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गुरु की दृष्टि और मेरी दृष्टि किससे देखूं?
अजय कुमार त्रिपाठी
कई बार जीवन में ऐसे क्षण आते हैं जब सामने की घटनाएँ कुछ और कहती हैं, और भीतर की आवाज़ कुछ और। मन चाहता है निर्णय लेना, लेकिन आत्मा बस देखना चाहती है। ऐसे में प्रश्न उठता है मैं किससे देखूं? गुरु की दृष्टि और मेरी दृष्टि दोनों साथ चलती हैं, लेकिन दोनों की दिशा एक नहीं होती। मेरी दृष्टि अक्सर स्वार्थ, भय, या सीमित अनुभव से प्रभावित होती है। वह जल्दी निर्णय लेती है, जल्दी डरती है, और जल्दी थक जाती है। लेकिन गुरु की दृष्टि वह विराट है। उसमें समय की कोई जल्दी नहीं, वहाँ व्यक्ति नहीं, केवल आत्मा दिखती है। गुरुजी जब डांटते हैं, तब मेरी दृष्टि कहती है मुझे ठुकरा दिया गया। लेकिन गुरु की दृष्टि कहती है मैं तुम्हें बुला रहा हूँ, तुम्हारी सीमाएं तोड़ने के लिए। जब मैं खुद को असफल मानता हूँ, तो मेरी दृष्टि कहती है अब मुझसे नहीं होगा। लेकिन गुरु की दृष्टि में वह क्षण भी तैयारी है, तपस्या है। गुरु की दृष्टि कोई चमत्कार नहीं दिखाती वह मेरा असली रूप दिखाती है। तो प्रश्न अब भी वैसा ही है मैं किससे देखूं? उत्तर धीरे-धीरे स्पष्ट होता जा रहा है जब मैं अपनी दृष्टि से देखता हूँ, तो सबकुछ मैं के इर्द-गिर्द घूमता है। लेकिन जब मैं गुरु की दृष्टि मांगता हूँ भीतर मौन होता है, प्रश्न नहीं बचते, केवल साक्षी बचता है। अब अभ्यास यही है हर परिस्थिति में खुद से पूछना: इसको मैं देख रहा हूँ या गुरु की दृष्टि से देखा जा रहा है? और शायद यही ज्ञानमार्ग का सबसे गहरा मोड़ है जब मैं देखूं से मुझसे देखा जा रहा है की यात्रा शुरू होती है।
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