति का शोषण होता है। **१९.इन्द्रियों एवं वृत्तियों के दास:** अज्ञानी व्यक्ति स्वयं की वासनाओं एवं वृत्तियों के गुलाम होते हैं क्योंकि वे स्वयं को देह मानकर जीवन जीते हैं और भोग विलास को ही जीवन का लक्ष्य मानते हैं। **२०.संशय एवं संदेह:** अज्ञान संदेह एवं अंधविश्वास का कारण बनता है। अज्ञानी व्यक्ति अक्सर धोखा खाता है जिसकी वजह से वह हर किसी को संदेह की नजर से देख सकता है। **२१.लक्ष्यहीन जीवन:** अज्ञानी के जीवन में कोई सार्थक लक्ष्य नही होता है। वह केवल भोग विलास को ही जीवन का अंतिम लक्ष्य मानते है। **२२.जड़ समान जीवन जीते है:** अज्ञानी ज़िद्दी एवं अड़ियल स्वाभाव के होते हैं और परिवर्तन को जल्दी से स्वीकार नहीं करते। उनकी मान्यताएं एवं धारणाएँ ही उनके जीवन को यंत्रवत चलाती है। **२३.दूसरों पर निर्णय लेने के लिये आश्रित होते है:** अज्ञानी व्यक्ति में तर्क बुद्धि की कमी होने के कारण आत्म-विश्वास एवं निर्णय लेने की क्षमता का अभाव होता है और वे अपने जीवन के अहम निर्णय दूसरों के मत एवं निर्देशों को बिना तर्क वितर्क किये लेते हैं। **अज्ञान के लाभ:** अज्ञान के निम्नलिखित अल्पकालिक लाभ हो सकते हैं। जब आप जान जाते हैं कि अज्ञान क्या है तब आप जानते हुए अज्ञान का व्यवहारिक जीवन में उपयोग कर सकते हैं। यहाँ पर यह बात ध्यान रखने कि आवश्यकता है कि सर्वप्रथम आप किसी भी विषय-वस्तु को प्रमाणित करने का प्रयास करें और यदि प्रमाणीकरण व्यवहारिक नहीं है या फिर उसमें समय लग सकता है तो आप जानते हुए अज्ञान के आधार पर निर्णय ले सकते हैं और आपका वह निर्णय पत्थर की लकीर नहीं होना चाहिए आपको उसको लेकर लचीला होना चाहिए। निम्न परिस्थितियों में आप अज्ञान का उपयोग कर सकते हैं। १. ज्ञान प्राप्त करने की शुरुआत हम सर्वप्रथम अवधारणा (अज्ञान) बना कर करते हैं फिर उस अवधारणा को सिद्ध करने हेतु अपरोक्ष अनुभव प्राप्त करने एवं तर्क बनाने के लिए प्रयोग करते है। २. विज्ञान को पूर्व में ही वैज्ञानिकों द्वारा कई वर्षों के प्रयोगों से प्रमाणित किया जा चुका है। इसलिये विज्ञान एवं गणित के हर विषय/नियम विशेषकर कठिन विषय एवं नियमों/सिद्धातों को स्वयं के अपरोक्ष अनुभव प्राप्त करने एवं तर्क से प्रमाणित करने की आवश्यकता नहीं है। व्यावहारिकता के लिए इन्हें ऐसे ही स्वीकार कर सकते हैं क्योंकि इनको सिद्ध करने के लिए महंगे उपकरण एवं उचित प्रयोगशाला की आवश्यकता होती है। जैसे बीमारी में डॉ जो दवाई लिखता है हम उसे पहले बिना परखे उस पर विश्वास कर के दवाई लेते हैं कि मेरा रोग ठीक हो जायेगा। ३. अज्ञान (मान लेना/assuming; आशुविश्वासी/Credulous) हमारे जीवन के छोटे-छोटे एवं तुरंत निर्णय लेने में सहायक होते हैं। जैसे आप किसी अनजान मार्ग पर किसी स्थान कि ओर जा रहे है। वहाँ आगे चौराहा है और वहां कोई दिशा निर्देश का संकेत भी नहीं है। इस स्थिति में आपको वहां एक अनजान व्यक्ति मिलता है और आप उससे सही दिशा के बारे में पूछ कर आगे बढ़ सकते हैं क्योंकि अब आपको इस व्यक्ति पर विश्वास करने के अतिरिक्त और कोई रास्ता भी नहीं है। और आप उसकी बात को सही/गलत सिद्ध करने के लिए उसकी बताई दिशा में जाना ही पड़ेगा। ४. जहाँ कोई ज्यादा खतरा नहीं है वहां अज्ञान के आधार पर आप तुरंत निर्णय ले सकते है। जैसे हमारे माता पिता कहते हैं कि पढाई करने एवं मेहनत करने से अच्छी नौकरी मिलेगी और जीवन सुखी होगा। यह एक मान्यता है, किन्तु यहाँ पर माता-पिता की बात मानने से आपको कोई बड़ी हानि नहीं होगी। तो आप उनकी बात मान सकते है। फिर इस मान्यता तो गलत साबित करने लिए (अनपढ़ को भी नौकरी मिलती है) आपको अनपढ़ रहना पड़ेगा जो पढ़े-लिखे होने से ज्यादा खतरनाक है। ५. भक्ति मार्ग में बिना प्रमाण के ही गुरु एवं इष्ट देव के प्रति समर्पण करना आवश्यक है अन्यथा प्रगति नहीं होती है। इसे आप अपनी प्रगति के माप से प्रमाणित कर सकते है कि मेरे गुरु के प्रति समर्पण से प्रगति हो रही है या नही। ६. ज्ञानमार्ग में प्रारम्भ में स्वयं के प्रमाणों (अपरोक्ष अनुभव एवं तर्क) के आधार पर गुरु के वचनों पर विश्वास करें। प्रारंभ में प्रमाण मिलने के पश्चात यदि गुरु के १० संकेतों में से ८ को आपने प्रमाणित कर लिया है और २ का सत्यापन नहीं हो रहा है तो यहाँ आपको बिना प्रमाण के गुरु के वचनों के प्रति समर्पण कर देना चाहिए क्योंकि गुरु ने स्वयं ही इसे प्रमाणित किया हुआ है। कभी-कभी चित्त की अशुद्धियों एवं गलत मनन के कारण हम उनका सत्यापन नहीं कर पाते। चित्त की अशुद्धियाँ समाप्त होने पर एवं साधना द्वारा इस मनोशरीर यंत्र को उपयुक्त बनाने पर उन विषयों का बाद में सत्यापन किया जा सकता है। प्रारंभ की श्रद्धा एवं आस्था सत्यापन के साथ जीवंत श्रद्धा एवं जीवंत आस्था में परिवर्तित हो जाती है। **अज्ञान को नष्ट करने के उपाय** **स्वयं का अज्ञान पहचाने:** सर्वप्रथम स्वयं के भीतर की मान्यताओं, धारणाओं, अन्धविश्वास एवं मिथकों को पहचानें। स्वयं के अज्ञान को पहचानना ज्ञान की ओर पहला कदम है। **तर्क बुद्धि विवेक का विकास:** बुद्धि बढ़ने से व्यक्ति में तर्क शक्ति एवं विवेक बढ़ने लगता है और उसका अज्ञान का नाश होने लगता है। कम बुद्धि के अनुवांशिक कारण भी हो सकते हैं किन्तु अभ्यास एवं प्रयास से बुद्धि को बढ़ाया जा सकता है। **सुसंगति करें:** कुसंगति बुद्धि का नाश करती है जिससे अज्ञान बढ़ता है। इसलिये अपने से अधिक बुद्धिमान, चतुर, ज्ञानी व्यक्तियों एवं प्रमाणित पुस्तकों की संगति करें। **सत्यापन एवं प्रमाणीकरण करें:** किसी भी विषय-वस्तु, सुचना/जानकारी, तथ्य, विचार को सत्य मानने से पूर्व उस पर मनन करें और स्वयं के अपरोक्ष अनुभव एवं तर्क के आधार पर उसका सत्यापन करें और उसे स्वयं के ज्ञान में लायें। अचेतन रूप से कुछ भी अप्रमाणित स्वीकार न करें। <br><br><div><img width='100%' src='images/69840537-चित्र१.png'></div><br><br> चित्र १: अज्ञान के प्रकार **अज्ञान से ज्ञान की दिशा में निम्न चरण हो सकते हैं।** अज्ञान कि परतें हटने के साथ-साथ ज्ञान होना प्रारंभ हो जाता है। जैसे ही अनुभवों एवं घटनाओं में अतार्किक संयोजन के स्थान पर तार्किक नियमानुसार संयोजन होने लगते हैं तो ज्ञान पूर्ण हो जाता है। अज्ञात विषय को बिना प्रमाण के कुछ मान लेना ही अज्ञान है। और उस विषय को जानने की प्रक्रिया में उसे अलग-अलग भागों में विभाजन करके उसका विश्लेषण अपरोक्ष अनुभव एवं तर्क के आधार पर किया जाता है और फिर उन छोटे-छोटे विश्लेषणों को जोड़ कर उस विषय का ज्ञान पूर्ण हो जाता है। ज्ञान के पूर्ण होते ही अज्ञान नष्ट हो जाता है। सर्वप्रथम यह समझना आवश्यक है कि मुझे इस विषय का अज्ञान है। और इसे जानने के लिए प्रथम यह देखें कि मैंने इस विषय को जो मान रखा है उसका स्रोत क्या है उसकी सत्यता का प्रमाण क्या है। इस प्रक्रिया को हम स्वयं के अज्ञान को जानने की प्रक्रिया कहते है। हम जैसे ही यह जान लेते हैं कि मुझे इस विषय का अज्ञान है तो वह ज्ञान कि दिशा में अगला कदम है। अज्ञान से ज्ञान की दिशा में निम्न चरण हो सकते हैं। १. स्वयं के अज्ञान को पहचाने (अपरोक्ष अनुभव और तर्क से) २. अवधारणा बनाएं। ३. बड़े विषय को छोटे-छोटे विषयों में विभाजित करें। ४. सात प्रश्नों के आधार पर उन विषयों का अपरोक्ष अनुभव और तर्क से विश्लेषण करें (क्या, क्यों, कैसे, कौन, कहाँ, कितने, कब से?)। ५. विषय के सत्य/असत्य एवं मान्यताओं को जानें। ६. छोटे-छोटे विषयों के ज्ञान का संयोजन (संश्लेषण) करें। ७. नियम (Law)/सिद्धांत (Principal) बनाएं: ज्ञान कि पुनरावृत्ति (Repeatability), पुनरुत्पादन क्षमता (Reproducibility) की जांच करें और उसके आधार पर नियम (Law)/सिद्धांत (Principal) बनाएं। ८. नियम (Law)/सिद्धांत (Principal) की पुनरावृत्ति (Repeatability) के लिए परिस्थितियाँ एवं तरीका (method) स्पष्ट रूप से निर्धारित करें। जैसे किस अवस्था/लोक में कार्य करेगा (जागृत, स्वप्न, सूक्ष्म लोक)। ज्ञान एवं अज्ञान की बात हम केवल द्वैत अवस्था में करते हैं। अद्वैत में तो ज्ञान/अज्ञान का कोई अर्थ नहीं है। ९. ज्ञान को स्पष्ट रूप से समझाने हेतु व्यवहारिक उदाहरणों का उपयोग करें। १०. प्रयोग एवं ज्ञान के लाभ एवं हानियाँ स्पष्ट करें। ११. ज्ञान के सटीक शब्द एवं परिभाषाएँ बनाएं। **अज्ञान से अज्ञेय अवस्था:** यदि हम चित्त के विकास की बात करें तो चित्त अज्ञान अवस्था से मुक्त चित्त की अवस्था तक विकास करता है। प्राकृतिक अज्ञान की अवस्था चित्त की निचली परतों में पायी जाती है जो की खनिज चित्त से प्रारंभ होती है। जहाँ पर ज्ञान होने की कोई सम्भावना नहीं होती **(खनिज चित्त)**। **वानस्पतिक चित्त** में कुछ स्वचालित प्रक्रियाएं चलती हैं जहाँ से ज्ञान होने की कुछ सम्भावना प्रकट होती है क्योंकि कुछ प्रक्रियाएं स्वचालित रूप से चलती हैं जो स्मृति के नियमित संयोजन को दर्शाती हैं। उनके ऊपर **पशु/पक्षी/कीट चित्त** होते हैं जिनमें केवल उत्तरजीविता की वृत्तियों का ज्ञान होता है। जन्म के पश्चात बालक का चित्त अबोध होता हैं क्योंकि वहां पर किसी प्रकार के ज्ञान एवं अज्ञान का अभाव होता है। जैसे ही बच्चा बड़ा होने लगता है वह परिवार एवं समाज से अज्ञान संचित करने लग जाता है (**मानवीय अज्ञान**)। वयस्क होने पर यदि वह काम बुद्धिमान एवं काम तर्क शक्ति का होता है तो उसमें केवल उत्तरजीविता का ज्ञान ही होता है **(अज्ञानी मानव चित्त)**. एक बुद्धिजीवी में कुछ तर्क बुद्धि विकसित होती है जिसकी वजह से वह कुछ विषय-वस्तु से सम्बन्धी सूचना को सत्यापित कर सकता है **(ज्ञान की अवस्था; बुद्धिमान चित्त)** उसके ऊपर आता है **अध्यात्मिक चित्त** जो अपने प्रत्येक ज्ञान को सत्यापित करता है किन्तु उसे सत्य मानता है **(अति-बुद्धिमान, वैज्ञानिक, दार्शनिक)**. चित्त की सबसे ऊपर की अवस्था है **मुक्त चित्त** जिसमें गुरु एवं साधक आते हैं जिन्हें स्वयं से सत्य स्वरुप का बोध होता है और वे जानते हैं अस्तित्व में जानने योग्य कुछ भी नहीं हैं क्योंकि ज्ञान-अज्ञान दोनों ही परिवर्तनशील हैं अतः माया हैं मिथ्या हैं। इसलिये वे अपनी बुद्धि का समर्पण कर देते हैं। यही अज्ञेय अवस्था है। अज्ञान से ज्ञान की अवस्था को निम्न चित्र के माध्यम से दर्शाया गया है। <br><br><div><img width='80%' src='images/69840537-चित्र२.png'></div><br><br> चित्र २: अज्ञान से ज्ञान की ओर चित्त का विकास **सारांश** इस लेख का मूल सारांश यह है कि सर्वप्रथम स्वयं के अज्ञान को पहचानें. अज्ञान के विभिन्न प्रकारों से भ्रमित न हों । मैंने इन शब्दों के स्पष्ट ज्ञान के लिये सभी प्रकारों को सम्मिलित करने का प्रयास किया है । सभी प्रकारों को जानने से हम सर्वप्रथम उनका वर्गीकरण कर सकते हैं और हमें किस प्रकार का अज्ञान है उसे आसानी से पहचान सकते हैं। अज्ञान के वर्गीकरण के पश्चात उसे स्वयं के अपरोक्ष अनुभव एवं तर्क के आधार पर प्रमाणित एवं सत्यापित करें उसके पश्चात ही स्वीकार करें । जहाँ व्यावहारिक रूप से अवश्यक हो वहां जानते हुए अज्ञान का उपयोग करें और फिर उसे त्याग दें । अज्ञान को जानना ही उसे नष्ट करने की कुंजी हैं। अपना मूल अज्ञान जानें और आत्मज्ञान प्राप्त करें। अज्ञान नाश से मेरे जीवन में स्पष्टता आई है और जीवन प्रकाशित हुआ है। मुझे उम्मीद है कि आपको को भी इसका लाभ अवश्य प्राप्त होगा । **सभी सुखी हों, सभी समृद्ध हों, सभी ज्ञानवान हों .....श्री गुरुवे नमः ....ॐ शांति शांति शांति .....** **आभार:** मैं परम श्रद्धेय गुरुदेव श्री तरुण प्रधान जी एवं गुरुक्षेत्र का उनकी शिक्षाओं एवं मार्गदर्शन के लिए आभारी हूँ। इस विषय पर मनन के दौरान गुरुदेव एवं गुरुक्षेत्र से मिले संकेत बहुत उपयोगी सिद्ध हुए हैं। **सन्दर्भ:** 1.तरुण प्रधान (२०२४). अज्ञान की परतें. विशुद्ध अनुभूतियाँ (तृतीय एवं चतुर्थ भाग), नोशन प्रेस. 2.तरुण प्रधान (२०२४). चित्त के विकार. विशुद्ध अनुभूतियाँ (द्वितीय भाग), नोशन प्रेस. 3.तरुण प्रधान (२०२४) विशुद्ध अनुभूतियाँ (प्रथम भाग), नोशन प्रेस. 4.बोधिवार्ता चैनल यूट्यूब विडियो. 5.ज्ञानदीक्षा कार्यक्रम: https://gyanmarg.guru/eok/ 6.https://en.wikipedia.org/wiki/Myth 7.https://sites.miamioh.edu/exemplary-science-teaching/2020/04/addressing-the-elephant-in-the-room-common-misconceptions-in-science/ 8.https://www.britannica.com/topic/illusion 9.https://www.slideshare.net/slideshow/illusion-and-hallucination/236893952 10.https://open.maricopa.edu/culturepsychology/chapter/stereotypes-prejudice-and-discrimination/ 11.https://courses.lumenlearning.com/esc-businesscomskills/chapter/stereotypes-prejudice-and-discrimination/ 12.https://en.wikipedia.org/wiki/Wishful_thinking#bodyContent 13.https://en.wikipedia.org/wiki/Faith 14.https://www.picmonic.com/pathways/nursing/courses/standard/psychiatric-nursing-369/mood-disorders-1274/hallucinations-illusions-delusions_1983 **संपर्क सूत्र..** **साधक:** स्वप्रकाश....... **ईमेल:** swaprakash.gyan@gmail.com